Friday, June 26, 2026
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Commodity Market: कच्चे तेल की कीमतों के शून्य से नीचे चले जाने पर कीमत निपटान को क्यों दी गई चुनौती, यहां पढ़िए

Commodity Market: बॉम्बे हाईकोर्ट ने साल 2020 में कोविड-19 महामारी के चरम के दौरान कमोडिटी मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों के शून्य से नीचे चले जाने (Negative Pricing) के ऐतिहासिक मामले में एक बेहद बड़ा विधिक फैसला सुनाया है।

Commodity Market में चल रहे कच्चे तेल की कीमत का मामला

अदालत ने कमोडिटी ट्रेडर्स की उन सभी याचिकाओं को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसमें मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) द्वारा अप्रैल 2020 के क्रूड ऑयल फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स को नकारात्मक कीमत पर सेटल (निपटान) करने के फैसले को चुनौती दी गई थी।

घाटा होने पर Commodity Market की अंतिम स्थिति को नहीं बदल सकते

जस्टिस आर.आई. छागला और जस्टिस अद्वैत एम. सेठना की खंडपीठ ने ‘धनेरा डायमंड्स’ (Dhanera Diamonds) और कई अन्य ब्रोकर्स व ट्रेडर्स द्वारा भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) और MCX के खिलाफ दायर रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए विधिक व्यवस्था दी कि बाजार के परिपक्व व्यापारियों (Sophisticated Traders) को जोखिमों का अच्छी तरह पता होता है, इसलिए घाटा होने पर बाजार की अंतिम स्थिति (Market Finality) को कानूनन बदला या पलटा नहीं जा सकता।

मामला क्या था? जब पहली बार Commodity Market में ‘माइनस’ में बिका था कच्चा तेल

यह कानूनी विवाद अप्रैल 2020 में वैश्विक स्तर पर आए एक अप्रत्याशित वित्तीय झटके से जुड़ा है।

ऐतिहासिक गिरावट: 20 अप्रैल 2020 को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ‘न्यूयॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज’ (NYMEX) पर कच्चे तेल की कीमतें इतिहास में पहली बार शून्य से नीचे यानी माइनस (-) $37 प्रति बैरल तक गिर गई थीं क्योंकि लॉकडाउन के कारण तेल की मांग खत्म हो गई थी और उसे स्टोर करने की जगह नहीं बची थी।

MCX का सर्कुलर: चूंकि भारत में MCX पर क्रूड ऑयल फ्यूचर्स की कीमत NYMEX के बेंचमार्क से तय होती है, इसलिए MCX ने 21 अप्रैल 2020 को एक सर्कुलर जारी कर उस दिन के कॉन्ट्रैक्ट्स को माइनस (-) 2,884 रुपये प्रति बैरल के ‘ड्यू डेट रेट’ (DDR) पर सेटल करने का आदेश दिया।

ट्रेडर्स का नुकसान और मांग: इस अभूतपूर्व फैसले से कई भारतीय ट्रेडर्स और ब्रोकर्स को भारी वित्तीय नुकसान हुआ। उन्होंने सेबी (SEBI) से इन ट्रेडों को रद्द (Annul) करने की मांग की थी। सेबी के इनकार के बाद वे हाई कोर्ट पहुंचे, जहां उनके पक्ष में वरिष्ठ अधिवक्ता डेरियस खंबाटा और पी.एन. मोदी ने दलीलें दीं।

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अदालत का विधिक व व्यावसायिक विश्लेषण: “मुनाफे के चांस में खुद रुके रहे ट्रेडर्स”

जस्टिस आर.आई. छागला और जस्टिस अद्वैत एम. सेठना ने सेबी और एक्सचेंज (जिनका पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता मुस्तफा डॉक्टर, जाल अंध्यारुजिना और जनक द्वारकादास ने रखा) के तर्कों से सहमति जताते हुए विधिक सिद्धांत तय किए।

खुद लिया गया जोखिम, तो अब पीछे नहीं हट सकते

जस्टिस छागला ने अपने विधिक मत में कहा कि याचिकाकर्ता कोई आम मासूम निवेशक नहीं, बल्कि बाजार के चतुर और परिपक्व वाणिज्यिक व्यापारी (Sophisticated Commercial Traders) हैं। व्यापारियों ने कीमतों में अचानक सुधार (Recovery) की उम्मीद में कॉन्ट्रैक्ट की एक्सपायरी (परिपक्वता अवधि) तक अपनी नेट लॉन्ग पोजीशन (खरीदे हुए सौदे) को बनाए रखने का विकल्प खुद चुना। वे सचेत रूप से चांस ले रहे थे और उन्होंने अपने सौदों को स्क्वायर-ऑफ (काटना) नहीं किया। अब जब बाजार उनकी उम्मीद के विपरीत चला गया, तो वे यह तर्क नहीं दे सकते कि इन सौदों को नकारात्मक दर पर सेटल नहीं किया जा सकता।

दूसरे पक्ष के मुनाफे को छीनना (Disgorgement) अनुचित होगा

अदालत ने रेखांकित किया कि यदि आज इन सौदों को रद्द किया जाता है, तो बाजार के उस दूसरे पक्ष (Counterparties) के साथ भारी अन्याय होगा जिन्होंने इस सर्कुलर के तहत नियमबद्ध तरीके से अपना मुनाफा बुक किया है। अगर सौदे रद्द किए जाते हैं, तो उन ब्रोकर्स और क्लाइंट्स पर गंभीर और प्रतिकूल प्रभाव पड़ता जिन्होंने सर्कुलर को स्वीकार कर अपना सेटलमेंट पूरा कर लिया था। बिना किसी गलती के उनका मुनाफा उनसे छीन लिया जाता, जो कानूनन गलत है।

नियमों में कोई अस्पष्टता नहीं और जनहित का अभाव

जस्टिस सेठना ने अपने सहमत विधिक मत में स्पष्ट किया कि MCX का अप्रैल 2020 का सर्कुलर पूरी तरह से नियमों के दायरे में था। इसके अलावा, ऐसा कोई विधिक दस्तावेज या सामग्री नहीं है जो यह साबित करे कि कच्चे तेल की कीमतें कभी नकारात्मक नहीं हो सकतीं। कोर्ट ने कहा कि यह विशुद्ध रूप से एक कमर्शियल और मुनाफे से जुड़ा मामला है, जिसमें हस्तक्षेप करने का कोई जनहित (Public Interest) नहीं बनता।

अदालत का अंतिम निष्कर्ष: “एक रिट कोर्ट होने के नाते, हम उन व्यापारियों या उनके समूहों को बचाने के लिए आना उचित, न्यायसंगत या समीचीन नहीं समझते जो बाजार की स्थिति प्रतिकूल होने और खुद को वित्तीय नुकसान होने पर अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं।”

Commodity Market: केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक श्रेणियां / बिंदुबॉम्बे उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (जून 2026)
संबंधित अदालतबॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court), मुंबई
माननीय न्यायाधीशजस्टिस आर.आई. छागला और जस्टिस अद्वैत एम. सेठना (खंडपीठ)
मामले का शीर्षकधनेरा डायमंड्स और अन्य बनाम सेबी और अन्य [Dhanera Diamonds & Ors v. SEBI & Ors]
विवादित विषयMCX द्वारा अप्रैल 2020 के क्रूड ऑयल सौदों को माइनस (-) कीमतों पर सेटल करने का फैसला।
मुख्य कानूनी सिद्धांतकमोडिटी ट्रेडिंग में वित्तीय जोखिम अंतर्निहित है; अप्रत्याशित व्यावसायिक घाटे के आधार पर सेबी को वैध सौदे रद्द करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।
अदालत का अंतिम आदेशट्रेडर्स की सभी रिट याचिकाएं पूरी तरह खारिज (Dismissed)

विश्व का Commodity Market और भारत में कच्चे तेल की कीमत

कमोडिटी मार्केट (Commodity Market) में इन दिनों कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें भारी उतार-चढ़ाव और बड़ी गिरावट के दौर से गुजर रही हैं। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में जो युद्ध-कालीन प्रीमियम (War-risk Premium) जुड़ा था, वह अब लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका है।

कच्चे तेल की कीमतों के इस पूरे मामले को कुछ मुख्य बिंदुओं के जरिए आसानी से समझा जा सकता है।

कीमतों में भारी गिरावट का रुख

मई और जून के शुरुआती हफ्तों की तुलना में अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क कच्चे तेल के दामों में भारी कमी आई है।

ब्रेंट क्रूड (Brent Crude): जो तेल मार्च से जून के शुरुआत तक लगभग $99 से $109 प्रति बैरल के बीच बना हुआ था, वह अब गिरकर $72 से $75 प्रति बैरल के आसपास आ गया है।

WTI क्रूड (West Texas Intermediate): अमेरिकी क्रूड भी फिसलकर $69 से $71 प्रति बैरल के दायरे में कारोबार कर रहा है।

SBI और वैश्विक एजेंसियों का अनुमान: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) और जेपी मॉर्गन जैसी वैश्विक संस्थाओं की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, बाजार में सप्लाई अधिक होने के कारण ब्रेंट क्रूड आने वाले समय में $50 से $60 प्रति बैरल के स्तर तक भी नीचे आ सकता है।

कीमतों में गिरावट के मुख्य कारण

कमोडिटी मार्केट में अचानक आई इस मंदी के पीछे कुछ बड़े भू-राजनीतिक (Geopolitical) और आर्थिक कारण हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का खुलना: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही फिर से सामान्य हो रही है। इस रास्ते के खुलने से खाड़ी देशों से अटका हुआ लाखों बैरल कच्चा तेल अचानक वैश्विक बाजार में आ गया है, जिससे ‘ओवरसप्लाई’ (जरूरत से ज्यादा आपूर्ति) की स्थिति बन गई है।

रूस द्वारा दोबारा डिस्काउंट शुरू करना: ईरान संकट के दौरान रूस अपने कच्चे तेल पर भारी प्रीमियम (महंगा दाम) वसूल रहा था। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कीमतें गिरते ही भारत जैसे बड़े खरीदारों को लुभाने के लिए रूस ने एक बार फिर अपने कच्चे तेल पर डिस्काउंट (छूट) देना शुरू कर दिया है।

वैश्विक मांग में नरमी: दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देश चीन में आर्थिक रफ्तार सुस्त होने और दुनिया भर में तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के कारण कच्चे तेल की दीर्घकालिक मांग में कमी देखी जा रही है।

भारतीय अर्थव्यवस्था और रिफाइनिंग कंपनियों पर असर

भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। इसलिए कमोडिटी मार्केट की यह गिरावट भारत के लिए बेहद सकारात्मक है।

कंपनियों की चांदी: रूस द्वारा दोबारा डिस्काउंट देने और खाड़ी देशों से सस्ता तेल मिलने के कारण भारतीय तेल रिफाइनिंग कंपनियों (जैसे IOC, BPCL, HPCL) के प्रॉफिट मार्जिन में भारी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। सितंबर तिमाही में इन कंपनियों को मोटा मुनाफा हो सकता है।

आम जनता को राहत की उम्मीद: यदि कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह $70 के आसपास या उससे नीचे टिकी रहती हैं, तो भारत सरकार आने वाले समय में देश के रिटेल फ्यूल स्टेशनों (पेट्रोल पंपों) पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कटौती कर आम जनता को बड़ी राहत दे सकती है।

बाजार का मौजूदा रुख: हालांकि कल के आखिरी कारोबारी सत्र में बाजार के ओवरसोल्ड (बहुत ज्यादा बिकवाली) होने के कारण मामूली तकनीकी सुधार (Rebound) देखा गया है और कीमतें 2% तक संभली हैं, लेकिन कुल मिलाकर कमोडिटी मार्केट में कच्चे तेल का शॉर्ट-टू-मीडियम टर्म आउटलुक मंदी (Bearish) का ही बना हुआ है।

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