वकीलों के संगठन (LAFC) की आपत्ति और CJI को पत्र
LAFC ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजकर निम्नलिखित मुख्य चिंताएं जताई हैं:
- रोस्टर का उल्लंघन और आउट-ऑफ-टर्न सुनवाई:एसोसिएशन का कहना है कि 13 जुलाई 2026 से लागू रोस्टर के अनुसार नोएडा श्रमिकों के विरोध-प्रदर्शन और निरोधात्मक हिरासत (Preventive Detention) से जुड़े मामले न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष लंबित थे। इसके बावजूद मेधा रूपम की याचिका को विशेष रूप से न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के सामने सूचीबद्ध कर दिया गया।
- वीआईपी व्यवहार और पक्षपात का आरोप:संगठन ने आरोप लगाया कि एक वरिष्ठ संवैधानिक पद (CEC) पर बैठे अधिकारी की बेटी होने के कारण इस मामले को विशेष प्राथमिकता दी गई, जो न्यायपालिका की निष्पक्षता और आम जनता के विश्वास को प्रभावित करता है।
- लाइव कार्यवाही (Live Streaming) म्यूट होना:23 सितंबर को जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (DM की ओर से) और वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी (यूपी सरकार की ओर से) बहस कर रहे थे, तब कार्यवाही के लगभग 10 मिनट बाद अचानक वर्चुअल लाइव ब्रॉडकास्ट का ऑडियो बंद (Mute) कर दिया गया। LAFC ने पूछा है कि इस पारदर्शिता को क्यों रोका गया?
मामले की पृष्ठभूमि: इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश
2 सितंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की 25 वर्षीया छात्रा आकृति चौधरी के खिलाफ नोएडा प्रशासन द्वारा लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) को रद्द कर दिया था।
- हाईकोर्ट ने कहा कि बिना दिमाग लगाए और तानाशाही रवैये से NSA का आदेश पारित किया गया, जिससे राज्य “ऑरवेलियन डिस्प्लायिया” (Orwellian Dystopia) में बदल सकता है।
- हाईकोर्ट ने छात्रा को ₹5 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया और इस राशि को DM मेधा रूपम तथा जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के वेतन से वसूलने के निर्देश दिए।
सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई और संशोधित आदेश
- प्रारंभिक भ्रम और संशोधन: 23 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के बाद शुरुआत में पूरे हाईकोर्ट आदेश पर रोक लगाने का संकेत दिया था। हालांकि, 24 सितंबर को जारी संशोधित आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छात्रा (आकृति चौधरी) का NSA रद्द करने का हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रहेगा।
- केवल DM पर राहत: सुप्रीम कोर्ट ने केवल उन पैराग्राफों (27 से 33) पर रोक लगाई है, जिनमें DM मेधा रूपम के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां (Adverse Strictures) की गई थीं और उनके वेतन से ₹5 लाख काटने का निर्देश दिया गया था।
- सरकारी पक्ष का तर्क: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि DM केवल प्रशासनिक श्रृंखला का एक हिस्सा थीं और पूरा मामला SHO, DCP, कमिश्नर और हाईकोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता वाले एडवाइजरी बोर्ड से होकर गुजरा था, इसलिए अधिकारी पर व्यक्तिगत जुर्माना लगाना गलत है।
नई दिल्ली: नोएडा (गौतमबुद्ध नगर) की जिला मजिस्ट्रेट आईएएस मेधा रूपम द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा व कार्यकर्ता आकृति चौधरी को हिरासत में लेने और इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा लगाए गए ₹5 लाख के हर्जाने के खिलाफ दायर याचिका की सुप्रीम कोर्ट में लिस्टिंग प्रक्रिया एक बड़े संस्थागत विवाद के केंद्र में आ गई है।
‘लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन’ (LAFC) ने रेखांकित किया है कि मेधा रूपम देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की सुपुत्री हैं। ऐसे में शीर्ष प्रशासनिक व संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के परिजनों से जुड़े मामलों में मौजूदा रोस्टर को दरकिनार कर विशेष पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किए जाने से न्यायपालिका की निष्पक्षता और जनविश्वास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वकीलों के संगठन ‘लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन’ (LAFC) ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को एक औपचारिक पत्र लिखकर मामले के विशेष पीठ आवंटन (Special Bench Assignment) और सुनवाई के दौरान लाइव कार्यवाही का ऑडियो अचानक म्यूट किए जाने पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
LAFC के पत्र और विवाद के प्रमुख बिंदु
1. ‘रोस्टर की अनदेखी और विशेष पीठ को मामला सौंपना’: CJI को पत्र
- रोस्टर का उल्लंघन: पत्र में बताया गया कि 13 जुलाई 2026 से प्रभावी सुप्रीम कोर्ट के विषय-वार रोस्टर (Subject-wise Roster) के अनुसार, नोएडा श्रमिक आंदोलन से जुड़े निवारक निरोध (Preventive Detention) और संबंधित मामले न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष लंबित और सूचीबद्ध होने चाहिए थे।
- विशेष पीठ का आवंटन: इसके बावजूद, मेधा रूपम की विशेष अनुमति याचिका (SLP) को अचानक न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ के समक्ष विशेष रूप से सुनवाई के लिए भेजा गया।
- विशेषाधिकार का आरोप: LAFC ने तर्क दिया कि एक वरिष्ठ नौकरशाह और संवैधानिक पद पर बैठे अधिकारी के परिवार के सदस्य के मामले को “आउट ऑफ टर्न” प्राथमिकता और विशेष पीठ दिया जाना एक गलत और खतरनाक नजीर पेश करता है।
2. वर्चुअल सुनवाई के दौरान ऑडियो का म्यूट होना
- पत्र में 23 सितंबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान के तकनीकी आचरण पर भी गंभीर आपत्ति जताई गई है।
- सुनवाई के दौरान जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता डीएम मेधा रूपम की ओर से और वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दलीलें पेश कर रहे थे, तभी लगभग 10 मिनट बाद अदालती कार्यवाही का लाइव ऑडियो रहस्यमय तरीके से म्यूट (बंद) कर दिया गया। अदालत की ओर से इस ऑडियो म्यूटिंग का कोई स्पष्टीकरण या कारण आधिकारिक तौर पर साझा नहीं किया गया।
3. युवा आंदोलन ‘CJP’ और सौरव दास की प्रतिक्रिया
- युवा संगठन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के प्रवक्ता सौरव दास ने इस घटनाक्रम को सोशल मीडिया पर उठाते हुए इसे चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून पर जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा द्वारा उसी दिन दिए गए फैसले से जोड़ा।
- उन्होंने उल्लेख किया कि 23 सितंबर को ही जस्टिस शर्मा ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को 5-जजों की संविधान पीठ को भेजने का आदेश दिया था। इसके साथ ही उन्होंने मामले की लिस्टिंग में पारदर्शिता और न्यायिक औचित्य पर तीखे सवाल खड़े किए।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं सुप्रीम कोर्ट का संशोधित आदेश
- नोएडा श्रमिक आंदोलन और एनएसए (अप्रैल-मई 2026): नोएडा में वेतन वृद्धि को लेकर हुए श्रमिकों के प्रदर्शन और कथित हिंसा के सिलसिले में पुलिस ने डीयू छात्रा आकृति चौधरी को गिरफ्तार किया था। इसके बाद 13 मई को नोएडा डीएम मेधा रूपम ने उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत निरोध आदेश पारित कर दिया।
- इलाहाबाद हाईकोर्ट का कड़ा फैसला (2 सितंबर 2026):
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus) स्वीकार करते हुए आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत को पूरी तरह रद्द कर दिया।
- हाईकोर्ट ने राज्य की कहानी को “गढ़ी हुई” (Concocted) करार दिया और चेतावनी दी कि बेलगाम नौकरशाही का ऐसा निरंकुश आचरण उत्तर प्रदेश को ‘ऑरवेलियन डिस्टोपिया’ (Orwellian Dystopia) बना सकता है।
- अदालत ने डीएम मेधा रूपम के आचरण को “संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ का उल्लंघन” माना और छात्रा को ₹5 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसकी वसूली मेधा रूपम और संबंधित पुलिस अधिकारियों के वेतन से करने का निर्देश था।
- सुप्रीम कोर्ट का प्रारंभिक आदेश बनाम संशोधित आदेश:
- 23 सितंबर 2026 (प्रारंभिक आदेश): सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के बाद अपलोड किए गए आदेश में हाईकोर्ट के पूरे फैसले (पैरा 27 से 33 सहित) पर अंतरिम रोक लगा दी थी, जिससे यह संदेश गया कि एनएसए रद्दीकरण पर भी रोक लग गई है।
- 24 सितंबर 2026 (संशोधित आदेश): विवाद बढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश को संशोधित (Revised) करते हुए स्पष्ट किया कि अंतरिम रोक केवल पैरा 27 से 33 तक सीमित है—अर्थात केवल डीएम मेधा रूपम के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियों (Strictures) और उनके वेतन से ₹5 लाख हर्जाना काटने के निर्देश पर ही रोक लगाई गई है। छात्रा आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत को रद्द करने का हाईकोर्ट का आदेश पूरी तरह प्रभावी और बरकरार है।
राजनीतिक व सामाजिक प्रतिक्रियाएं
युवा आंदोलन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रवक्ता सौरव दास ने X (ट्विटर) पर पोस्ट कर इस मामले को सीधे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और CEC की जवाबदेही से जोड़ा। उन्होंने सवाल उठाया कि जब CEC की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में संविधान पीठ को मामला भेजने पर न्यायाधीशों का विभाजित फैसला आया है, तो ऐसे समय में न्यायाधीशों और सरकारी पदों के आपसी संबंधों व मामलों के आउट-ऑफ-टर्न लिस्टिंग की पारदर्शी जांच होनी चाहिए।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: मेधा रूपम बनाम आकृति चौधरी व अन्य [डायरी संख्या 56202-2026] सहपठित उत्तर प्रदेश राज्य बनाम आकृति चौधरी [विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- डीएम मेधा रूपम की ओर से: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता
- उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी एवं एएजी शरण देव सिंह ठाकुर
- छात्रा आकृति चौधरी की ओर से (कैविएट): वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 (NSA) की धारा 3 (निवारक निरोध की शर्तें)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 (हाईकोर्ट का बंदी प्रत्यक्षीकरण क्षेत्राधिकार) एवं अनुच्छेद 136 (सुप्रीम कोर्ट की विशेष अनुमति याचिका)
- सुप्रीम कोर्ट रूल्स, 2013 – मुकदमों के रोस्टर और सीजेआई के मास्टर ऑफ रोस्टर (Master of Roster) अधिकार
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- शांति भूषण बनाम भारत का सर्वोच्च न्यायालय (2018, सुप्रीम कोर्ट) — ‘मुख्य न्यायाधीश “मास्टर ऑफ रोस्टर” हैं, परंतु मामलों का आवंटन स्थापित नियमों, पारदर्शिता और संस्थागत विश्वास के अनुरूप होना चाहिए।’
- डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘अवैध हिरासत और मौलिक अधिकारों के हनन पर राज्य और अधिकारियों पर व्यक्तिगत हर्जाना तय करने का संवैधानिक क्षेत्राधिकार।’
- पीठ: न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह (सर्वोच्च न्यायालय)
- वर्तमान स्थिति: डीएम के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियों और हर्जाने पर रोक जारी; मुख्य मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर 2026 को निर्धारित।
Gyanesh Kumar & DM Noida: विवाद का सार (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित प्रशासनिक अधिकारी | मेधा रूपम (DM, गौतम बुद्ध नगर / नोएडा) |
| पारिवारिक संबंध | भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की बेटी |
| मूल मामला | दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा/कार्यकर्ता आकृति चौधरी पर NSA लगाना |
| इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश | NSA रद्द किया; DM के वेतन से ₹5 लाख मुआवजा काटने और सख्त टिप्पणी का आदेश |
| सुप्रीम कोर्ट पीठ | न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह / एन.के. सिंह |
| विवाद के मुख्य बिंदु | आउट-ऑफ-टर्न लिस्टिंग, रोस्टर बाईपास का आरोप और सुनवाई के दौरान ऑडियो म्यूट होना |

