Friday, September 11, 2026
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Advocate Rights: वकील होने मात्र से कोई कानून से ऊपर नहीं हो जाता; पुलिस की वैध जांच से कोई विशेष छूट नहीं मिलेगी, पुलिस को यह दिया निर्देश

हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष

  • वकील कानून से ऊपर नहीं: न्यायमूर्ति संजय परिहार ने याचिकाकर्ता की दलीलों को खारिज करते हुए कहा:“केवल इसलिए कि याचिकाकर्ता एक वकील है, वह कानून से ऊपर नहीं हो जाता। अदालत का अधिकारी होने के नाते, किसी अपराध के संबंध में सच्चाई का पता लगाने के लिए जांच एजेंसी को कानूनी सहायता प्रदान करना उसका कर्तव्य है।”
  • पुलिस के लिए कानून की सीमाओं का पालन अनिवार्य: अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही नागरिक या वकील का सहयोग अनिवार्य है, लेकिन पुलिस को भी कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Procedure Established by Law) के दायरे में रहकर ही काम करना होगा।

श्रीनगर/जम्मू: जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने कानूनी पेशे और पुलिस जांच के क्षेत्राधिकार पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल एक अधिवक्ता होने के नाते कोई व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं हो जाता और न ही वह पुलिस द्वारा की जाने वाली वैध पूछताछ या जांच से किसी विशेष छूट (Immunity) का दावा कर सकता है।

न्यायमूर्ति संजय परिहार की एकल पीठ ने अधिवक्ता वसीम अहमद रेशी द्वारा पुलिस उत्पीड़न और बार-बार थाने बुलाए जाने के आरोपों को लेकर दायर रिट याचिका का निस्तारण करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने रेखांकित किया कि अदालत के एक अधिकारी (Officer of the Court) और कानून के जानकार होने के नाते एक वकील से यह अपेक्षा की जाती है कि जब सच्चाई सामने लाने के लिए आवश्यकता हो, तो वह जांच एजेंसी को कानूनी सहायता और सहयोग प्रदान करे [वसीम अहमद रेशी बनाम केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर एवं अन्य]।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक व संस्थागत टिप्पणियां

1. ‘वकील कानून से ऊपर नहीं, जांच में सहयोग अपेक्षित’ अदालत ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर टिप्पणी करते हुए कहा: “केवल इसलिए कि याचिकाकर्ता एक अधिवक्ता है, वह कानून से ऊपर नहीं हो जाता (‘Merely because the petitioner is an Advocate does not place him above the law’)। अदालत का एक अधिकारी होने और कानूनी स्थिति से भली-भांति परिचित होने के नाते एक वकील से यह अपेक्षा की जाती है कि वह किसी कथित अपराध के संबंध में सच्चाई का पता लगाने के लिए जांच एजेंसी को कानून सम्मत सहायता प्रदान करे। ऐसा सहयोग न्याय प्रशासन और अदालत के अधिकारी से अपेक्षित कर्तव्यों के पूरी तरह अनुरूप है।”

2. पुलिस जांच की कानूनी सीमाएं और प्रक्रियात्मक सुरक्षा अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच में सहयोग का दायित्व किसी व्यक्ति को कानून द्वारा प्रदत्त सुरक्षा उपायों को समाप्त नहीं करता:

  • पुलिस और जांच एजेंसियों को भी कानून के चौखटे (Within the four corners of law) के भीतर ही कार्य करना अनिवार्य है।
  • जांच एजेंसी याचिकाकर्ता से पीड़िता या केस के संबंध में कोई भी जानकारी या उपस्थिति मांगते समय कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Procedure established by law) का कड़ाई से पालन करेगी।

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मामले की पृष्ठभूमि (रामबन पॉक्सो और अपहरण मामला)

  • मूल मामला: रामबन पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 137 (अपहरण) तथा पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) की धारा 4/5 के तहत एक नाबालिग पीड़िता के संबंध में प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
  • अधिवक्ता की भूमिका: याचिकाकर्ता (अधिवक्ता वसीम अहमद रेशी) ने कथित तौर पर लापता पीड़िता की ओर से एक हलफनामा (Affidavit) तैयार/ड्राफ्ट किया था।
  • पुलिस की जांच: पुलिस के अनुसार, इस हलफनामे से यह संकेत मिला कि लापता पीड़िता याचिकाकर्ता के संपर्क में थी। इसी कारण रामबन पुलिस के निर्देश पर मागम पुलिस स्टेशन ने पीड़िता का पता लगाने के लिए अधिवक्ता से पूछताछ और सहयोग का प्रयास किया।
  • उत्पीड़न का आरोप: वकील ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि जांच की आड़ में उन्हें डराया-धमकाया जा रहा है और बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बार-बार थाने बुलाया जा रहा है।

सुनवाई और हाईकोर्ट का अंतिम निर्देश

  • सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने स्वीकार किया कि रिट याचिका दायर होने के बाद पुलिस ने उन्हें बुलाना बंद कर दिया था, लेकिन उन्होंने भविष्य में उत्पीड़न से सुरक्षा की मांग की।
  • हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए स्पष्ट निर्देश दिया कि यदि एफआईआर की जांच के दौरान भविष्य में याचिकाकर्ता की उपस्थिति या सहायता की आवश्यकता होती है, तो पुलिस इसे पूरी तरह से कानून द्वारा निर्धारित विधिक प्रक्रिया (जैसे धारा 35 BNSS / 160 CrPC के तहत विधिवत नोटिस देकर) के माध्यम से ही पूरा करेगी।

अदालत का अंतिम निर्देश

सुनवाई के दौरान वकील के वकील ने स्वीकार किया कि याचिका दायर होने के बाद पुलिस ने उन्हें बुलाना बंद कर दिया है। हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए निर्देश दिया कि यदि भविष्य में FIR की जांच के लिए याचिकाकर्ता की उपस्थिति या सहायता की आवश्यकता होती है, तो पुलिस को केवल कानूनी प्रक्रियाओं (जैसे औपचारिक नोटिस जारी करना) का पालन करते हुए ही ऐसा करना होगा।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: अधिवक्ता की उपस्थिति और जांच एजेंसी का अधिकार क्षेत्र
  • प्रासंगिक कानून: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 137, पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) की धारा 4/5, और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS)
  • पीठ: न्यायमूर्ति संजय परिहार

Advocate Rights: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतजम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति संजय परिहार
याचिकाकर्तावसीम अहमद रेशी (अधिवक्ता)
संबंधित मामला/कानूनPOCSO अधिनियम और BNS की धारा 137 के तहत दर्ज FIR
मुख्य निर्णयवकील कानून से ऊपर नहीं हैं; पुलिस उचित प्रक्रिया (Due Process) का पालन करते हुए पूछताछ कर सकती है।

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