Women Advocates: सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के थानों में महिला अधिवक्ताओं (Women Advocates) की सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश तय करने की मांग वाली एक याचिका पर बेहद अहम कदम उठाया है।
केंद्र व राज्य सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने अधिवक्ता गीता जैन अग्रवाल द्वारा दायर इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। शीर्ष अदालत ने इस संबंध में केंद्र सरकार (Union Government) और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर 4 सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।
याचिका की मुख्य मांग क्या है?
मांग: यह याचिका देश भर के पुलिस थानों में, विशेष रूप से देर शाम और रात के समय, अपने मुवक्किलों (Clients) की पैरवी के लिए जाने वाली महिला वकीलों की सुरक्षा, सम्मान और संरक्षण के लिए एकसमान राष्ट्रीय दिशानिर्देश (Uniform National Guidelines) और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार करने की मांग करती है।
याचिका में कहा गया है: अधिवक्ता, कोर्ट के अधिकारी (Officers of the Court) के रूप में न्याय वितरण प्रणाली का एक अभिन्न हिस्सा हैं और उन्हें अक्सर थानों का दौरा करना पड़ता है। लेकिन राज्य-नियंत्रित इन थानों में सुरक्षा के लिए किसी विशिष्ट कानूनी ढांचे के अभाव में, महिला वकीलों को उत्पीड़न, डराने-धमकाने और दुर्व्यवहार के खतरों का सामना करना पड़ता है।
विशाखा गाइडलाइंस (Vishaka Case) से तुलना
याचिका में विशाखा बनाम राजस्थान राज्य के ऐतिहासिक मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया गया है कि थानों के भीतर महिला वकीलों की सुरक्षा को लेकर वर्तमान में एक विधिक शून्यता (Legislative Vacuum) यानी कानून का अभाव है। हालांकि आपराधिक कानून (जैसे BNSS/CrPC) रात के समय महिलाओं की गिरफ्तारी को प्रतिबंधित करने का एक सीमित सुरक्षा कवच देता है, लेकिन यह सुरक्षा केवल ‘गिरफ्तारी’ तक सीमित है। थानों में अपने पेशेवर दायित्वों के लिए जाने वाली महिला अधिवक्ताओं के साथ पुलिस अधिकारियों के व्यवहार को विनियमित करने के लिए कोई नियम नहीं हैं।
हालिया घटनाओं का हवाला (Shocking Incidents Cited)
- रेखांकित: याचिका में देश के विभिन्न हिस्सों में महिला वकीलों के साथ पुलिस थानों के भीतर हुए दुर्व्यवहार की हालिया और गंभीर घटनाओं को रेखांकित किया गया है।
- कर्नाटक (23 फरवरी 2025): एक पुलिस थाने के भीतर एक पुलिस अधिकारी द्वारा महिला अधिवक्ता के साथ कथित तौर पर शारीरिक मारपीट की गई। बाद में कर्नाटक हाई कोर्ट ने आरोपी पुलिस अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया था।
- गुरुग्राम, सेक्टर 50 (21 मई 2025): तीस हजारी बार एसोसिएशन की एक महिला कार्यकारी सदस्य को अपने मुवक्किल की मदद करने के दौरान महिला पुलिसकर्मियों द्वारा शारीरिक रूप से और पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा कथित तौर पर यौन प्रताड़ित (Sexual Assault) किया गया और अवैध हिरासत में रखा गया।
- नोएडा, सेक्टर 126 (3 दिसंबर 2025): एक एफआईआर के सिलसिले में अपने क्लाइंट का प्रतिनिधित्व करने गई एक महिला वकील को थाने के भीतर उत्पीड़न, मारपीट और हिरासत का सामना करना पड़ा। याचिका में दलील दी गई है कि इस तरह की घटनाओं के कारण महिला वकीलों के मन में एक डर (Chilling Effect) पैदा होता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g) (पेशा चुनने की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
याचिका में सुझाए गए प्रमुख सुरक्षा उपाय (Proposed Safeguards)
- निर्देश: याचिकाकर्ता ने थानों को अधिक सुरक्षित और जवाबदेह बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से निर्देश जारी करने की मांग की है।
- ऑडियो-विजुअल सीसीटीवी (CCTV): महिला वकीलों के साथ होने वाली सभी बातचीत की अनिवार्य ऑडियो रिकॉर्डिंग के साथ सीसीटीवी कवरेज हो और उस फुटेज को सुरक्षित रखा जाए।
- महिला पुलिसकर्मी की उपस्थिति: देर रात की बातचीत के दौरान कम से कम एक महिला पुलिस अधिकारी की उपस्थिति अनिवार्य हो। अलग बातचीत कक्ष (Separate Interaction Rooms): वकीलों और मुवक्किलों की बातचीत के लिए थानों में अलग और सुरक्षित कमरे हों।
- स्वतंत्र शिकायत तंत्र: पुलिस दुर्व्यवहार के खिलाफ शिकायतों के निपटारे के लिए एक स्वतंत्र और समयबद्ध शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया जाए।
- आपातकालीन पैनिक बटन: थानों में वकीलों के लिए आपातकालीन पैनिक-अलर्ट (Emergency Panic-Alert) सिस्टम हो।
- डिजिटल एंट्री ट्रैकिंग: थानों में वकीलों के आने-जाने का डिजिटल रिकॉर्ड रखा जाए और स्टेशन डायरी में प्रविष्टि दर्ज हो।
- सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम: पुलिस कर्मियों के लिए समय-समय पर जेंडर-सेंसिटाइजेशन (लैंगिक संवेदीकरण) कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।
मामले की कानूनी पैरवी (Legal Representation)
- याचिकाकर्ता: अधिवक्ता गीता जैन अग्रवाल (याचिकाकर्ता स्वयं)।
- याचिका दाखिल की गई: एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) प्रवीर चौधरी के माध्यम से।
- याचिका का मसौदा तैयार किया: अधिवक्ता रीपक कंसल।
- प्रतिवादी (Respondents): भारत संघ (Union of India), बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), और सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारें।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| सुप्रीम कोर्ट बेंच | जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता |
| याचिकाकर्ता | अधिवक्ता गीता जैन अग्रवाल |
| मुख्य मुद्दा | थानों में महिला वकीलों की सुरक्षा और गरिमा के लिए राष्ट्रीय एसओपी (SOP) की कमी। |
| संवैधानिक आधार | भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 21 |
| कोर्ट का वर्तमान आदेश | केंद्र और सभी राज्यों को नोटिस जारी; 4 सप्ताह में जवाब मांगा। |
निष्कर्ष (Takeaway)
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस याचिका पर नोटिस जारी करना देश की हजारों महिला वकीलों के लिए एक बेहद सकारात्मक संकेत है। कानूनी पेशे में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है, लेकिन थानों का माहौल अक्सर उनके काम के आड़े आता है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में विशाखा या डी.के. बासु दिशानिर्देशों की तर्ज पर कोई कड़ा सुरक्षा ढांचा तैयार करता है, तो यह न केवल महिला अधिवक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि कानून के शासन (Rule of Law) और न्याय प्रणाली को भी अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाएगा।

