मामला सारांश (At a Glance)
| पहलू | विवरण |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार एवं न्यायमूर्ति एम. जोतिरामन |
| मुख्य पक्षकार | इलावरसी (बेटी) बनाम एस. दुरैमानिकम (पिता) और एसडीएस सेल्वम (चाचा) |
| संबंधित कानून | Transfer of Property Act (Section 123) & Limitation Act, 1963 (Article 59) |
| मुख्य निर्णय | नाबालिग बेटी को दिया गया गिफ्ट डीड पूरी तरह वैध; व्यक्तिगत आय से खरीदी संपत्ति पर संयुक्त परिवार का दावा खारिज; 3 साल की सीमा समाप्त होने के बाद गिफ्ट डीड को चुनौती नहीं दी जा सकती। |
Settlement Deed: मद्रास हाईकोर्ट (Madras High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पिता वैवाहिक विवाद के समझौते के तहत अपनी नाबालिग बेटी को दान पत्र (Gift/Settlement Deed) के माध्यम से संपत्ति हस्तांतरित करता है, तो उसे तब तक संयुक्त परिवार की संपत्ति (Joint Family Property) नहीं माना जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि वह संपत्ति संयुक्त परिवार के फंड से खरीदी गई थी।
न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार (Justice N. Sathish Kumar) और न्यायमूर्ति एम. जोतिरामन (Justice M. Jothiraman) की खंडपीठ ने इस मामले में दो भाइयों की आपस में सांठगांठ (Collusion) से बेटी के हक को मारने की साजिश को भी उजागर किया और ट्रॉयल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें बेटी को संपत्ति का पूर्ण मालिक घोषित किया गया था।
अदालत के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी सिद्धांत
- संयुक्त परिवार की आय (Joint Family Nucleus) साबित करना अनिवार्य
- केवल यह कह देना कि पैतृक कृषि भूमि आवंटित हुई थी, यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि कोई दूसरी संपत्ति उसी की आय से खरीदी गई थी।
- अदालत ने माना कि पिता (एस. दुरैमानिकम) पोर्ट ट्रस्ट और TVS कंपनी में कार्यरत थे, इसलिए अधिक संभावना यही है कि उन्होंने संपत्ति अपनी व्यक्तिगत आय (Personal Income) से खरीदी थी।
- गिफ्ट डीड (Settlement Deed) तत्काल प्रभाव से लागू हस्तांतरण है
- संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 123 (Section 123, Transfer of Property Act): दान पत्र वैध होने के लिए तत्काल भौतिक कब्जा (Handing over possession) देना अनिवार्य नहीं है; केवल स्वीकृति (Acceptance) आवश्यक है।
- तलाक की कार्यवाही के समय मां (संरक्षक) ने नाबालिग बेटी की ओर से उस गिफ्ट डीड को स्वीकार किया था और इसे तलाक के फैसले में भी शामिल किया गया था, इसलिए यह तर्क पूरी तरह से खारिज कर दिया गया कि गिफ्ट पर अमल (Acted upon) नहीं हुआ था।
- दशकों बाद गिफ्ट डीड को अप्रत्यक्ष चुनौती नहीं दी जा सकती
- परिसीमा अधिनियम (Limitation Act, 1963) का अनुच्छेद 59: यदि किसी निष्पादक (Executant) को लगता है कि कोई दस्तावेज दबाव, अनुचित प्रभाव (Coercion/Undue Influence) या धोखाधड़ी से बनवाया गया है, तो उसे 3 वर्ष के भीतर कानूनी चुनौती देनी होती है। ऐसा न करने पर वह दस्तावेज निष्पादक के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी बना रहता है।
- बेटी के अधिकार को छीनने की ‘भाइयों की साजिश’
- हाई कोर्ट ने पाया कि पिता (दुरैमानिकम) ने दूसरी शादी कर ली थी और संपत्ति पर अपना कब्जा बनाए रखना चाहता था।
- इसके लिए उसने अपने भाई (एसडीएस सेल्वम) के साथ मिलकर बंटवारे का फर्जी मुकदमा (Partition Suit) दायर करवाया ताकि बेटी के हक को मारा जा सके। कोर्ट ने इसे भाइयों की आपसी सांठगांठ (Scheme/Collusion) करार दिया।
मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
- वर्ष 1989: एस. दुरैमानिकम ने अपने नाम पर एक संपत्ति (B-Schedule Property) खरीदी।
- वर्ष 2002 (वैवाहिक समझौता): पत्नी से तलाक/विवाद के दौरान दुरैमानिकम ने अपनी 10 वर्षीय नाबालिग बेटी इलावरसी (Ilavarasi) के नाम एक पंजीकृत ‘गिफ्ट सेटलमेंट डीड’ निष्पादित किया।
- वयस्क होने पर मुकदमा: बालिग होने के बाद इलावरसी ने संपत्ति के स्वामित्व (Title) और कब्जे (Possession) के लिए मुकदमा दायर किया।
- चाचा और पिता का विरोध: दुरैमानिकम के भाई सेल्वम ने यह दावा करते हुए बंटवारे का मुकदमा ठोका कि संपत्ति संयुक्त परिवार के फंड से खरीदी गई थी, इसलिए भाई (दुरैमानिकम) इसे अकेले अपनी बेटी को दान में नहीं दे सकता था।
- ट्रायल कोर्ट व हाई कोर्ट का फैसला: निचली अदालत ने सेल्वम के बंटवारे के मुकदमे को खारिज कर दिया और इलावरसी के पक्ष में फैसला सुनाया। मद्रास हाई कोर्ट ने भी दुरैमानिकम और सेल्वम की अपीलों को खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह सही माना।

