Friday, August 28, 2026
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Illegal Confinement: 5 साल तक की सजा वाले अपराध में नाबालिग को न्यायिक हिरासत; पुलिस-मजिस्ट्रेटों को लापरवाह गिरफ्तारी व रिमांड पर यूं तल्ख

उच्च न्यायालय के मुख्य निर्देश (Key Guidelines)

  • सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का कड़ाई से पालन: पुलिस अधिकारियों को सतेंद्र कुमार अंतिल और अर्णेश कुमार फैसलों का ‘अक्षरश:’ (Letter and Spirit) पालन करने का आदेश दिया गया है।
  • मजिस्ट्रेटों की जिम्मेदारी: यदि पुलिस रिमांड अर्जी दाखिल करती है, तो न्यायिक अधिकारियों को जांच अधिकारी (IO) द्वारा दिए गए कारणों का गहनता से परीक्षण करना होगा।
  • नाबालिगता के दावे पर विचार: यदि किसी मामले में नाबालिग होने का मुद्दा (Plea of Juvenility) उठता है, तो अधिकारियों को कानून के अनुसार तुरंत उस पर संज्ञान लेना होगा।
  • अवैध हिरासत पर कड़ी कार्रवाई: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में किसी व्यक्ति की अवैध हिरासत (Illegal Confinement) साबित होती है, तो संबंधित पुलिस या न्यायिक अधिकारियों को बख्शा नहीं जाएगा।

प्रयागराज/लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 7 वर्ष तक की सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी और रिमांड को लेकर पुलिस प्रशासन और न्यायिक अधिकारियों के “लापरवाह और संवेदनहीन रवैये” (Careless and Callous Approach) पर गंभीर नाराजगी जताई है।

न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका का अंतिम निस्तारण करते हुए यह आदेश पारित किया। इससे पहले अदालत ने नाबालिग की जेल हिरासत को प्रथम दृष्टया पूरी तरह ‘अवैध’ पाते हुए उसे तत्काल जेल से रिहा करने का आदेश दिया था।अदालत ने एक नाबालिग (Juvenile) को बार-बार न्यायिक हिरासत में जेल भेजने के मामले में सुनवाई करते हुए स्पष्ट चेतावनी दी कि अवैध हिरासत साबित होने पर दोषी अधिकारियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।

उच्च न्यायालय की प्रमुख कानूनी टिप्पणियां

पीठ ने मजिस्ट्रेटों द्वारा यांत्रिक तरीके से रिमांड देने पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा: “यदि विद्वान मजिस्ट्रेट पाते हैं कि कथित अपराध में 7 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है, तो उन्हें रिमांड देने से बचना चाहिए। यदि कोई असाधारण या अपरिहार्य परिस्थिति हो, तो रिमांड आदेश में उसका स्पष्ट कारण दर्ज किया जाना चाहिए। इस मामले में पारित रिमांड आदेश पूरी तरह यांत्रिक हैं और प्रथम दृष्टया प्रतीत होता है कि संबंधित मजिस्ट्रेट ने अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग नहीं किया।”

अवैध हिरासत पर कड़ी चेतावनी देते हुए अदालत ने कहा: “यदि अवैध हिरासत का तथ्य स्थापित होता है, तो इसे अत्यंत गंभीरता से लिया जाएगा और दोषी अधिकारियों को बख्शा नहीं जाएगा। अतः सभी संबंधित पुलिस व न्यायिक अधिकारी इस विषय को हल्के में न लें।”

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मामले की पृष्ठभूमि और घोर प्रक्रियागत खामियां

  • अपराध और धाराएं: चार आरोपियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (FIR) में याचिकाकर्ता को आरोपी नंबर 1 बनाया गया था। शुरुआत में BNS की धारा 303(2) (चोरी – अधिकतम 3 वर्ष की सजा) और बाद में BNS की धारा 317(2) (अधिकतम 5 वर्ष की सजा) जोड़ी गई।
  • नाबालिग होने की अनदेखी: याचिकाकर्ता के ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC) के अनुसार उसकी जन्मतिथि 18 अप्रैल 2009 थी। 27 अप्रैल 2026 को दर्ज एफआईआर के समय उसकी आयु 17 वर्ष से कम थी। इसके बावजूद न तो गिरफ्तार करने वाली पुलिस ने और न ही रिमांड देने वाले मजिस्ट्रेट ने उसकी उम्र का सत्यापन किया।
  • समन/नोटिस और गिरफ्तारी के आधार का अभाव: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35(3) के तहत उपस्थिति का नोटिस देने के बजाय सीधे गिरफ्तारी की गई और उसे गिरफ्तारी का कारण (Ground of Arrest) भी नहीं बताया गया।
  • विवादित मामला: नाबालिग के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी, जिसमें पहले BNS धारा 303(2) (3 साल की सजा) और बाद में धारा 317(2) (5 साल की सजा) जोड़ी गई।
  • उम्र का सत्यापन नहीं किया गया: याचिकाकर्ता का जन्म प्रमाण पत्र/टीसी (TC) दर्शाता है कि घटना के समय उसकी उम्र 17 वर्ष से कम थी। इसके बावजूद न तो पुलिस ने और न ही रिमांड देने वाले मजिस्ट्रेट ने उसकी उम्र का सत्यापन किया और उसे वयस्क मानकर जेल भेज दिया।
  • सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का उल्लंघन: अर्णेश कुमार और सतेंद्र कुमार अंतिल मामलों में सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश हैं कि 7 साल से कम सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी अपवाद होनी चाहिए, नियम नहीं। BNSS की धारा 35(3) के तहत पहले नोटिस दिया जाना चाहिए था, जो नहीं दिया गया।
  • यांत्रिक (Mechanical) रिमांड आदेश: हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित मजिस्ट्रेटों ने बिना न्यायिक दिमाग लगाए (Without Judicial Mind) पुलिस की अर्जी पर आंख मूंदकर रिमांड मंजूर कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की खुली अनदेखी

  • ‘अर्नेश कुमार’ और ‘सतेंद्र अंतिल’ केस: सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित फैसलों के अनुसार, 7 वर्ष से कम सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी एक अपवाद है, नियम नहीं। पुलिस को धारा 35 BNSS का नोटिस देना अनिवार्य है।
  • पुलिस की खिंचाई: सुनवाई के दौरान पुलिस अधिकारी यह बताने में पूरी तरह विफल रहे कि नाबालिग की गिरफ्तारी क्यों आवश्यक थी। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि ऐसा लगता है पुलिस का कानून पढ़ने और समझने से कोई वास्ता नहीं है और वे अपनी मर्जी से काम कर रहे हैं।

न्यायिक अधिकारियों की माफी और विभागीय कार्रवाई

  • जांच अधिकारी पर कार्रवाई: अदालत को सूचित किया गया कि संबंधित जांच अधिकारी (IO) के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी कर परिनिंदा प्रविष्टि (Censure Entry) की विभागीय कार्रवाई प्रस्तावित की गई है।
  • न्यायिक अधिकारियों की माफी स्वीकार: संबंधित न्यायिक अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत स्पष्टीकरण और बिना शर्त माफी को अदालत ने इस आधार पर स्वीकार कर लिया कि यह गलती अनजाने में (Bona fide) हुई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि उनकी सेवा पंजिका (Service Record) में कोई प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज नहीं होगी, लेकिन उन्हें भविष्य में रिमांड मंजूर करते समय न्यायिक विवेक का स्पष्ट प्रयोग करने की सख्त ताकीद की।

उच्च न्यायालय द्वारा जारी अंतिम निर्देश

  1. अदालती आदेशों का अक्षरशः पालन: पुलिस विभाग ‘अर्नेश कुमार’ और ‘सतेंद्र कुमार अंतिल’ के ऐतिहासिक फैसलों का “अक्षरशः पालन” सुनिश्चित करे।
  2. रिमांड का कड़ा परीक्षण: न्यायिक अधिकारी रिमांड अर्जी पर विचार करते समय जांच अधिकारी द्वारा दिए गए कारणों का गहन और स्वतंत्र परीक्षण करें।
  3. नाबालिगता का परीक्षण: किशोर होने (Juvenility) का दावा सामने आते ही कानून के अनुसार तुरंत उम्र का सत्यापन किया जाए और किसी भी नाबालिग को जेल न भेजा जाए।
  4. कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच: पुलिस को निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता को किशोर मानकर जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत प्रक्रिया अपनाई जाए और जांच कानून के दायरे में पूरी की जाए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की पीठ ने अपने आदेश में कहा: “7 साल तक की सजा वाले अपराधों में पुलिस अधिकारियों या न्यायिक अधिकारियों के किसी भी लापरवाह या उदासीन रवैये (Careless or Callous Approach) को हल्के में नहीं लिया जाएगा। अवैध हिरासत एक गंभीर मामला है और ऐसे दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।”

एट ए ग्लान्स (At a Glance of Order)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
पीठासीन पीठन्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान एवं न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत
संबंधित धाराएंBNS धारा 303(2) [3 वर्ष सजा] व 317(2) [5 वर्ष सजा]; BNSS धारा 35
मुख्य मुद्दा7 साल से कम सजा वाले मामले में नाबालिग की अवैध गिरफ्तारी और रिमांड
अदालत का अंतिम आदेशनाबालिग की हिरासत अवैध; पुलिस और मजिस्ट्रेटों को भविष्य के लिए सख्त हिदायत।
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