हाईकोर्ट की मुख्य कानूनी टिप्पणियां
- पत्रकारिता की स्वतंत्रता और अधिकार: अदालत ने कहा:“स्कूल की कमियों को उजागर कर पत्रकार ने कोई गलत काम नहीं किया। अधिकारियों की यह कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण प्रतीत होती है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट माना है कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की आजादी के मूल में है, और लोकतंत्र तब तक सुरक्षित है जब तक पत्रकार बिना किसी बदले की कार्रवाई के डर के सत्ता से सच बोल सकते हैं।”
- BNS की धाराओं का गलत इस्तेमाल:
- धारा 356 (मानहानि): कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मानहानि की कार्यवाही केवल पीड़ित व्यक्ति द्वारा की गई शिकायत के माध्यम से शुरू की जा सकती है, न कि सीधे FIR दर्ज करके।
- धारा 353 (सार्वजनिक उपद्रव): कोर्ट ने नोट किया कि सद्भाव (Good Faith) में प्रकाशित बयानों को इस धारा के तहत छूट प्राप्त है।
- धारा 223 (लोक सेवक के आदेश का उल्लंघन): स्कूल में प्रवेश प्रतिबंधित करने वाला कोई लोक आदेश जारी नहीं किया गया था।
- RTE अधिनियम, 2009 और सरकार की जिम्मेदारी: पीठ ने टिप्पणी की कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 लागू हुए 16 साल से अधिक बीत चुके हैं, जो बच्चों के लिए सुरक्षित पेयजल और अलग शौचालयों की व्यवस्था को अनिवार्य बनाता है।“जब पत्रकार ने स्कूल के इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियों को उजागर किया, तो सरकार का कर्तव्य था कि वह उन कमियों को दूर करने के लिए कदम उठाती, न कि इसे अहं (Ego Issue) की लड़ाई बनाकर FIR दर्ज करती।”
लखनऊ/प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राजधानी लखनऊ के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में बुनियादी सुविधाओं के अभाव और बदहाली को उजागर करने वाले पत्रकार के खिलाफ उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज की गई प्राथमिकी (FIR) पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी है।
न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने पत्रकार अमित यादव द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी के संबंध में अगले आदेश तक कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए। इसके साथ ही, अदालत ने अपर मुख्य सचिव (बेसिक शिक्षा) को स्कूल की वर्तमान स्थिति पर अपना व्यक्तिगत हलफनामा (Personal Affidavit) दाखिल करने का आदेश दिया है। अदालत ने पुलिस व प्रशासनिक कार्रवाई पर तीखी टिप्पणी करते हुए इसे ‘संदेशवाहक को मारने’ (Killing the Messenger) जैसा दुर्भावनापूर्ण कृत्य करार दिया और कहा कि सरकार को कमियां सामने आने पर अपनी ‘ईगो’ (Ego Issue) बनाने के बजाय स्कूल की हालत सुधारने पर ध्यान देना चाहिए था [अमित यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 3 अन्य]।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक व संवैधानिक टिप्पणियां
1. ‘संदेशवाहक को मारना’ कानून की नजर में अस्वीकार्य पत्रकार के खिलाफ दर्ज एफआईआर को दुर्भावनापूर्ण मानते हुए खंडपीठ ने कहा: “अभियोजन की यह कार्रवाई ‘संदेशवाहक को मारने’ (Killing the Messenger) के समान है, जिसे कानून की नजर में कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। जब स्कूल की कमियां उजागर की गईं और वे ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’ (RTE Act) के प्रावधानों के अनुरूप नहीं पाई गईं, तो प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट है कि पत्रकार ने उन कमियों को दर्शाकर कोई गलत काम नहीं किया। अधिकारियों द्वारा याचिकाकर्ता (पत्रकार) के खिलाफ दर्ज की गई यह प्राथमिकी पूरी तरह से प्रतिशोध और द्वेषपूर्ण कृत्य (Malicious Act) प्रतीत होती है।”
2. प्रेस की स्वतंत्रता और सत्ता से सच बोलने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला देते हुए अदालत ने रेखांकित किया:
- पत्रकारिता की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल आधार है।
- भारत का लोकतंत्र और स्वतंत्रता तभी तक सुरक्षित है जब तक पत्रकार बिना किसी प्रतिशोध या भय के सत्ता के सामने सच बोलने (Speak Truth to Power) के लिए स्वतंत्र हैं।
3. RTE अधिनियम के 16 वर्ष और प्रशासनिक दायित्व अदालत ने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act, 2009) लागू हुए 16 वर्ष बीत चुके हैं, जो प्रत्येक स्कूल में सुरक्षित पेयजल, बालक-बालिकाओं के लिए अलग शौचालय और खेल के मैदान को अनिवार्य बनाता है: “जब कानूनन सरकार पर यह बुनियादी सुविधाएं देने का दायित्व है और पत्रकार ने बुनियादी ढांचे की कमियों को सामने रखा, तो सरकार का काम यह था कि वह उन कमियों को दूर करने के लिए त्वरित कार्रवाई करती, न कि इसे अपनी प्रतिष्ठा/ईगो का मुद्दा बनाकर पत्रकार के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा देती।”
BNS की धाराओं के दुरुपयोग पर अदालत का विधिक विश्लेषण
अदालत ने पाया कि उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा भारतीय न्याय संहिता (BNS, 2023) के तहत दर्ज की गई धाराएं कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं हैं:
- धारा 356 BNS (आपराधिक मानहानि): अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार मानहानि के मामले में पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती; इसकी कार्यवाही केवल पीड़ित व्यक्ति (Aggrieved Person) द्वारा मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत (Complaint) के जरिए ही शुरू की जा सकती है। अतः एफआईआर में यह धारा जोड़ना स्पष्ट कानूनी त्रुटि है।
- धारा 353 BNS (लोक उपद्रव संबंधी बयान): अदालत ने कहा कि चूंकि रिपोर्ट स्कूल की वास्तविक दयनीय स्थिति को दर्शाती है, इसलिए अधिकारियों को एफआईआर दर्ज करने से पहले सद्भावनापूर्वक (Good Faith) किए गए प्रकाशन के अपवाद पर विचार करना चाहिए था।
- धारा 223 BNS (लोक सेवक के आदेश की अवज्ञा): रिकॉर्ड पर ऐसा कोई आदेश मौजूद नहीं था जिसमें स्कूल परिसर में प्रवेश को किसी सक्षम अधिकारी द्वारा प्रतिबंधित किया गया हो।
मामले की पृष्ठभूमि (गोसाईंगंज स्कूल ग्राउंड रिपोर्ट विवाद)
- ग्राउंड रिपोर्टिंग: पत्रकार अमित यादव ने लखनऊ के गोसाईंगंज स्थित बेगरिया मऊ के ‘पूर्व माध्यमिक विद्यालय’ की जमीनी हकीकत पर एक खबर प्रकाशित की थी। रिपोर्ट में दिखाया गया था कि स्कूल के शौचालय अत्यंत जर्जर स्थिति में हैं और बच्चों के लिए पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं है।
- पुलिस की जवाबी एफआईआर (24 अगस्त): रिपोर्ट सामने आने के बाद 24 अगस्त को पुलिस ने पत्रकार के खिलाफ केस दर्ज कर लिया। पुलिस का आरोप था कि पत्रकार ने बिना अनुमति परिसर में प्रवेश किया, बच्चों की पढ़ाई बाधित की, दो महिला शिक्षकों पर बोलने का दबाव बनाया और “राजनीतिक पूर्वाग्रह” के चलते खबर बनाई जबकि स्कूल उत्कृष्ट स्थिति में था।
- हाईकोर्ट में चुनौती: पत्रकार ने एफआईआर को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्देश
- एफआईआर पर अंतरिम रोक: विवादित एफआईआर के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी गई है और पत्रकार के खिलाफ किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।
- अपर मुख्य सचिव से हलफनामा तलब: बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव (ACS) को निर्देश दिया गया है कि वे चार सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा देकर बताएं कि:
- स्कूल की वर्तमान स्थिति क्या है?
- पत्रकार की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद स्कूल के बुनियादी ढांचे में क्या-क्या सुधारात्मक बदलाव किए गए हैं?
- अगली सुनवाई: मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की गई है।
विधिक प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ता (पत्रकार अमित यादव) की ओर से: अधिवक्ता वली नवाज खान।
- उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से: राज्य सरकार के अधिवक्ता।
- पीठ: न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव।
Free Press: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठासीन पीठ | न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव |
| याचिकाकर्ता | अमित यादव (पत्रकार) |
| मामला | लखनऊ के गोसाईंगंज स्थित पूर्वा माध्यमिक विद्यालय में शौचालय और पेयजल सुविधाओं की बदहाली उजागर करने पर दर्ज FIR |
| कोर्ट का आदेश | FIR के संचालन पर रोक, पत्रकार के खिलाफ किसी भी कार्रवाई पर मनाही, और बेसिक शिक्षा विभाग से हलफनामा तलब |

