Friday, September 25, 2026
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Delhi Metro: चुनाव के दौरान मेट्रो ट्रेनों और स्टेशनों पर राजनीतिक विज्ञापनों पर रोक क्या सही है…जानिए कोर्ट ने क्या दिया जवाब

Delhi Metro: दिल्ली हाईकोर्ट ने देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव संपन्न कराने के विधिक सिद्धांतों को सुदृढ़ करते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है।

आदर्श आचार संहिता व राजनीतिक विज्ञापनों पर सुनवाई

हाईकोर्ट के जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतसिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने विज्ञापन एजेंसियों की अपील को खारिज करते हुए कहा कि “मेट्रो इन्फ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचा) विशेष रूप से सरकार के साथ जुड़ा हुआ माना जाता है। ऐसे में वहां प्रदर्शित राजनीतिक विज्ञापनों से जनता के बीच यह गलत संदेश या भ्रम (Impression) जा सकता है कि इन्हें राज्य/सरकार का समर्थन प्राप्त है।” अदालत ने चुनाव के दौरान लागू आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct – MCC) की अवधि में मेट्रो ट्रेनों, स्टेशनों और परिसरों में राजनीतिक विज्ञापनों (Political Advertisements) के प्रदर्शन पर लगी रोक को पूरी तरह विधिक और संवैधानिक ठहराया है।

मामले की पृष्ठभूमि: विज्ञापन कंपनियों बनाम चुनाव आयोग

विवाद की वजह: यह विधिक विवाद चुनावी निष्पक्षता और व्यावसायिक हितों के टकराव से उपजा था। कुछ निजी विज्ञापन एजेंसियों ने दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) से मेट्रो ट्रेनों और स्टेशनों पर दीर्घकालिक विज्ञापन अधिकार हासिल किए थे।

चुनाव आयोग का निर्देश: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के निर्देशों के बाद, DMRC ने विज्ञापन अनुबंधों में एक नई विधिक शर्त (Clause) जोड़ दी। इसके तहत आचार संहिता (MCC) लागू रहने के दौरान मेट्रो परिसरों में राजनीतिक विज्ञापनों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया और पहले से लगे विज्ञापनों को हटाने का आदेश दिया गया।

याचिकाकर्ताओं की दलील: वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष मोहन के माध्यम से विज्ञापन एजेंसियों ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 19 (व्यापार की स्वतंत्रता) का उल्लंघन बताया। उनका तर्क था कि जब चुनाव आयोग बस शेल्टरों (Bus Queue Shelters) और सड़कों पर राजनीतिक विज्ञापनों की अनुमति देता है, तो मेट्रो के साथ यह भेदभाव क्यों? इससे उनके व्यावसायिक हितों को भारी नुकसान पहुंच रहा है।

सरकार का पक्ष: चुनाव आयोग और सरकार की ओर से खड़े स्टैंडिंग काउंसिल संजय वशिष्ठ और वकील देवव्रत यादव ने इस प्रतिबंध को चुनावी तटस्थता के लिए आवश्यक बताया। सिंगल जज द्वारा याचिका खारिज होने के बाद यह मामला खंडपीठ के पास पहुंचा था।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: मेट्रो और बस शेल्टर में अंतर

दोनों पक्षों के विधिक तर्कों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद, दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ ने सिंगल जज के फैसले को बरकरार रखते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किए।

मेट्रो बुनियादी ढांचा सरकार का प्रतीक है

अदालत ने माना कि आम जनता के मानस में मेट्रो सीधे तौर पर सरकारी संस्थान के रूप में स्थापित है। कहा, मेट्रो ट्रेनों/स्टेशनों की पहचान विशिष्ट रूप से सरकार के साथ जुड़ी है। इन प्रतिबंधों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी राजनीतिक विज्ञापन को सरकारी तंत्र या संस्थान से जुड़ा हुआ न मान लिया जाए।

बस शेल्टर और मेट्रो में विधिक भिन्नता (Valid Classification)

अनुच्छेद 14 के तहत भेदभाव के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने दोनों परिसरों के बीच स्पष्ट विधिक अंतर (Distinct Category) बताया। कहा, बस क्यू शेल्टर सार्वजनिक सड़कों पर स्थित होते हैं। उनके विज्ञापन स्पेस सड़कों पर लगे सामान्य होर्डिंग्स की तरह हैं, जो सीधे तौर पर ‘सरकारी भवन/परिसर’ की परिभाषा में नहीं आते। इसके विपरीत, मेट्रो स्टेशन और ट्रेनें पूरी तरह से एक अलग श्रेणी हैं। सार्वजनिक धारणा (Public Perception) में इन दोनों के बीच का अंतर तार्किक है और यह वर्गीकरण पूरी तरह विधिक है।

अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग की सर्वोच्च शक्ति

अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग की शक्तियों को रेखांकित करते हुए कहा कि जहां कोई विशिष्ट कानून मौजूद नहीं है, वहां स्वतंत्र चुनाव कराने के लिए आयोग द्वारा जारी किए गए निर्देश ‘कानून’ के समान बाध्यकारी (Binding) होते हैं। यह निर्देश सभी दलों के लिए समान अवसर (Level Playing Field) सुनिश्चित करने के लिए जारी किया गया था।

व्यावसायिक हित से बड़ा है सार्वजनिक हित

व्यापारिक स्वतंत्रता (Article 19) पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह पाबंदी हमेशा के लिए नहीं है, बल्कि चुनाव के दौरान एक सीमित अवधि (Limited Duration) के लिए है। एजेंसियां अन्य सभी गैर-राजनीतिक (वाणिज्यिक) विज्ञापन दिखाने के लिए स्वतंत्र हैं। अदालत ने कहा, याचिकाकर्ताओं का हित विशुद्ध रूप से व्यावसायिक है, जबकि चुनाव आयोग का निर्देश चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे व्यापक सार्वजनिक हित (Larger Public Interest) को बढ़ावा देता है। सार्वजनिक हित के सामने व्यावसायिक नुकसान को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती।

केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix)

कानूनी बिंदु / श्रेणियांदिल्ली उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतसिंह अरोड़ा (खंडपीठ)
संवैधानिक प्रावधानभारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 (चुनाव आयोग की शक्तियां), अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19
मुख्य विधिक प्रश्नक्या आचार संहिता के दौरान मेट्रो में राजनीतिक विज्ञापनों पर प्रतिबंध मनमाना और भेदभावपूर्ण है?
अदालत का अंतिम आदेशअपील पूरी तरह खारिज; आचार संहिता (MCC) के दौरान मेट्रो परिसरों में राजनीतिक विज्ञापनों पर लगा प्रतिबंध विधिक रूप से वैध है।
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