मामला सारांश (At a Glance)
| पहलू | विवरण |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति संजय करोल एवं न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह |
| संबंधित कानून | PCPNDT Act, 1994 (Section 17, 27 & 28) |
| मुख्य सिद्धांत | केवल ‘समुचित प्राधिकारी’ (AA) शिकायत दर्ज कर सकता है; पुलिस रिपोर्ट/चार्जशीट पर कोर्ट संज्ञान नहीं ले सकता। |
| पुलिस की भूमिका | प्राथमिक जांचकर्ता नहीं, केवल समुचित प्राधिकारी की सहायता हेतु पूरक भूमिका। |
Police Power Over PCPNDT Act: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पुलिस गर्भधारण-पूर्व और प्रसव-पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 (PC-PNDT Act / पीसी-पीएनडीटी एक्ट) के तहत आने वाले अपराधों के लिए सीधे प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं कर सकती और न ही मुख्य जांच एजेंसी के रूप में कार्य कर सकती है।
न्यायालय ने व्यवस्था दी कि इस कानून के तहत शिकायतों की जांच और कार्रवाई की मुख्य जिम्मेदारी केवल अधिनियम के तहत गठित ‘सक्षम प्राधिकारी’ (Appropriate Authority) की है, जबकि पुलिस की भूमिका केवल सहायक या पूरक तक ही सीमित रह सकती है।
Police Power Over PCPNDT Act: पीठ और मामले की पृष्ठभूमि
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य बनाम बृज पाल सिंह एवं अन्य मामले में यह फैसला सुनाया।
यह मामला मूल रूप से एक डॉक्टर के खिलाफ उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा 2017 में दर्ज किए गए एक आपराधिक मामले से जुड़ा था। डॉक्टर पर आरोप था कि वह कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा देने के उद्देश्य से गैरकानूनी तरीके से भ्रूण के लिंग की जांच कर रहा था। डॉक्टर ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर इस आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी।
डॉक्टर के वकील का तर्क था कि पीसी-पीएनडीटी अधिनियम की धारा 28 के तहत केवल ‘सक्षम प्राधिकारी’ (AA) ही शिकायत (Complaint Case) दर्ज करा सकता है, पुलिस एफआईआर नहीं। इस मामले में एफआईआर तहसीलदार द्वारा दर्ज कराई गई थी, जो कानूनन सक्षम प्राधिकारी नहीं थे। दूसरी ओर, राज्य सरकार का कहना था कि चूंकि इस कानून के तहत अपराध संज्ञेय (Cognizable) और गैर-जमानती (Non-Bailable) बनाए गए हैं, इसलिए पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करने और जांच करने पर कोई रोक नहीं है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख और सुप्रीम कोर्ट को संदर्भ
30 सितंबर 2024 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि पीसी-पीएनडीटी अधिनियम एक विशेष कानून है और अपने आप में एक ‘पूर्ण संहिता’ (Complete Code) है। इसमें जांच, तलाशी, जब्ती और शिकायत दर्ज कराने की पूरी प्रक्रिया निर्धारित है, जिसे केवल ‘सक्षम प्राधिकारी’ ही अंजाम दे सकता है। उच्च न्यायालय ने डॉक्टर के खिलाफ पुलिस कार्यवाही को रद्द करते हुए मामले से जुड़े तीन मुख्य कानूनी सवालों को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष निर्णय हेतु संदर्भित किया था।
यह पूरा विवाद मुख्य रूप से अधिनियम की धारा 27 और धारा 28 के बीच के तालमेल पर आधारित था।
- धारा 27: अधिनियम के तहत प्रत्येक अपराध को संज्ञेय, गैर-जमानती और गैर-समझौतावादी (Non-Compoundable) घोषित करती है।
- धारा 28: यह प्रावधान करती है कि कोई भी अदालत इस अधिनियम के तहत अपराध का संज्ञान केवल सक्षम प्राधिकारी या प्राधिकृत अधिकारी की शिकायत पर ही ले सकती है (या किसी ऐसे व्यक्ति/सामाजिक संस्था की शिकायत पर, जिसने प्राधिकारी को कम से कम 15 दिन का पूर्व नोटिस दिया हो)।
वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड नितिन सलूजा ने इस कानूनी बिंदु पर न्यायालय की सहायता हेतु एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) के रूप में अपनी भूमिका निभाई।
Police Power Over PCPNDT Act: सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीनों कानूनी सवालों के स्पष्ट उत्तर
न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा भेजे गए तीनों संदर्भों का बिंदुवार उत्तर दिया।
1. क्या अपराधों के संज्ञेय और गैर-जमानती होने मात्र से पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज की जा सकती है?
- उत्तर: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 27 और 28 की भाषा, अधिनियम के सामाजिक-कल्याणकारी उद्देश्य और इसमें शामिल चिकित्सा व तकनीकी संवेदनशीलता को देखते हुए यह स्पष्ट है कि पुलिस को इस अधिनियम के तहत जांचकर्ता नहीं बनाया गया है।
- न्यायालय ने कहा कि पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर को इस अधिनियम में तय प्रक्रिया के तहत उसके तार्किक निष्कर्ष (Logical Conclusion) तक नहीं पहुंचाया जा सकता। हालांकि, यह प्रतिबंध केवल पीसी-पीएनडीटी अधिनियम के अपराधों पर लागू होता है; सामान्य आपराधिक कानून (आईपीसी/बीएनएस आदि) के तहत आने वाले अन्य स्वतंत्र अपराधों की जांच करने के पुलिस के अधिकार में यह बाधा नहीं बनता।
2. क्या पुलिस द्वारा जांच की अनुमति है और शिकायतों की जांच कौन कर सकता है?
- उत्तर: पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 17(4) के तहत शिकायतों की जांच करना पूरी तरह से ‘सक्षम प्राधिकारी’ की वैधानिक जिम्मेदारी है।
- नियम 18A(3)(iv) भी यह अनिवार्य करता है कि पुलिस की संलिप्तता से जहां तक संभव हो बचा जाए। इसलिए पुलिस मुख्य जांच एजेंसी नहीं हो सकती। पुलिस केवल तभी सीमित या पूरक भूमिका निभाएगी, जब सक्षम प्राधिकारी द्वारा नियमों के तहत उसकी सहायता मांगी जाए।
3. क्या पुलिस जांच के बाद दाखिल चार्जशीट (आरोप पत्र) पर मजिस्ट्रेट संज्ञान ले सकते हैं?
- उत्तर: सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि धारा 28 अदालत द्वारा संज्ञान लेने पर एक पूर्ण वैधानिक रोक (Statutory Embargo) लगाती है। सक्षम मजिस्ट्रेट पुलिस द्वारा दायर चार्जशीट के आधार पर अपराध का संज्ञान नहीं ले सकते; संज्ञान केवल धारा 28 में वर्णित अधिकृत शिकायत पर ही लिया जा सकता है।
निर्णय का निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि पीसी-पीएनडीटी अधिनियम के मामलों में तकनीकी और चिकित्सीय बारीकियां शामिल होती हैं, इसलिए पुलिस की सीधी दखलंदाजी कानून की मूल भावना के विपरीत है। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के इस कानूनी निष्कर्ष की पुष्टि की कि पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती, और कतिपय कानूनी पहलुओं पर नए सिरे से निर्णय लेने के लिए मामले को पुनः उच्च न्यायालय को भेज (Remand) दिया।

