Tuesday, October 27, 2026
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Text Book Row: न्यायपालिका आलोचना की विरोधी नहीं, लेकिन इसका सही मंच होना चाहिए; NCERT पाठ्यपुस्तक मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष

  • रचनात्मक आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा: अदालत ने अपने आदेश में कहा:“न्यायपालिका आलोचना की विरोधी नहीं हो सकती। निष्पक्ष, सूचित और रचनात्मक आलोचना जीवंत संवैधानिक लोकतंत्र की एक आवश्यक विशेषता है, जो जवाबदेही में योगदान देती है। हालांकि, आवश्यक यह है कि ऐसी आलोचना उचित मंच के माध्यम से उठाई जाए, न कि बिना सत्यापन के स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल की जाए।”
  • संशोधित पाठ्य सामग्री को स्वीकृति: संशोधित अध्याय को देखने के बाद पीठ ने संतोष व्यक्त किया कि नया पाठ न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका, स्वतंत्रता और जवाबदेही का संतुलित और तथ्यपरक विवरण प्रस्तुत करता है।
  • भविष्य के लिए हिदायत: अदालत ने निर्देश दिया कि सरकारी अधिकारी भविष्य में सार्वजनिक संस्थानों से जुड़ी शैक्षणिक सामग्री को प्रकाशित करने से पहले पूरी तरह से सत्यापित करने के आश्वासन से बंधे रहेंगे।

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका पर विवादित अंश से संबंधित स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामले को औपचारिक रूप से बंद कर दिया है। अदालत ने संशोधित अध्याय को संतुलित और तथ्यपरक पाते हुए NCERT और शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत बिना शर्त माफी को स्वीकार कर लिया [इन री: NCERT कक्षा 8 पाठ्यपुस्तक विवाद]।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका किसी भी रचनात्मक आलोचना से परहेज नहीं करती, लेकिन अपुष्ट और असत्यापित दावों को बच्चों के कोमल मनों के लिए तैयार स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. जीवंत लोकतंत्र में आलोचना और शैक्षणिक शुचिता का संतुलन न्यायपालिका की जवाबदेही और आलोचना के अधिकार पर पीठ ने कहा: “न्यायपालिका, एक संस्था के रूप में, आलोचना के प्रतिकूल नहीं है और न ही हो सकती है। न्यायिक कामकाज की निष्पक्ष, तथ्य-आधारित और रचनात्मक आलोचना एक जीवंत संवैधानिक लोकतंत्र का एक वैध और आवश्यक हिस्सा है, जो संस्थागत जवाबदेही और आत्म-सुधार में योगदान देती है। हालांकि, आवश्यकता यह है कि ऐसी आलोचना को एक उचित मंच और निष्पक्ष, तर्कसंगत तंत्र के माध्यम से व्यक्त किया जाए, न कि बिना किसी सत्यापन के, कोमल और सीखने वाले युवा मनों (Impressionable Minds) के लिए तैयार स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया जाए।”

2. अदालती हस्तक्षेप का कारण पीठ ने स्पष्ट किया:

  • अदालत का हस्तक्षेप जांच या आलोचना के डर से नहीं था, बल्कि बच्चों को दी जाने वाली शिक्षण सामग्री की शैक्षणिक शुचिता (Pedagogical Integrity) और तथ्यात्मक सत्यता की रक्षा के लिए था।
  • संशोधित पाठ न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका, स्वतंत्रता और अंतर्निहित जवाबदेही का एक वस्तुनिष्ठ और संतुलित विवरण प्रस्तुत करता है—जो न तो संस्था का अनावश्यक महिमामंडन करता है और न ही अनुचित रूप से इसे बदनाम करता है।

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मामले की पृष्ठभूमि और घटनाक्रम (फरवरी – सितंबर 2026)

  • विवाद की शुरुआत: फरवरी 2026 में कक्षा 8 की सोशल साइंस पाठ्यपुस्तक (Exploring Society: India and Beyond) के अध्याय “हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका” (The Role of the Judiciary in our Society) में शामिल एक उप-विषय ‘Corruption in the Judiciary’ (न्यायपालिका में भ्रष्टाचार) पर एक समाचार रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था।
  • पुस्तकों की जब्ती और अवमानना नोटिस: शीर्ष अदालत ने उस समय इस अध्याय को संस्थागत अधिकार को कमजोर करने वाला बताते हुए पाठ्यपुस्तक की सभी प्रतियों के वितरण और डिजिटल प्रसार पर तत्काल रोक लगा दी थी। साथ ही NCERT के निदेशक डॉ. दिनेश प्रसाद सकलानी और स्कूली शिक्षा विभाग को अवमानना नोटिस जारी किए गए थे।
  • 82,440 प्रतियां वापस ली गईं: केंद्र सरकार और NCERT ने अदालत को सूचित किया कि बाजार व स्कूलों में वितरित हो चुकीं 82,440 प्रतियां वापस (Recall) ले ली गई हैं।
  • विशेषज्ञ समिति द्वारा संशोधन: मार्च 2026 में अदालत के निर्देश पर एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित की गई, जिसने सीमित समयसीमा में इस पूरे अध्याय की विधिक और शैक्षणिक समीक्षा कर इसे नए सिरे से तैयार किया।

विशेषज्ञ समिति और शैक्षणिक निकायों का आभार

शीर्ष अदालत ने विवादित अध्याय को पुनर्लेखित और संतुलित करने वाली विशेषज्ञ समिति की सराहना की, जिसमें शामिल थे:

  • न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) इंदु मल्होत्रा (पूर्व न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट)
  • के.के. वेणुगोपाल (वरिष्ठ अधिवक्ता एवं भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल)
  • प्रोफेसर प्रकाश सिंह
  • एम.सी. पंत और प्रोफेसर मंजुल भार्गव के नेतृत्व वाली पुनर्गठित राष्ट्रीय पाठ्यक्रम एवं शिक्षण सामग्री समिति (NSTC)।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्देश

  1. अवमानना नोटिस वापस: NCERT निदेशक और स्कूल शिक्षा सचिव संजय कुमार द्वारा दिए गए बिना शर्त माफीनामे के बाद अदालत ने सभी कारण बताओ नोटिस वापस ले लिए।
  2. भविष्य के लिए दिशानिर्देश: अदालत ने निर्देश दिया कि भविष्य में सार्वजनिक व संवैधानिक संस्थाओं से संबंधित किसी भी शैक्षणिक सामग्री को पाठ्यक्रम में शामिल करने से पहले उचित विधिक व तथ्यात्मक सत्यापन (Vetting) की प्रक्रिया का अनिवार्य रूप से पालन किया जाए।
  3. मामला समाप्त: संशोधित अध्याय के रिकॉर्ड पर आने और सभी आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए जाने के बाद स्वतः संज्ञान याचिका को औपचारिक रूप से निस्तारित (Disposed) कर दिया गया।

यह थी सुप्रीम कोर्ट की पीठ

  • न्यायाधीश: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना।

Text Book Row:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठासीन पीठCJI सूर्यकांत, जस्टिस जयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना
मुख्य विषयNCERT कक्षा 8 की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ का पाठ
कार्रवाईअवमानना नोटिस वापस लिए गए; 82,440 प्रतियां वापस मंगवाई गईं; संशोधित पाठ को मंजूरी।
विशेषज्ञ समितिपूर्व जस्टिस इंदु मल्होत्रा, पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल और प्रो. प्रकाश सिंह
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