Saturday, August 15, 2026
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Press Freedom vs Defamation: क्या अखबार किसी को आतंकवादी कार्यकर्ता कह सकता है? दैनिक जागरण के संपादक संजय गुप्ता ने दिया तर्क

Press Freedom vs Defamation: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने प्रेस की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत सम्मान के बीच संतुलन बनाते हुए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।

हाईकोर्ट के जस्टिस संजय धर ने हिंदी दैनिक ‘दैनिक जागरण’ के प्रधान संपादक संजय गुप्ता और मुख्य संपादक अभिमन्यु शर्मा की याचिका पर सुनवाई की। इन पर सांबा के एक कारोबारी प्रेम कुमार ने धारा 500 (मानहानि) के तहत केस दर्ज कराया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अखबारों को जानकारी साझा करने का अधिकार है, लेकिन वे किसी व्यक्ति को बिना ठोस आधार के “आतंकवादियों का मददगार” (Over Ground Worker – OGW) बताकर उसकी छवि धूमिल नहीं कर सकते।

विवादित खबर क्या थी? (The News Item)

  • अखबार में एक खबर छपी थी जिसका शीर्षक था, पूछताछ में OGW प्रेम ने किया बड़ा खुलासा। खबर में आरोप लगाया गया था कि प्रेम कुमार ने नगरोटा हमले के लिए लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों को गाड़ी मुहैया कराई थी। उसके “अजहर मसूद” जैसे शीर्ष आतंकियों से सीधे संबंध हैं। वह पाकिस्तान द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक का बदला लेने की साजिश में शामिल था।

हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां (Key Observations)

  • कोर्ट ने प्रेस की आजादी और मर्यादा पर कड़ा रुख अपनाया।
  • सीमाएं (Article 19(2)): कोर्ट ने कहा कि मीडिया के पास किसी भी स्रोत से जानकारी प्राप्त करने का मौलिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार अनुच्छेद 19(2) के तहत मानहानि जैसे ‘उचित प्रतिबंधों’ (Reasonable Restrictions) के अधीन है।
  • छवि पर प्रहार: किसी को “आतंकियों का सहयोगी” कहना सार्वजनिक रूप से उसकी छवि को बुरी तरह गिरा देता है। अखबार यह कहकर नहीं बच सकता कि उसका इरादा नुकसान पहुँचाने का नहीं था।
  • जानकारी का स्रोत: अखबार ने दावा किया था कि यह खबर जांच एजेंसियों की ब्रीफिंग पर आधारित थी। लेकिन कोर्ट ने नोट किया कि खबर में कहीं भी किसी एजेंसी या अधिकारी का जिक्र नहीं था।

संपादक बनाम मालिक की जिम्मेदारी (Liability)

  • कोर्ट ने ‘प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ बुक्स एक्ट, 1867’ के तहत जिम्मेदारी तय की।
  • संपादक (Editor): कानूनन उस व्यक्ति पर जिम्मेदारी होती है जो खबरों के चयन (Selection of matter) को नियंत्रित करता है। चूंकि अभिमन्यु शर्मा जम्मू-कश्मीर संस्करण के संपादक थे, इसलिए उन पर मुकदमा जारी रहेगा।
  • मालिक (Owner): कोर्ट ने प्रधान संपादक संजय गुप्ता के खिलाफ कार्यवाही को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि शिकायत में उनके द्वारा विशेष रूप से इस खबर के चयन या प्रकाशन में शामिल होने का कोई सबूत नहीं था।

मानहानि के लिए ‘मंशा’ (Mens Rea)

कोर्ट ने सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए कहा कि मानहानि का अपराध तब बनता है जब आरोपी की मंशा (Intention) नुकसान पहुँचाने की हो या उसे ज्ञान (Knowledge) हो कि इस खबर से व्यक्ति की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचेगी।

निष्कर्ष: जिम्मेदारी भरा पत्रकारिता

यह फैसला मीडिया संस्थानों को याद दिलाता है कि सनसनीखेज खबरें छापने से पहले तथ्यों की पुष्टि अनिवार्य है। किसी पर “देशद्रोही” या “आतंकियों का साथी” होने का ठप्पा लगाना किसी के जीवन और सम्मान को हमेशा के लिए बर्बाद कर सकता है।

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