Monday, July 20, 2026
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Open Terraces: नागरिकों की दो श्रेणियां नहीं हो सकतीं…एक कानून को ताक पर रखे तो दूसरे पर कानून का चलें हंटर, घरों में अवैध बदलावों पर तल्ख

Open Terraces: फ्लैटों और सोसायटियों में होने वाले अवैध निर्माण और ढांचागत बदलावों (Illegal Structural Modifications) पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को एक कड़ा और दूरगामी निर्देश दिया है।

किस तरह के बदलाव पूरी तरह प्रतिबंधित होंगे

हाईकोर्ट के जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाता की खंडपीठ ने 16 जुलाई 2026 के अपने फैसले में राज्य सरकार को व्यापक और स्पष्ट गाइडलाइंस (Comprehensive Guidelines) बनाने का आदेश दिया है, ताकि यह तय किया जा सके कि किसी फ्लैट या इमारत में किस तरह के बदलावों की अनुमति दी जा सकती है और किस तरह के बदलाव पूरी तरह प्रतिबंधित होंगे।

आवासीय परिसरों में मनमर्जी से बदलाव करना एक आम बात बन गई: अदालत

अदालत ने कहा, आजकल फ्लैट मालिकों द्वारा खुली छतों (Open Terraces) को कवर करना या आवासीय परिसरों में मनमर्जी से बदलाव करना एक आम बात बन गई है। लेकिन देश में नागरिकों की दो श्रेणियां नहीं हो सकतीं—एक वो जो कानून का पालन करते हैं और दूसरे वो जो खुलेआम उसकी धज्जियां उड़ाते हैं। नगर निकायों का कानून सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए, न कि केवल उन लोगों पर जिनकी शिकायतें दर्ज की जाती हैं।”

मामला क्या है?: नवीनीकरण की आड़ में 800 वर्ग फुट का अवैध कमरा

यह मामला पनवेल नगर निगम (PMC) के तहत कलंबोली इलाके की एक आवासीय इमारत से जुड़ा है।

याचिकाकर्ता की शिकायत: वर्ष 2024 में एक फ्लैट मालिक ने अपने से एक मंजिल नीचे रहने वाले पड़ोसी के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। आरोप था कि पड़ोसी ने ‘रेनोवेशन’ (नवीनीकरण) की आड़ में बिना किसी प्रशासनिक अनुमति के दीवारों को तोड़ दिया और खुली छत को कवर करके 800 वर्ग फुट का एक अवैध कमरा बना लिया, जिससे पूरी इमारत की ढांचागत स्थिरता (Structural Stability) को खतरा पैदा हो गया।

सोसायटी और निगम की ढिलाई: याचिकाकर्ता ने बताया कि वह 2019 से इसकी शिकायत कर रहा था, लेकिन हाउसिंग सोसायटी की प्रबंध समिति ने कोई कार्रवाई नहीं की। नगर निगम ने 2021 में इस अवैध निर्माण को एक बार गिराया था, लेकिन फ्लैट मालिक ने दोबारा वहां शेड खड़ा कर लिया और अक्टूबर 2022 में निचली अदालत (Trial Court) से यथास्थिति (Status Quo) का आदेश हासिल कर लिया।

आरोपी का कुतर्क: मौजूदा फ्लैट मालिक ने दलील दी कि यह बदलाव पुराने मालिक ने किए थे और इमारत में “ज्यादातर लोगों” ने अपनी छतें कवर कर रखी हैं, इसलिए केवल उसे ही निशाना (Singled Out) बनाया जा रहा है।

हाई कोर्ट की तीखी टिप्पणी: अवैध निर्माण को ‘दूसरों ने भी किया है’ कहकर सही नहीं ठहरा सकते

जस्टिस ए.एस. गडकरी द्वारा लिखे गए फैसले में कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया और नगर निकायों व दीवानी अदालतों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए।

चुनिंदा प्रवर्तन गलत: कोर्ट ने कहा कि बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध निर्माणों को केवल इसलिए जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि वैसी ही अवैधता कई अन्य लोगों ने भी की है।

अदालती आदेशों का दुरुपयोग: बेंच ने इस बात पर गहरा खेद व्यक्त किया कि कई मामलों में नागरिक निकायों की निष्क्रियता या अधिकारियों की मूक सहमति (Official Acquiescence) के कारण अवैध निर्माण फलते-फूलते हैं। इसके बाद दीवानी अदालतों से मिलने वाले ‘स्टे ऑर्डर’ या ‘यथास्थिति’ के आदेशों के कारण कानून का पालन करने वाले ईमानदार नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं।

समान कार्रवाई के निर्देश: हाई कोर्ट ने पनवेल नगर निगम (PMC) को उस विवादित 800 वर्ग फुट के अवैध निर्माण को तुरंत ध्वस्त करने का आदेश देने के साथ-साथ पूरी इमारत में मौजूद ऐसे सभी अवैध निर्माणों की जांच कर उन पर बिना किसी भेदभाव के समान कानूनी कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।

महाराष्ट्र सरकार को निर्देश: परमिशन प्रोसेस को पारदर्शी और सुलभ बनाएं

हाई कोर्ट ने माना कि वर्तमान में फ्लैटों के भीतर सुरक्षा ग्रिल लगाने, शेड डालने, जिप्सम या लकड़ी की शीट से पार्टीशन बदलने जैसी चीजों के लिए कोई स्पष्ट, आसानी से सुलभ और सस्ती विधिक प्रक्रिया उपलब्ध नहीं है। इसी प्रशासनिक जटिलता के कारण नागरिक अवैध रास्तों का चुनाव करते हैं। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि आगामी नियामक ढांचे (Regulatory Framework) में दो चीजों के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए।

गैर-ढांचागत बदलाव: वे मामूली बदलाव जिनसे इमारत की मजबूती, लोड-बेयरिंग कैपेसिटी या सुरक्षा पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता (जैसे ग्रिल या आंतरिक विभाजन)।

ढांचागत बदलाव: वे गंभीर बदलाव (जैसे पिलर या बीम काटना, आरसीसी स्लैब पर अतिरिक्त भारी कमरा बनाना) जो पूरी इमारत को कमजोर करते हैं और उसमें रहने वाले अन्य नागरिकों की जान जोखिम में डालते हैं। जब तक यह नया नियामक ढांचा लागू नहीं हो जाता, तब तक मौजूदा कानून के तहत बिना अनुमति किए गए हर एक अवैध निर्माण को पूरी सख्ती से निपटाया जाएगा।

विधिक फैक्ट शीट: बॉम्बे हाई कोर्ट बनाम अवैध आवासीय संशोधन वाद (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय
संबंधित न्यायिक क्षेत्राधिकारबॉम्बे उच्च न्यायालय (खंडपीठ), मुंबई, महाराष्ट्र
माननीय न्यायाधीशजस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाता
प्रतिवादी प्रशासनिक संस्थामहाराष्ट्र सरकार और पनवेल नगर निगम (PMC)
मुख्य कानूनी चिंताभवनों की ढांचागत स्थिरता (Structural Stability) और चुनिंदा कानून प्रवर्तन
अदालत का मुख्य निर्देशअनुमेय (Permissible) और प्रतिबंधित संशोधनों के लिए स्पष्ट गाइडलाइंस तैयार करना
समानता का सिद्धांतनगर पालिका कानून सभी नागरिकों पर एक समान रूप से लागू होना अनिवार्य

अदालत ने ‘उसने भी किया है तो मैं भी करूँगा’ वाले कुतर्क को खारिज करके यह साफ कर दिया है कि एक अवैध काम दूसरे अवैध काम का विधिक औचित्य नहीं हो सकता। सरकार द्वारा जब यह गाइडलाइंस बनाई जाएंगी, तो इससे न केवल आम नागरिकों को परमिशन लेने में आसानी होगी, बल्कि बिल्डरों और सोसायटियों के बीच होने वाले अंतहीन मुकदमों पर भी लगाम लगेगी।

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