Sunday, October 4, 2026
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Biological Parent: वैवाहिक विवाद में बच्चे का पैटर्निट टेस्ट कराया जा सकता है; पति-पत्नी के एक दूसरे पर चरित्र हनन की सत्यता का मिलेगा जवाब

मामला सारांश (At a Glance)

पहलूविवरण
माननीय पीठन्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश एवं न्यायमूर्ति प्रसन्न बी. वराले
मूल अदालतेंपुणे फैमिली कोर्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट
मुख्य सिद्धांतयदि पति व्यभिचार के आधार पर तलाक मांगता है और निजी डीएनए रिपोर्ट पेश करता है, तो सत्यता जांचने के लिए कोर्ट-निर्देशित पैटर्निट टेस्ट अनिवार्य माना जाएगा।
अंतिम निर्णयमहिला की अपील खारिज; बच्चे के डीएनए टेस्ट का आदेश बरकरार।

Biological Parent: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि भले ही विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता (Legitimacy) का कानूनन पूर्वाग्रह (Presumption) होता है, फिर भी वैवाहिक विवादों में—जहां पति ने पत्नी के व्यभिचार/अनावृत्त चरित्र (Unchastity) के आधार पर तलाक मांगा हो और खुद के जैविक पिता न होने का दावा किया हो—बच्चे का डीएनए टेस्ट कराया जा सकता है।

न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश (Justice MM Sundresh) और न्यायमूर्ति प्रसन्न बी. वराले (Justice Prasanna B Varale) की पीठ ने महिला की याचिका को खारिज करते हुए पुणे फैमिली कोर्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) के डीएनए टेस्ट कराने के आदेश को बरकरार रखा।

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Biological Parent: अदालत की मुख्य टिप्पणी

  • महिला की आपत्ति पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल:“यदि आप वफादार (Loyal) हैं, तो आपको इस परीक्षण (DNA Test) पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए?”
  • सत्यता स्थापित करने का माध्यम:
    • कोर्ट ने माना कि जब तलाक का मुख्य आधार ही पत्नी के अनैतिक चरित्र का आरोप हो, तो इस बात को साबित करने के लिए केवल डीएनए जांच ही सबसे ठोस और निर्णायक साक्ष्य हो सकता है।

Biological Parent: मामले की पृष्ठभूमि और प्रमुख साक्ष्य

  1. निजी लैब रिपोर्ट बना प्राथमिक आधार: पति ने शुरुआत में हैदराबाद स्थित एक लैब से निजी तौर पर डीएनए जांच कराई थी। इस रिपोर्ट में उसकी पिता होने की संभावना शून्य (0%) आई थी। इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर उसने फैमिली कोर्ट में तलाक याचिका और कोर्ट की देखरेख में डीएनए टेस्ट का आवेदन दायर किया।
  2. प्रारंभिक मामला और ‘अत्यंत आवश्यकता’ (Eminent Need): हाई कोर्ट ने पूर्व में फैसला देते हुए कहा था कि पति ने निजी रिपोर्ट जमा करके एक मजबूत प्राथमिक मामला (Prima Facie Case) बनाया है। व्यभिचार के आरोपों को साबित करने के लिए डीएनए रिपोर्ट की ‘अत्यंत आवश्यकता’ (Eminent Need) की शर्त पूरी होती है।

महिला/पत्नी का पक्ष

पत्नी ने तर्क दिया था कि स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुसार किसी भी पक्ष को डीएनए जांच के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, और उसके पति की तलाक याचिका पर फैसला बिना पैटर्निट टेस्ट के किया जाना चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को हरी झंडी दे दी।

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