Friday, September 11, 2026
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Legal Portal: अदालत के दिए पैराग्राफ नंबर और विराम चिह्न बदलना आपत्तिजनक; इससे फैसले का मूल अर्थ विकृत हो सकता है, अपील पर सुनवाई

‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ (Right to be Forgotten) और इण्डियन कानून की दलीलें

यह मामला एकल-पीठ के 29 मई के उस फैसले के खिलाफ अपील से जुड़ा है, जिसमें व्यक्तियों की निजता के अधिकार (Right to Privacy) के तहत ‘इंडियन कानून’ को निर्देश दिया गया था कि वह संबंधित पक्षकारों के नाम से फैसले खोजने वाली सुविधा (Name-based Search Functionality) को हटाए।

  1. इंडियन कानून का पक्ष (वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार)
    • व्यापार का अधिकार: दातार ने दलील दी कि ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ के नाम पर उनके व्यापार करने और न्यायिक रिकॉर्ड को सार्वजनिक डोमेन में मुफ्त उपलब्ध कराने के अधिकार को बाधित किया जा रहा है।
    • सर्च इंजन से अलग भूमिका: उन्होंने कहा कि Google केवल समाचार रिपोर्ट दिखाता है, जबकि इण्डियन कानून पूरा अदालती रिकॉर्ड दिखाता है। इसे न्यूज मीडिया के समान नहीं माना जा सकता।
  2. नाम-आधारित खोज पर रोक का प्रभाव: हाईकोर्ट की खंडपीठ ने माना कि यदि सभी लीगल पोर्टल्स से नाम से सर्च करने का विकल्प हटा दिया जाएगा, तो आम जनता और वकीलों के लिए किसी फैसले तक पहुंचना असंभव हो जाएगा।“यदि यह सिद्धांत सभी लीगल सॉफ्टवेयरों पर लागू कर दिया जाए, तो वकीलों की प्रैक्टिस प्रभावित होगी। यदि आप कहें कि मनुपात्रा या SCC ऑनलाइन पर केवल रिट याचिका नंबर से सर्च करें, तो आप कभी कोई फैसला नहीं ढूंढ पाएंगे। किसी को केस नंबर याद नहीं रहता।”

पैराग्राफ नंबरों में फेरबदल पर हाईकोर्ट की नाराजगी

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर ने लीगल पोर्टल्स द्वारा फैसलों में किए जाने वाले संशोधनों पर टिप्पणी की: “आप अदालत द्वारा दिए गए पैराग्राफ नंबरों को नहीं बदल सकते। मनुपात्रा और SCC ऑनलाइन अपनी मर्जी से अलग पैरा नंबर देते हैं। मैं इसे आपत्तिजनक मानता हूं। जिस तरह से आप विराम चिन्ह (Punctuation) लगाते हैं या पैरा तोड़ते हैं, उससे वह अर्थ बदल सकता है जो कोर्ट देना चाहता है। हम देखते हैं कि SCC ऑनलाइन का पैरा नंबर अलग है, मनुपात्रा का अलग है और मूल आदेश का पैरा नंबर बिल्कुल अलग होता है।”

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने ‘एससीसी ऑनलाइन’ (SCC Online) और ‘मनुपत्रा’ (Manupatra) जैसे प्रमुख लीगल रिसर्च पोर्टल्स द्वारा अदालती फैसलों की मूल प्रति (Original Order Copy) में दिए गए पैराग्राफ नंबरों और व्याकरण/विराम चिह्नों में किए जाने वाले मनमाने बदलावों पर गंभीर आपत्ति जताई है।

न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति विनोद कुमार की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी ऑनलाइन लीगल डेटाबेस ‘इंडियन कानून’ (Indian Kanoon) द्वारा सिंगल जज के 29 मई के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील की सुनवाई के दौरान की, जिसमें बंद हो चुके कानूनी मामलों के पक्षकारों की निजता और ‘भूल जाने के अधिकार’ (Right to be Forgotten) की रक्षा के लिए नाम-आधारित सर्च (Name-based Search) हटाने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने रेखांकित किया कि अदालत द्वारा तय किए गए पैराग्राफ और विराम चिह्नों (Punctuation) में फेरबदल करने से फैसले का वह वास्तविक प्रभाव और संदेश विकृत (Distort) हो सकता है जो पीठ वास्तव में व्यक्त करना चाहती थी [इंडियन कानून बनाम एक्स एवं अन्य]।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. पैराग्राफ नंबरों में फेरबदल पर आपत्ति लीगल डेटाबेस की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर ने कहा: “आप अदालत द्वारा दिए गए पैराग्राफ नंबरों को नहीं बदल सकते। मनुपत्रा और एससीसी ऑनलाइन अपनी मर्जी से अपने अलग पैराग्राफ नंबर दे देते हैं। मुझे यह आपत्तिजनक लगता है। कई बार जिस तरह से आप विराम चिह्न लगाते हैं या पैराग्राफ को तोड़ते हैं, वही उस वास्तविक प्रभाव को संप्रेषित करता है जो अदालत कहना चाहती है। हम पाते हैं कि एससीसी ऑनलाइन का पैरा नंबर अलग है, मनुपत्रा का अलग है और मूल अदालती आदेश का पैरा नंबर बिल्कुल अलग होता है।”

2. नाम-आधारित सर्च बंद होने से वकालत पर असर जब प्रतिवादी की ओर से तर्क दिया गया कि डी-इंडेक्सिंग के बाद भी केस नंबर या साइटेशन से फैसले खोजे जा सकते हैं, तो खंडपीठ ने असहमति जताते हुए कहा: “मान लीजिए कि यह सिद्धांत सभी लीगल सॉफ्टवेयर पर लागू कर दिया जाए, तो वकीलों की पूरी प्रैक्टिस चौपट (Toss) हो जाएगी। यदि आप यह कहें कि मनुपत्रा और एससीसी ऑनलाइन पर आपको केवल रिट पिटीशन नंबर से सर्च करना होगा, तो आप कभी कोई फैसला खोज ही नहीं पाएंगे। आप यह नहीं कह सकते कि जिसे फैसला देखना है उसे केस नंबर पता ही होना चाहिए—यह किसी को याद नहीं रहता।”

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दोनों पक्षों की मुख्य दलीलें

वादी (Indian Kanoon) की दलीलें — वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार

  • सार्वजनिक डोमेन में फैसलों की उपलब्धता: इंडियन कानून का मुख्य उद्देश्य आम नागरिकों को बिना किसी शुल्क के संपूर्ण अदालती फैसले उपलब्ध कराना है। ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ की आड़ में वेबसाइट की कार्यप्रणाली और व्यापार के अधिकार को बाधित नहीं किया जा सकता।
  • अखबार बनाम न्यायिक रिकॉर्ड: गूगल सर्च केवल समाचार रिपोर्ट दिखाता है जो किसी एक दृष्टिकोण की ओर झुकी हो सकती हैं, जबकि इंडियन कानून निष्पक्ष और पूर्ण न्यायिक रिकॉर्ड प्रस्तुत करता है।
  • चयनात्मक कार्रवाई (Singling Out): अन्य सभी लीगल डेटाबेसों के बीच केवल इंडियन कानून को निशाना बनाना अनुचित और भेदभावपूर्ण है।

प्रतिवादी (मुकदमे से जुड़े पक्षकार) की दलीलें — वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिबल

  • पेवॉल बनाम फ्री एक्सेस और सामाजिक कलंक: जो साइटें पेवॉल (Paywall/Subscription) के पीछे नहीं हैं, वहां कोई भी व्यक्ति आसानी से नाम सर्च कर सकता है। इससे किसी पुराने और समाप्त हो चुके मामले से जुड़ा व्यक्ति 10 साल बाद भी उस सामाजिक कलंक (Stigma) से मुक्त नहीं हो पाता।
  • डी-इंडेक्सिंग का उद्देश्य: डी-इंडेक्सिंग का उद्देश्य फैसले को पूरी तरह मिटाना नहीं, बल्कि इंटरनेट पर नाम सर्च के जरिए होने वाली अत्यधिक और अवांछित पहुंच को नियंत्रित करना है।

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मामले की पृष्ठभूमि (29 मई का सिंगल जज आदेश)

  • सिंगल जज का निर्देश: 29 मई को दिल्ली हाईकोर्ट के सिंगल जज ने कुछ व्यक्तियों की याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए निर्देश दिया था कि इंडियन कानून संबंधित पक्षकारों के नाम-आधारित सर्च विकल्प को हटाए (De-index)।
  • आदेश का प्रभाव: आदेश के अनुसार, ऐसे फैसलों को केवल केस नंबर, साइटेशन, अदालत के नाम और तारीख के माध्यम से ही एक्सेस किया जा सकता था। इंडियन कानून ने इस फैसले को खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी है।

सुनवाई की वर्तमान स्थिति

  • पीठ ने प्रथम दृष्टया सिंगल जज के निर्देश पर अंतरिम रोक (Stay) लगाने की इच्छा व्यक्त की, हालांकि कोई औपचारिक स्थगन आदेश पारित किए बिना मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 2 अक्टूबर 2026 को निर्धारित कर दी।

विधिक प्रतिनिधित्व

  • इंडियन कानून (Indian Kanoon) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार, साथ में अधिवक्ता अपार गुप्ता, नमन कुमार और उजमा शेख।
  • प्रतिवादियों (याचिकाकर्ताओं) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिबल।
  • पीठ: न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति विनोद कुमार।

Legal Portal:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतमध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (Madhya Pradesh High Court)
पीठासीन पीठन्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनिंद्र कुमार सिंह
मुख्य मुद्दानई वेबसाइट और e-Hearing पोर्टल का सही ढंग से काम न करना, बफरिंग और हैंग होना।
मुख्य आदेशमुख्य न्यायाधीश से दोषी IT स्टाफ पर कार्रवाई की सिफारिश; 7 दिन में जांच रिपोर्ट और 30 दिन में थर्ड-पार्टी IT ऑडिट।
ऑडिट एजेंसियांTCS / Infosys / L&T Technology Services, C-DOT और NASSCOM
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