सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और नियम
- एकरूपता और निष्पक्षता: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह व्यवस्था इसलिए आवश्यक है ताकि अदालत की किसी अनजाने में हुई चूक या अस्पष्टता का नुकसान किसी पक्षकार/मुकदमेबाज़ को न उठाना पड़े और देश के सभी उच्च न्यायालयों में एकरूपता बनी रहे।
- हाईकोर्ट को पुनर्विचार का निर्देश: शीर्ष अदालत ने कर्नाटक हाईकोर्ट के जमानत आदेश को रद्द करते हुए मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस हाईकोर्ट भेज दिया। हालांकि, तब तक के लिए आरोपी को मौजूदा शर्तों पर अंतरिम जमानत पर बने रहने की अनुमति दी गई है।
नई दिल्ली: उच्च न्यायालयों के प्रक्रियात्मक नियमों (High Court Rules & Listing Practice), न्यायिक आदेशों में उल्लिखित समय-सीमा (जैसे “दो सप्ताह बाद” / “Two Weeks Hence”) की गणना में मध्यवर्ती अदालती छुट्टियों (Intervening Court Vacation Period) के अपवर्जन का सिद्धांत, वैकेशन बेंचों (Vacation Benches) के समक्ष तत्काल सुनवाई हेतु मामलों को सूचीबद्ध करने की सीमाएं, समानांतर उपचारों (Parallel Remedies) को अपनाते हुए तथ्यों को छिपाना (Suppression of Material Facts), तथा अनुचित लाभ उठाने के इरादे से न्यायालय को गुमराह कर आदेश प्राप्त करने (Abuse of Process of Court to Steal a March) पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक और विधिक व्यवस्था दी है।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की खंडपीठ ने शुक्रवार (16 अक्टूबर 2026) को कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा ₹43 करोड़ से अधिक के कथित जीएसटी चोरी मामले में आरोपी मोहम्मद कामरान को दी गई जमानत के खिलाफ दायर राजस्व विभाग की अपील पर यह मार्गदर्शक फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता द्वारा लिखे गए निर्णय में शीर्ष अदालत ने देश के सभी उच्च न्यायालयों की रजिस्ट्रियों के लिए स्पष्ट विधिक नियम तय किया कि जब कोई नियमित पीठ किसी मामले को दो सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश देती है और वह मियाद अदालती अवकाश के बीच पड़ती है, तो रजिस्ट्री को सामान्यतः छुट्टियों की अवधि को जोड़ते हुए अवकाश समाप्ति के बाद ही मामला लगाना चाहिए, जब तक कि पीठ ने स्वयं वैकेशन बेंच के समक्ष लगाने का कोई स्पष्ट आदेश न दिया हो।
अदालत ने आरोपी द्वारा तथ्यों को छिपाकर सर्दियों की छुट्टियों में जल्दबाजी में जमानत आदेश हासिल करने की कड़ी निंदा की, कर्नाटक हाईकोर्ट को जमानत याचिका पर नए सिरे से विचार करने हेतु मामला वापस भेजा, परंतु तब तक आरोपी को मौजूदा शर्तों पर अंतरिम जमानत पर बने रहने की अनुमति दी।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं प्रक्रियात्मक व्यवस्था
1. ‘दो सप्ताह की गणना में अवकाश अवधि को बाहर रखा जाना चाहिए’
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने उच्च न्यायालयों की रजिस्ट्री कार्यप्रणाली में एकरूपता लाने हेतु सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए दर्ज किया: “जहाँ किसी उच्च न्यायालय की पीठ किसी याचिका को ‘दो सप्ताह बाद’ (‘Two weeks hence’) सूचीबद्ध करने का निर्देश देती है और ऐसे निर्देश के अनुसार ‘दो सप्ताह’ की अवधि की समाप्ति के बाद का दिन छुट्टियों के बीच में पड़ता है, तो ऐसी प्रत्येक अदालत की रजिस्ट्री द्वारा सामान्यतः उस अवधि को बाहर रखते हुए (Excluding the vacation period) दो सप्ताह की गणना की जानी चाहिए, जिस दौरान अदालत अवकाश पर है।”
2. वैकेशन बेंच के समक्ष लिस्टिंग के अपवाद:
- शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पीठ ने अपने आदेश में:
- अवकाश के दौरान पड़ने वाली कोई विशिष्ट तारीख (Specific Date) स्वयं तय की हो, या
- मामले को ‘वैकेशन बेंच’ (Vacation Bench) के समक्ष सूचीबद्ध करने का स्पष्ट निर्देश दिया हो,
- केवल तभी रजिस्ट्री को उच्च न्यायालय के प्रासंगिक नियमों के अधीन मामले को छुट्टियों के दौरान सूचीबद्ध करना चाहिए।
- पीठ ने रेखांकित किया:“न्याय के हित को बेहतर ढंग से साधने के उद्देश्य से की गई ये टिप्पणियां अदालती प्रक्रियाओं में एकरूपता (Uniformity) सुनिश्चित करने तथा यह तय करने के लिए आवश्यक हैं कि अदालत के किसी अनजाने कृत्य के कारण वादियों के विधिक अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।”
3. तथ्यों को छिपाकर समानांतर उपचार अपनाना ‘प्रक्रिया का दुरुपयोग’:
- सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि आरोपी ने एक अलग रिट याचिका में अंतरिम रिहाई की मांग की थी, जिसे पहले ही खारिज कर दिया गया था।
- इस तथ्य को पूरी तरह छिपाते हुए आरोपी ने नियमित जमानत याचिका में शीतकालीन अवकाश के दौरान एक मेमो दाखिल कर तत्काल सुनवाई कराई और राजस्व विभाग को पर्याप्त नोटिस दिए बिना एकतरफा जमानत हासिल कर ली।
- खंडपीठ ने कड़ी फटकार लगाते हुए कहा:*”सभी न्यायिक प्राधिकरणों को अंधेरे में रखकर इस तरह के समानांतर उपचार (Parallel remedies) प्राप्त करने का प्रतिवादी का आचरण घोर निंदनीय है।अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देना या जमानत मांगना आरोपी का अधिकार हो सकता है; किंतु पर्याप्त प्रकटीकरण किए बिना समानांतर रास्ते अपनाना स्पष्ट रूप से कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of the process of law) है। इस प्रकार छुट्टियों में तत्काल लिस्टिंग प्राप्त करना अदालत को गुमराह करके बाजी मारने (Steal a March) का एक स्पष्ट प्रयास था।”*
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं न्यायिक घटनाक्रम
| चरण / मंच | घटनाक्रम एवं प्रक्रियात्मक तथ्य |
| मूल अपराध व जांच | आरोपी मोहम्मद कामरान पर फर्जी इनवॉइस और बोगस फर्मों के जरिए ₹43 करोड़ से अधिक की कथित वस्तु एवं सेवा कर (GST) चोरी का आरोप। |
| 12 दिसंबर 2025 (कर्नाटक HC) | नियमित पीठ ने जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए जांच प्राधिकारियों/राजस्व विभाग को अपनी लिखित आपत्तियां दाखिल करने के लिए “दो सप्ताह” का समय दिया। |
| 26 दिसंबर 2025 (वैकेशन बेंच) | उच्च न्यायालय के शीतकालीन अवकाश (Winter Vacations) के दौरान, आरोपी के वकील ने एक अर्जेन्सी मेमो दाखिल कर मामले को तत्काल सूचीबद्ध करा लिया। राजस्व विभाग को निष्पक्ष सुनवाई का पर्याप्त अवसर मिले बिना वैकेशन जज ने आरोपी को नियमित जमानत दे दी। |
| सर्वोच्च न्यायालय में अपील | राजस्व विभाग ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। विभाग ने दलील दी कि 12 दिसंबर के आदेश में वैकेशन बेंच में लगाने का कोई निर्देश नहीं था; दो सप्ताह का समय छुट्टियों के बाद समाप्त होना चाहिए था, और आरोपी ने अपनी पूर्व खारिज रिट याचिका की बात छिपाई। |
| सुप्रीम कोर्ट का संतुलित आदेश | सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के जमानत देने के तौर-तरीके को अनुचित माना, किंतु आरोपी की स्वतंत्रता को तुरंत समाप्त न करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट को मामले की गुण-दोष पर नए सिरे से नए पीठ के समक्ष सुनवाई करने का निर्देश दिया; तब तक अंतरिम जमानत जारी रहेगी। |
विधिक एवं प्रक्रियात्मक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- गणना के सिद्धांत और सामान्य खंड अधिनियम (General Clauses Act, 1897):
- सामान्य खंड अधिनियम की धारा 10 और परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 4 यह स्थापित करती हैं कि यदि किसी कार्य को करने की अंतिम तिथि को अदालत बंद है, तो वह कार्य अदालत खुलने के प्रथम दिन किया जा सकता है।
- जब कोई न्यायाधीश किसी पक्षकार को अपनी आपत्तियां दर्ज करने के लिए “दो सप्ताह” का समय देता है और वह अवधि अवकाश के दौरान पड़ती है, तो स्वाभाविक रूप से विरोधी पक्ष को अदालत पुनः खुलने पर ही जवाब दाखिल करने की युक्तिसंगत अपेक्षा होती है। छुट्टियों में अचानक सुनवाई कर लेना प्राकृतिक न्याय (Principles of Natural Justice) का उल्लंघन है।
- समानांतर उपचार और शुद्ध अंतःकरण का सिद्धांत (Doctrine of Clean Hands):
- आपराधिक न्यायशास्त्र में यदि किसी अभियुक्त की अंतरिम राहत किसी सक्षम संवैधानिक अदालत (जैसे अनुच्छेद 226 के तहत रिट कोर्ट) द्वारा खारिज कर दी गई है, तो धारा 439 CrPC (या BNSS की धारा 483) के तहत नियमित जमानत मांगते समय उस अस्वीकृति आदेश का प्रकटीकरण करना अनिवार्य है।
- महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाना (Suppression of Material Facts) जमानत को रद्द करने का एक पर्याप्त विधिक आधार माना जाता है।
- ‘बाजी मारने’ (Stealing a March) की प्रवृत्ति पर रोक:
- सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक निर्णयों में कहा है कि वादियों द्वारा छुट्टियों का लाभ उठाकर नियमित पीठों के आदेशों को दरकिनार करना या रोस्टर के विपरीत जाकर अनुकूल आदेश प्राप्त करना न्याय प्रशासन की निष्पक्षता को दूषित करता है। रजिस्ट्री का यह विधिक कर्तव्य है कि वह ऐसे मेमो को बिना न्यायिक आदेश के स्वीकार न करे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: राजस्व विभाग / राज्य बनाम मोहम्मद कामरान [आपराधिक अपील – 2026 INSC – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू (खंडपीठ)
- निर्णय लेखक: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता
- निर्णय की तिथि: 16 अक्टूबर 2026
- संबद्ध निचली अदालत: कर्नाटक उच्च न्यायालय (आपराधिक याचिका संख्या – जमानत आदेश दिनांक: 26 दिसंबर 2025)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- कर्नाटक उच्च न्यायालय नियम, 1959 (रोस्टर एवं वैकेशन बेंच संबंधी प्रक्रिया)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) — धारा 439 (जमानत की विशेष शक्तियां) / BNSS 2023 की धारा 483
- केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम, 2017 (CGST Act) — धारा 132 (कथित ₹43 करोड़ कर अपवंचन)
- परिसीमा अधिनियम, 1963 — धारा 4 सहपठित सामान्य खंड अधिनियम, 1897 की धारा 10 (अवकाश काल की गणना)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- अदालती छुट्टियों में समय-सीमा की गणना: ‘जब कोई उच्च न्यायालय किसी मामले को कुछ सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश देता है और वह अवधि अवकाश के दौरान समाप्त होती है, तो रजिस्ट्री को सामान्यतः वैकेशन अवधि को छोड़कर ही तारीख की गणना करनी चाहिए; बिना स्पष्ट न्यायिक निर्देश के छुट्टियों में तत्काल लिस्टिंग कराकर समानांतर उपचार हासिल करना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।’
- अंतिम परिणाम: राजस्व विभाग की अपील का निस्तारण; कर्नाटक उच्च न्यायालय को गुण-दोष के आधार पर जमानत अर्जी पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश; प्रक्रियात्मक निष्कर्ष आने तक आरोपी को पूर्व-निर्धारित शर्तों पर अंतरिम जमानत का संरक्षण जारी रहेगा।
Urgent Listing: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता एवं न्यायमूर्ति शील नागू (फैसले के लेखक) |
| मामला/संदर्भ | कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील, जिसमें शीतकालीन अवकाश के दौरान ₹43 करोड़ के GST घोटाले के आरोपी मोहम्मद कामरान को जमानत दी गई थी। |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | 1. यदि ‘X सप्ताह बाद’ का समय छुट्टियों में पड़ता है, तो रजिस्ट्री छुट्टियों की अवधि को गणना से बाहर रखकर मामला नियमित अदालत खुलने के बाद लगाएगी। 2. यदि पीठ खुद वैकेशन बेंच के समक्ष विशिष्ट तिथि तय करती है, तभी छुट्टियों में सुनवाई होगी। 3. समानांतर कानूनी उपाय (Parallel Remedies) अपनाकर तथ्य छिपाना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। |
| अदालत का अंतिम आदेश | 1. हाईकोर्ट के जमानत आदेश को रद्द कर मामला नए सिरे से सुनवाई हेतु वापस भेजा गया। 2. आरोपी को अंतरिम जमानत पर रहने की अनुमति। |

