मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- इंटरनेट से अधिकार क्षेत्र का दायरा बेहद व्यापक नहीं हो सकता: कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि इंटरनेट की पहुंच या वर्ल्ड-वाइड-वेब के जरिए सुदूर क्षेत्रों तक सामान उपलब्ध होने का मतलब यह नहीं है कि क्षेत्राधिकार के कानूनी सिद्धांतों को इतना कमजोर या धुंधला कर दिया जाए कि कोई कंपनी देश में कहीं भी मुकदमा ठोक दे।
- मामले का बैकग्राउंड: HUL ने ‘क्विक लिविंग’ के एक विज्ञापन अभियान “War on What’s Hidden” के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें उसके उत्पाद (Vim & Surf Excel) को निशाना बनाने का आरोप था।
- अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति: क्विक लिविंग ने तर्क दिया कि HUL और क्विक लिविंग दोनों के पंजीकृत कार्यालय (Registered Offices) मुंबई में हैं और विवादित होर्डिंग भी मुंबई में था, इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट के पास सुनवाई का अधिकार नहीं है।
- HUL की दलील: HUL का तर्क था कि दिल्ली में उसका कॉर्पोरेट ऑफिस है और विवादित विज्ञापन यूट्यूब, इंस्टाग्राम व वेबसाइट के जरिए दिल्ली में भी एक्सेस किया जा सकता है, जहां से लोग सामान खरीद भी सकते हैं।
- पुरानों फैसलों में विरोधाभास: कोर्ट ने पाया कि दिल्ली हाईकोर्ट के ही पिछले कुछ फैसलों में विरोधाभास है—कुछ फैसलों के अनुसार वेबसाइट द्वारा विशेष रूप से उस क्षेत्र के उपभोक्ताओं को टारगेट करना जरूरी है, जबकि कुछ अन्य फैसलों के अनुसार केवल ऑनलाइन लेन-देन की सुविधा होना ही क्षेत्राधिकार तय करने के लिए काफी माना गया है।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने बौद्धिक संपदा (Intellectual Property – IP) विवादों में क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) को लेकर एक बड़ा कानूनी सवाल बड़ी पीठ (Larger Bench) को भेजा है।
न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी की एकल पीठ ने ‘हिंदुस्तान यूनिलीवर’ (HUL) द्वारा ‘क्विक लिविंग’ के खिलाफ दायर ट्रेडमार्क/विज्ञापन मुकदमे की सुनवाई करते हुए इस मुद्दे पर पूर्व के फैसलों में विरोधाभास पाया और तीन प्रमुख कानूनी प्रश्न तय कर मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष बड़ी पीठ के गठन हेतु भेजने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की है कि केवल इसलिए कि उत्पाद या विज्ञापन इंटरनेट के जरिए देश भर में देखे या खरीदे जा सकते हैं, कंपनियां पूरे भारत में किसी भी अदालत में मुकदमा दायर करने का दावा नहीं कर सकतीं [हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड बनाम क्विक लिविंग (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड]।
उच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
अदालत ने इंटरनेट के आधार पर असीमित क्षेत्राधिकार के दावे पर चिंता जताते हुए कहा: “यह स्पष्ट करना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इंटरनेट के आगमन और वर्ल्ड-वाइड-वेब के माध्यम से किसी भी सुदूर स्थान पर वस्तुओं की पहुंच के कारण, अदालतों के क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार से संबंधित कानूनी सिद्धांतों को इतना कमजोर या अस्पष्ट नहीं किया जा सकता कि कोई कॉर्पोरेशन देश के किसी भी स्थान पर मुकदमा दायर कर दे।”
पीठ ने आगे जोड़ा: “इस प्रकार का दृष्टिकोण अदालतों के क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार की मूल अवधारणा को ही पूरी तरह ध्वस्त कर देगा।”
बड़ी पीठ (Larger Bench) को भेजे गए 3 प्रमुख कानूनी प्रश्न
न्यायमूर्ति भंभानी ने अंतिम और निर्णायक विधिक व्यवस्था के लिए निम्नलिखित प्रश्न तैयार किए हैं:
- प्रावधानों का परस्पर प्रभाव: क्या IP से जुड़े मुकदमे केवल सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 20, ट्रेड मार्क्स अधिनियम की धारा 134, कॉपीराइट अधिनियम की धारा 62 से संचालित होते हैं या इन सभी प्रावधानों के पारस्परिक समन्वय (Interplay) से, और यदि हां, तो कैसे?
- पंजीकृत/प्रधान कार्यालय की अनिवार्यता: जब वाद-कारण (Cause of Action) का कोई हिस्सा पंजीकृत कार्यालय वाले स्थान पर उत्पन्न हुआ हो, तो क्या किसी कॉर्पोरेट वादी (Corporate Plaintiff) के लिए केवल वहीं मुकदमा दायर करना अनिवार्य है जहां उसका मुख्य या पंजीकृत कार्यालय स्थित है?
- ऑनलाइन लेन-देन पर लागू नियम: दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों में विरोधाभासी दृष्टिकोणों को देखते हुए, IP विवादों में ऑनलाइन लेन-देन के मामलों पर क्षेत्राधिकार का कौन सा स्पष्ट नियम लागू होना चाहिए?
मामले की पृष्ठभूमि और दोनों पक्षों की दलीलें
- विवादित विज्ञापन अभियान: HUL ने क्विक लिविंग के ‘वॉर ऑन व्हाट्स हिडन’ (War on What’s Hidden) नामक विज्ञापन अभियान पर अंतरिम रोक की मांग की थी। HUL का आरोप था कि यह अभियान उसके लोकप्रिय उत्पादों (Vim और Surf Excel) को लक्षित करता है और भ्रामक है।
- क्विक लिविंग का क्षेत्राधिकार पर विरोध: प्रतिवादी कंपनी ने दलील दी कि HUL और क्विक लिविंग दोनों के पंजीकृत कार्यालय मुंबई में हैं। विवादित होर्डिंग भी मुंबई में लगाया गया था, इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट के पास इस मुकदमे की सुनवाई का क्षेत्राधिकार नहीं है।
- HUL का तर्क: HUL ने तर्क दिया कि उसका एक कॉर्पोरेट कार्यालय दिल्ली में भी है। इसके अलावा, विज्ञापन यूट्यूब, इंस्टाग्राम और वेबसाइट के माध्यम से दिल्ली में भी देखा जा रहा है और दिल्ली के उपभोक्ता इन उत्पादों को ऑनलाइन खरीद सकते हैं, जिससे वाद-कारण का हिस्सा दिल्ली में भी बनता है।
न्यायिक निर्णयों में विरोधाभास
अदालत ने पाया कि पूर्व के कई फैसलों में यह अनिवार्य किया गया था कि वादी को यह साबित करना होगा कि वेबसाइट या विज्ञापन ने संबंधित अदालत के अधिकार क्षेत्र के उपभोक्ताओं को विशेष रूप से लक्षित (Target) किया था। वहीं, कुछ अन्य फैसलों में केवल ऑनलाइन व्यावसायिक लेन-देन पूरा करने की क्षमता को ही क्षेत्राधिकार का आधार मान लिया गया था।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने मामला लार्ज बेंच को भेजते हुए टिप्पणी की: “इंटरनेट के आगमन और वेब के जरिए कहीं भी सामान की पहुंच के कारण अदालतों के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के कानूनी सिद्धांतों को इतना हल्का नहीं किया जा सकता कि कोई भी कॉर्पोरेशन देश के किसी भी स्थान पर मुकदमा दायर कर दे। ऐसा रवैया अदालतों के क्षेत्राधिकार की मूल अवधारणा को ही हवा में उड़ा देगा।”
अगली प्रक्रिया
न्यायमूर्ति भंभानी ने अंतरिम राहत पर कोई आदेश पारित न करते हुए रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि फैसले की प्रति एक सप्ताह के भीतर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत की जाए, ताकि इन कानूनी प्रश्नों के अंतिम निपटारे के लिए एक बड़ी पीठ का गठन किया जा सके।
Territorial Jurisdiction: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| केस शीर्षक | हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड बनाम क्विक लिविंग (इंडिया) प्रा. लि. (HUL v. Kwick Living) |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी (Justice Anup Jairam Bhambhani) |
| मुख्य विवाद | विम और सर्फ एक्सेल के खिलाफ कथित भ्रामक विज्ञापन और दिल्ली कोर्ट का अधिकार क्षेत्र |
| अदालत का निर्णय | ऑनलाइन उपलब्धता के आधार पर अधिकार क्षेत्र तय करने से जुड़े 3 सवाल ‘लार्ज बेंच’ को संदर्भित। |

