केस मैट्रिक्स: Bombay High Court Verdict on Paternity & Birth Certificate Amendment
| पहलू | विवरण |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | कार्यवाहक CJ रवींद्र वी. घुगे एवं जस्टिस रणजीतसिंहा राजा भोसले |
| याचिकाकर्ता | जैविक मां (याचिकाकर्ता 1) एवं जैविक पिता (याचिकाकर्ता 2) |
| प्रतिनिधित्व | एडवोकेट उदय वारुंजिकर (याचिकाकर्ता) व एडवोकेट के. एच. मस्तकार (प्रतिवादी) |
| मुख्य वैज्ञानिक साक्ष्य | 99.99% मैच वाली DNA रिपोर्ट (Paternity Test) |
| लागू कानून | जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम 1969 की धारा 15 |
Paternity & Birth Certificate: बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी और मानवीय फैसला सुनाते हुए एक बच्ची के जन्म प्रमाणपत्र (Birth Certificate) में उसके पहले पति का नाम हटाकर जैविक पिता (Biological Father) का नाम दर्ज करने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट का यह आदेश कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र वी. घुगे (Acting Chief Justice Ravindra V. Ghuge) और जस्टिस रणजीतसिंहा राजा भोसले (Justice Ranjitsinha Raja Bhonsale) की खंडपीठ द्वारा जारी किया गया। अदालत ने 99.99% सटीकता वाली DNA रिपोर्ट और जैविक मां के शपथ पत्र पर विचार करते हुए माना कि पर्याप्त वैज्ञानिक और तथ्यात्मक साक्ष्य उपलब्ध होने पर जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम (Registration of Births and Deaths Act, 1969) के तहत सुधार किया जा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि: अलगाव, विवाहेतर संबंध और जन्म
- शादी और अलगाव: याचिकाकर्ता नंबर 1 (महिला) की पहली शादी ‘XYZ’ नामक व्यक्ति से हुई थी। वैवाहिक मतभेदों के कारण दोनों अलग रहने लगे।
- विवाहेतर संबंध और बच्ची का जन्म: औपचारिक तलाक का आदेश (हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13-B के तहत) आने से पहले, जब वे अलग रह रहे थे, महिला के दूसरे याचिकाकर्ता (पुरुष) के साथ संबंध बने और एक बच्ची का जन्म हुआ।
- गलत नाम का अंकन: बच्ची के जन्म के समय नगर निगम (Municipal Corporation) द्वारा जारी जन्म प्रमाणपत्र में गलती से महिला के तात्कालिक कानूनी पति (XYZ) का नाम पिता के रूप में दर्ज हो गया था।
- पुनर्विवाह और संशोधन की मांग: तलाक की डिक्री मिलने के बाद महिला ने दूसरे याचिकाकर्ता से औपचारिक विवाह कर लिया। इसके बाद दंपत्ति ने नगर निगम से जन्म प्रमाणपत्र में जैविक पिता का नाम दर्ज करने का अनुरोध किया, जिसे न मानने पर उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया।
बॉम्बे हाई कोर्ट की मुख्य कानूनी टिप्पणियां
अदालत ने वैज्ञानिक साक्ष्यों (DNA Test) और मां के शपथ पत्र को प्राथमिक आधार माना। बॉम्बे हाई कोर्ट की खंडपीठ का आदेश: कंबाइंड पेटर्निटी टेस्ट (Combined Paternity Test) से यह निष्कर्ष निकलता है कि कथित पिता में वे आनुवंशिक मार्कर मौजूद हैं जो जैविक पिता द्वारा बच्चे में योगदान दिए जाने चाहिए। पितृत्व की संभावना 99.99% मापी गई है… जैविक मां (याचिकाकर्ता 1) ने शपथ पर कहा है कि उसका तत्कालीन पति (XYZ) बच्ची का जैविक पिता नहीं था। इसके साथ ही याचिकाकर्ता 2 ने भी संयुक्त याचिका में स्वीकार किया है कि वह बच्ची का जैविक पिता है। जब पर्याप्त रिकॉर्ड उपलब्ध हो, तो जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 की धारा 15 का उपयोग प्रमाणपत्र में सुधार के लिए किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता उदय वारुंजिकर ने उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले ABC बनाम स्टेट (NCT ऑफ दिल्ली – 2015) का हवाला दिया, जिसमें एकल माताओं और बच्चों के सर्वोत्तम हितों (Best Interest of the Child) को ध्यान में रखते हुए प्रक्रियात्मक बाधाओं को दूर करने पर जोर दिया गया था।
अंतिम आदेश
अदालत ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए संबंधित अथॉरिटी (नगर निगम) को निर्देश दिया कि वह बच्ची के जन्म प्रमाणपत्र से पहले पति (XYZ) का नाम हटाकर उसके जैविक पिता (याचिकाकर्ता 2) का नाम दर्ज कर नया जन्म प्रमाणपत्र जारी करे।

