NEET-UG Exam Reservation: वरिष्ठ नागरिकों को मेडिकल कॉलेज में प्रवेश सुरक्षित करने का कोटा मिले, इसी तार्किक और अनूठे विधिक सवाल के साथ 71 वर्षीय नीट अभ्यर्थी अशोक बहार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ का दरवाजा खटखटाया है।
NEET-UG में शामिल होने के लिए कोई ऊपरी आयु सीमा नहीं है
71 वर्षीय नीट अभ्यर्थी अशोक बहार ने एक रिट याचिका दायर कर स्नातक चिकित्सा (MBBS) प्रवेश में पात्र वरिष्ठ नागरिकों के लिए 1 प्रतिशत अलग कोटा (Senior Citizen Quota) निर्धारित करने की मांग की है। अदालत इस मामले पर 21 जुलाई 2026 को सुनवाई करने वाली है। याचिका में कहा, यदि नेशनल एलिजिबिलिटी-कम-एंट्रेंस टेस्ट (NEET-UG) में शामिल होने के लिए कोई ऊपरी आयु सीमा (Upper Age Limit) नहीं है, तो बुजुर्ग उम्मीदवारों को मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश सुरक्षित करने के लिए एक समर्पित आरक्षण क्यों नहीं मिलना चाहिए? जब विभिन्न श्रेणियों को विशेष रियायतें दी जाती हैं, तो वरिष्ठ नागरिकों को इस लाभ से बाहर क्यों रखा गया है?
याचिका का मुख्य विधिक आधार: जब उम्र की सीमा नहीं, तो अवसर में असमानता क्यों?
अशोक बहार की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता पंकज धीर सिंह राणा ने याचिका में माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के उस ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया है, जिसके तहत नीट-यूजी परीक्षा के लिए ऊपरी आयु सीमा को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया था।
याचिका में निम्नलिखित मुख्य बिंदु उठाए गए हैं।
तार्किक निरंतरता का अभाव: जब देश का कानून किसी वरिष्ठ नागरिक को चिकित्सा प्रवेश परीक्षा में बैठने की अनुमति देता है, तो उसे तार्किक मुकाम तक पहुँचाने के लिए एक ऐसी सहायक नीति भी होनी चाहिए जो उनके प्रवेश की संभावनाओं को सुगम बनाए।
संवैधानिक समानता: समाज के अन्य वर्गों की तरह ही बुजुर्ग उम्मीदवारों को भी समान अवसर प्रदान करने के लिए एक निश्चित विधिक आरक्षण या रियायत की आवश्यकता है, ताकि वे युवा प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी चिकित्सा सेवा की इच्छा को पूरा कर सकें।
50 साल पुराना सपना: 1974 से 2026 तक का अटूट संघर्ष
अशोक बहार की यह विधिक लड़ाई केवल एक नीतिगत मांग नहीं है, बल्कि पांच दशकों से संजोए गए एक व्यक्तिगत सपने का हिस्सा है।
पहला प्रयास: उन्होंने पहली बार वर्ष 1974 में मेडिकल प्रवेश परीक्षा दी थी, लेकिन तब वे असफल रहे।
अधूरी कोशिशें: वर्ष 2023 में उन्होंने दोबारा प्रयास किया, लेकिन परीक्षा केंद्र की दूरी अधिक होने और देर से पहुँचने के कारण वे परीक्षा में शामिल नहीं हो सके।
नीट 2026: इस साल मई में आयोजित हुई NEET-UG 2026 परीक्षा में वह पूरे जज्बे के साथ शामिल हुए और अब अपनी विधिक लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं।
पारिवारिक प्रेरणा: बहार की दिवंगत माता सावित्री देवी (जिनका निधन 1990 में हुआ) उन्हें डॉक्टर बनते देखना चाहती थीं। बाद में उनकी पत्नी डॉ. मंजू बहार ने उन्हें इस उम्र में भी अपने सपने को पुनर्जीवित करने के लिए प्रेरित किया। उल्लेखनीय है कि उनके परिवार में लगभग 20 डॉक्टर हैं, जिनमें से कई विदेशों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
बहुमुखी प्रतिभा: वैज्ञानिक, वकील, कॉर्पोरेट लीडर और अब मेडिकल छात्र बनने की चाह
71 वर्षीय अशोक बहार का शैक्षणिक और व्यावसायिक सफरनामा किसी भी युवा के लिए प्रेरणादायक है।
शैक्षणिक योग्यता: उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से बॉटनी, जूलॉजी और केमिस्ट्री में बीएससी (BSc) किया है। इसके अलावा उनके पास कंप्यूटर एप्लीकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा, एलएलबी (LLB) और एमबीए (MBA) की डिग्रियां हैं।
व्यावसायिक अनुभव: वह सरकारी उपक्रम ‘इंडियन ड्रग्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड’ (IDPL) में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मार्केटिंग हेड रह चुके हैं।
विधिक और प्रशासनिक सेवा: स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेने के बाद, उन्होंने विदेश मंत्रालय (MEA) के साथ एक सलाहकार के रूप में भी काम किया और वर्तमान में वह स्वयं इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक अधिवक्ता के रूप में प्रैक्टिस कर रहे हैं।
विधिक फैक्ट शीट: वरिष्ठ नागरिक बनाम नीट यूजी आरक्षण वाद (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | वर्तमान विधिक याचिका और आधिकारिक विवरण |
| संबंधित न्यायिक क्षेत्राधिकार | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ), उत्तर प्रदेश |
| याचिकाकर्ता | अशोक बहार (71 वर्षीय नीट-यूजी 2026 अभ्यर्थी व अधिवक्ता) |
| मांगा गया आरक्षण कोटा | 1% सीट आरक्षण (एमबीबीएस प्रवेश में वरिष्ठ नागरिकों हेतु) |
| विधिक प्रतिनिधि | अधिवक्ता पंकज धीर सिंह राणा |
| सुनवाई की निर्धारित तिथि | 21 जुलाई 2026 |
| मुख्य कानूनी नजीर | सुप्रीम कोर्ट का फैसला: नीट परीक्षा हेतु ऊपरी आयु सीमा का उन्मूलन |
हालांकि, भारत में चिकित्सा सीटों की भारी कमी और युवाओं के रोजगार से जुड़े होने के कारण अदालत के लिए इस पर फैसला लेना एक बड़ी विधिक चुनौती होगी। 21 जुलाई को इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख यह तय करेगा कि क्या भारत की न्यायपालिका बुजुर्गों की ‘सक्रिय उम्र बढ़ने’ (Active Ageing) और उनके ज्ञान को चिकित्सा क्षेत्र में उपयोग करने के लिए नए विधिक आयाम खोलने को तैयार है या नहीं।

