Self-styled Godman: मंदिर समिति के सदस्यों के खिलाफ अपनी व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं के आधार पर झूठा और बेतुका मुकदमा दर्ज कराने वाले एक स्वयंभू ढोंगी बाबा (Self-styled Godman) को एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक संदेश दिया है।
अदालतों का समय बर्बाद करने और निर्दोषों को परेशान करने की इजाजत नहीं देंगे
जिला न्यायिक मोबाइल मजिस्ट्रेट (यातायात), उधमपुर ने मंदिर समिति के सदस्यों को ₹49,000 का मुआवजा (Compensation) न देने पर कथित धार्मिक उपदेशक सीता राम दास को 30 दिन के साधारण कारावास (Simple Imprisonment) की सजा सुनाई है और उसे जिला जेल, उधमपुर भेजने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा, हिंदू धर्म इतना कमजोर और नाजुक नहीं है कि उसके नाम पर अदालतों में तुच्छ या बेतुके मुकदमे (Frivolous Cases) दायर करने की आवश्यकता पड़े। कोई भी व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत धार्मिक प्राथमिकताओं या प्रथाओं की व्याख्या दूसरों पर नहीं थोप सकता और न ही अपने निजी दीवानी (Civil) विवादों को निपटाने के लिए आपराधिक कानून का दुरुपयोग कर सकता है। अदालतों का समय बर्बाद करने और निर्दोषों को परेशान करने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।
मामला क्या है?: ‘गलत जगह स्थापित हैं शिव लिंग और शनि देव’, 9 साल बाद पहुंचे कोर्ट
यह अजीबोगरीब मामला मार्च 2026 में तब शुरू हुआ जब कथित बाबा सीता राम दास ने मंदिर समिति के 9 सदस्यों के खिलाफ एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई।
बाबा का आरोप: शिकायत में दावा किया गया था कि मंदिर में धार्मिक अनुष्ठान और मूर्तियों की स्थापना बाबा की व्यक्तिगत मान्यताओं के अनुसार नहीं की जा रही है। उसका आरोप था कि शिव लिंग, शनि देव और नंदी की मूर्तियों को ‘गलत तरीके से’ स्थापित किया गया है और उसकी इच्छा के अनुसार ‘सत्संग’ आयोजित नहीं किया जा रहा है।
विवादित बयान: शिकायत में कुछ ऐसे अनुचित बयान भी शामिल थे जिन्हें अदालत ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला और आपत्तिजनक माना।
मांगी गई सजा: बाबा ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295-A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना) और 298 सहित नए कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा चलाने की मांग की थी।
अदालत का विधिक विश्लेषण: “9 साल की देरी और दीवानी विवाद को आपराधिक रंग”
मामले की सुनवाई के दौरान मजिस्ट्रेट ने पाया कि यह शिकायत कानून और तथ्यों, दोनों ही मोर्चों पर पूरी तरह से खोखली और दुर्भावनापूर्ण थी।
लिमिटेशन एक्ट के तहत बाधित (Barred by Limitation): जिरह के दौरान यह सामने आया कि जिन घटनाओं का जिक्र शिकायत में किया गया था, वे जून 2017 की थीं। दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 468(2)(c) के तहत, 3 साल तक की सजा वाले अपराधों के लिए मुकदमा दर्ज करने की एक समय सीमा होती है। चूंकि यह मामला लगभग 9 साल बाद (मार्च 2026 में) दर्ज किया गया था, इसलिए कोर्ट ने इसे समय-बाधित मानकर खारिज कर दिया। बाबा द्वारा नए सिरे से मामला बनाने के लिए शिकायत में संशोधन करने की मांग को भी कोर्ट ने ठुकरा दिया।
कोई आपराधिक अपराध नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि मुख्य विवाद यह था कि आरोपी पक्ष बाबा के मनमुताबिक पूजा-पाठ नहीं कर रहा था। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत धार्मिक व्याख्या को लागू करवाने के लिए आपराधिक कानून का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
निजी रंजिश और सैलरी का विवाद: रिकॉर्ड से पता चला कि असली विवाद पूरी तरह से वित्तीय था। बाबा का खुद का दावा था कि मंदिर समिति उससे बिना उचित भुगतान के ‘केयरटेकर’ के रूप में काम कराना चाहती थी और उसे तय पारिश्रमिक में से केवल ₹1,700 मिले थे। कोर्ट ने कहा कि यह विशुद्ध रूप से एक दीवानी (Civil Monetary Dispute) मामला था जिसे जानबूझकर आपराधिक रंग दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का हवाला और BNSS की धारा 273 के तहत जुर्माना
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के दो ऐतिहासिक फैसलों ‘जय श्री बनाम राजस्थान राज्य’ और ‘शरीफ अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ का हवाला देते हुए कहा कि मजिस्ट्रेटों को दीवानी और आपराधिक मामलों के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझना चाहिए और दीवानी विवादों को निपटाने के लिए आपराधिक मंचों के दुरुपयोग को रोकना चाहिए।
चूंकि शिकायत पूरी तरह से दुर्भावनापूर्ण थी, इसलिए कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 273 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए शिकायतकर्ता बाबा को कारण बताओ नोटिस जारी किया।
बाबा ने बहाना बनाया कि वह अंग्रेजी नहीं जानता और एक साधु है, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए नोट किया कि उसे पर्याप्त विधिक सहायता (Legal Aid) प्रदान की गई थी।
कोर्ट ने बाबा को आदेश दिया कि वह 7 आरोपियों को ₹7,000-₹7,000 (कुल ₹49,000) का मुआवजा दो दिनों के भीतर चुकाए।
हठधर्मिता पड़ी भारी: कोर्ट रूम से सीधे जेल रवाना
जब बाबा ने तय समय में मुआवजा राशि जमा नहीं की, तो कोर्ट ने उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी कर दिया।
8 जून 2026 को जब उसे अदालत के समक्ष पेश किया गया, तब भी उसने हठधर्मिता दिखाते हुए मुआवजा राशि जमा करने से साफ इनकार कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, मजिस्ट्रेट ने उसे 8 जून से 7 जुलाई 2026 तक 30 दिनों के साधारण कारावास की सजा सुनाकर जिला जेल, उधमपुर भेज दिया। हालांकि, अदालत ने यह राहत भी दी है कि यदि वह जेल की अवधि के दौरान मुआवजे की रकम जमा कर देता है, तो उसे तुरंत रिहा कर दिया जाएगा।
विधिक फैक्ट शीट: उधमपुर कोर्ट बनाम स्वयंभू उपदेशक वाद (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | न्यायालय की विधिक स्थिति और अंतिम निर्णय |
| संबंधित न्यायालय | जिला न्यायिक मोबाइल मजिस्ट्रेट (यातायात), उधमपुर |
| सजा पाने वाला व्यक्ति | सीता राम दास (स्वयंभू धार्मिक उपदेशक) |
| आरोपी पक्ष के वकील | अधिवक्ता योग राज शर्मा (आरोपी संख्या 1, 2, 3, 5, 6, 7 और 9 के लिए) |
| शिकायतकर्ता के वकील | अधिवक्ता संजीत कुमार बाजोरिया |
| लागू विशेष धारा | धारा 273, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) [झूठे/तुच्छ मामलों में मुआवजे का प्रावधान] |
| लगाया गया जुर्माना/मुआवजा | ₹7,000 प्रति आरोपी (7 निर्दोष आरोपियों के लिए कुल ₹49,000) |
| अदालत का अंतिम आदेश | मुआवजा न देने पर 30 दिन की जेल (8 जून से 7 जुलाई 2026 तक), जिला जेल उधमपुर |
मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 273 का बेहतरीन उपयोग करते हुए यह साफ कर दिया कि यदि आप किसी निर्दोष को अदालत के चक्कर काटने पर मजबूर करेंगे, तो उसका हर्जाना आपकी जेब से ही वसूला जाएगा और कानून का अनादर करने पर जेल की हवा भी खानी पड़ेगी। यह आदेश न्यायिक शुचिता और सामाजिक सद्भाव दोनों के लिए एक स्वागत योग्य कदम है।

