Saturday, October 31, 2026
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Punjab Anti-Sacrilege Law: आपके कौन से अधिकार छीने गए?… बेअदबी कानून को चुनौती देने पर एंग्लिकन चर्च ऑफ इंडिया को फटकार

केस मैट्रिक्स: P&H High Court Challenge to Punjab Anti-Sacrilege Law

पहलूविवरण
संबंधित अदालतपंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय (Punjab & Haryana High Court)
माननीय पीठकार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा एवं जस्टिस रोहित कपूर
संशोधित अधिनियमजागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026 (Jaagat Jot Sri Guru Granth Sahib Satkar Amendment Act, 2026)
सजा के प्रावधान7 से 20 वर्ष तक कारावास, ₹2 लाख से ₹10 लाख जुर्माना; सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने पर आजीवन कारावास।
अदालत का मुख्य रुखयाचिकाकर्ता की Locus Standi पर सवाल; कानून से ईसाई समुदाय का अधिकार प्रभावित नहीं होता।
अगली तिथि7 अगस्त 2026

Punjab Anti-Sacrilege Law: पंजाब में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी (Sacrilege/Beadbi) के खिलाफ बनाए गए कड़े कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने ‘एंग्लिकन चर्च ऑफ इंडिया’ (Anglican Church of India) को कड़ी फटकार लगाई है।

हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि यह कानून ईसाइयों से संबंधित नहीं है और याचिकाकर्ता अदालत में काल्पनिक शिकायतें लेकर आया है। अदालत ने याचिकाकर्ता ईसाई संस्था की ‘याचिका दाखिल करने की योग्यता’ (Locus Standi) पर गंभीर सवाल उठाए।

मामला क्या था?: बेअदबी कानून में संशोधन और चर्च की याचिका

  • संशोधित कानून: पंजाब विधानसभा ने अप्रैल 2026 में ‘जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026’ (Jaagat Jot Sri Guru Granth Sahib Satkar (Amendment) Act, 2026) पारित किया, जिसे राज्यपाल की मंजूरी के बाद लागू किया गया। यह कानून 2008 के मूल अधिनियम में संशोधन करता है।
  • सख्त दंड प्रावधान:
    • श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के स्वरूपों की बेअदबी करने पर न्यूनतम 7 वर्ष से लेकर अधिकतम 20 वर्ष तक के कारावास की सजा।
    • ₹2 लाख से ₹10 लाख तक का जुर्माना।
    • सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की मंशा से किए गए अपराध के लिए आजीवन कारावास (Life Imprisonment) का प्रावधान।
  • एंग्लिकन चर्च का तर्क:
    • याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह कानून केवल एक पवित्र ग्रंथ को विशेष और उच्च विधिक संरक्षण प्रदान करता है, जबकि बाइबिल, कुरान या भगवद्गीता जैसे अन्य ग्रंथों को इसमें शामिल नहीं किया गया है।
    • इससे धर्मों के बीच असमानता और भेदभाव पैदा होता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 25 और 26 तथा धर्मनिरपेक्षता (Secularism) के मूल ढांचे का उल्लंघन है।
    • यह भी तर्क दिया गया कि यह अधिनियम ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) के प्रावधानों के विपरीत है।

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की मुख्य विधिक टिप्पणियां

आप किस तरह पीड़ित हैं? (How are you aggrieved?)

अदालत ने याचिकाकर्ता संस्था के मंतव्य और जनहित याचिका दायर करने के औचित्य पर कड़े सवाल दागे। हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणी, किस तरह से आपके धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है? आपको किस समान संरक्षण से वंचित किया गया है? यदि राज्य किसी एक धर्म से जुड़ी विशेष परिस्थिति या स्थिति से निपटने के लिए कोई कानून लाता है, तो इससे आपको क्या शिकायत है? बाइबिल के संबंध में ऐसी कोई घटना दर्ज नहीं हुई है। फिर आपके सामने आने का क्या कारण है, सिवाय इसके कि आप खुद के लिए प्रचार (Publicity) चाहते हैं?

बहुसंख्यक आबादी की आस्था का संरक्षण

पीठ ने रेखांकित किया कि कानून पंजाब के निवासियों की बहुसंख्यक आबादी की आस्था की रक्षा के लिए लाया गया है। यदि ईसाई समुदाय के अधिकारों का कोई वास्तविक उल्लंघन होता है, तभी वे अदालत का रुख कर सकते हैं।

मामले की वर्तमान स्थिति

  1. करणप्रीत सिंह की याचिका भी शामिल: अदालत ने इसी कानून को चुनौती देने वाले एक अन्य व्यक्ति (करणप्रीत सिंह) की याचिका पर भी सुनवाई की, जिसमें आरोप लगाया गया है कि राज्य द्वारा धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप किया जा रहा है।
  2. अगली सुनवाई 7 अगस्त: कोर्ट ने कहा कि वह यह जांच करेगा कि क्या इन याचिकाओं में कोई ठोस कानूनी बिंदु है या नहीं। दोनों मामलों को 7 अगस्त 2026 को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

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