Friday, September 25, 2026
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Ex Parte: विवाहित पुरुष से शादी करने पर सीआईएसएफ महिला अफसर की बर्खास्तगी सही, उसी यूनिट के जांच अधिकारी पर कानूनी रोक नहीं…यह है केस

Ex Parte: दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के अनुशासनात्मक नियमों और विभागीय जांच (Departmental Enquiry) की विधिक प्रक्रियाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण विधिक निर्णय सुनाया है।

महिला सब-इंस्पेक्टर की रिट याचिका खारिज

हाईकोर्ट के जस्तित अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने सीआईएसएफ की एक महिला सब-इंस्पेक्टर (SI) द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए उन्हें सेवा से हटाए जाने (Removal from Service) के एकतरफा (Ex-Parte) सजा के आदेश को पूरी तरह से विधिक और वैध ठहराया। महिला अधिकारी पर एक विवाहित पुरुष से शादी करने और बिना सूचना ड्यूटी से गायब रहने के गंभीर आरोप थे।

जानबूझकर जांच कार्यवाही से गायब रहने पर कोर्ट तल्ख

अदालत ने स्पष्ट किया है कि विभागीय नियमों के तहत उसी यूनिट (इकाई) के किसी अधिकारी को जांच अधिकारी (Enquiry Officer) नियुक्त करने पर कोई कानूनी रोक या प्रतिबंध (Embargo) नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने जानबूझकर जांच कार्यवाही से गायब रहने वाले कर्मियों को तकनीकी आधार पर राहत देने से साफ इनकार कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि: गंभीर विभागीय आरोप और एकतरफा जांच

यह मामला अनुशासन और विधिक नियमों की अनदेखी से जुड़ा है।

क्या थे आरोप? याचिकाकर्ता महिला सीआईएसएफ (चेन्नई यूनिट) में सब-इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत थीं। उनके खिलाफ सीआईएसएफ रूल्स, 2001 के नियम 36 के तहत एक चार्ज मेमो (आरोप पत्र) जारी किया गया था। उन पर मुख्य रूप से तीन गंभीर आरोप थे:

नियमों का उल्लंघन: एक ऐसे व्यक्ति से शादी करना जिसकी पहली पत्नी जीवित थी और पहली शादी कानूनी रूप से अस्तित्व में थी (सीआईएसएफ नियमों के नियम 18 का उल्लंघन)।

कर्तव्य में लापरवाही: बिना किसी पूर्व सूचना या विधिक अनुमति के यूनिट लाइन और ड्यूटी स्टेशन छोड़कर चले जाना (भगोड़ा होना)।

झूठा दावा: यह झूठा दावा करना कि उन्होंने 3 साल की असाधारण छुट्टी (Extraordinary Leave) के लिए आवेदन किया था, जबकि विभाग को ऐसा कोई आवेदन कभी मिला ही नहीं था।

जांच से जानबूझकर दूरी: विभाग ने इन आरोपों की जांच के लिए उसी यूनिट के एक अधिकारी को जांच अधिकारी नियुक्त किया। याचिकाकर्ता को गवाहों से जिरह (Cross-examination) करने और अपना बचाव पेश करने के कई अवसर दिए गए, लेकिन वह जानबूझकर जांच कार्यवाहियों में शामिल नहीं हुईं। इसके बाद जांच अधिकारी ने एकतरफा रिपोर्ट सौंपी, जिसके आधार पर अनुशासनात्मक प्राधिकरण ने उन्हें ‘सेवा से हटाने’ की सजा सुनाई। इस फैसले को अपीलीय और पुनरीक्षण (Revisional) अधिकारियों ने भी सही माना, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का रुख किया।

हाई कोर्ट का कानूनी विश्लेषण: न्यायिक समीक्षा का सीमित दायरा

याचिकाकर्ता के वकील कृष्ण शर्मा और केंद्र सरकार के स्थायी वकील (CGSC) विक्रम जेटली के विधिक तर्कों को सुनने के बाद, खंडपीठ ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांतों को प्रतिपादित किया।

उसी यूनिट का जांच अधिकारी होना अवैध नहीं

याचिकाकर्ता की मुख्य विधिक दलील यह थी कि जांच अधिकारी उसी की यूनिट से था, जिससे जांच में पूर्वाग्रह (Biasness) की आशंका थी। इसे खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा, सीआईएसएफ रूल्स, 2001, विशेष रूप से नियम 36(2), उसी यूनिट से जांच अधिकारी की नियुक्ति पर कोई विधिक रोक नहीं लगाता है। इस तथ्य के अलावा कि वह अधिकारी उसी यूनिट का था, याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए कोई अन्य ठोस विधिक आधार या सबूत पेश नहीं कर सकीं कि वह अधिकारी उनके प्रति दुर्भावना या पूर्वाग्रह से ग्रसित था।

जानबूझकर अनुपस्थित रहने पर ‘प्राकृतिक न्याय’ की दुहाई नहीं

अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि जब किसी कर्मचारी को अपनी बात रखने के पर्याप्त और उचित अवसर (Ample Opportunities) दिए गए हों और वह खुद ही गायब रहे, तो बाद में वह ‘एकतरफा कार्यवाही’ को आधार बनाकर सहानुभूति की मांग नहीं कर सकता। रिकॉर्ड्स से स्पष्ट है कि कंपनी कमांडर (Coy Commander) सहित अन्य गवाहों के बयानों से सभी आरोप विधिक रूप से साबित हुए थे।

कोर्ट का काम फैसले की योग्यता जांचना नहीं (Scope of Article 226)

संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार की सीमा को रेखांकित करते हुए खंडपीठ ने दोहराया। कहा, हाई कोर्ट अनुशासनात्मक प्राधिकारियों द्वारा पारित आदेशों के खिलाफ किसी अपीलीय अदालत की तरह काम नहीं करता है। न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का दायरा केवल निर्णय लेने की प्रक्रिया (Decision-making process) की जांच करने तक सीमित है, न कि गुण-दोष (Merits) के आधार पर निर्णय की शुद्धता को जांचने के लिए।” चूंकि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और विधिक थी, इसलिए सजा में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं है।

केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix)

कानूनी बिंदु / श्रेणियांदिल्ली उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026)
केस और साइटेशनममता चौधरी बनाम भारत संघ (Mamta Chaudhary v. Union of India); 2026:DHC:4986-DB
माननीय न्यायाधीशजस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन (खंडपीठ)
संबंधित वैधानिक नियमसीआईएसएफ रूल्स, 2001 (CISF Rules, 2001) का नियम 18 और नियम 36(2)
मुख्य कानूनी प्रश्नक्या उसी यूनिट के अधिकारी को जांच अधिकारी बनाना जांच को अवैध करता है? क्या एकतरफा बर्खास्तगी वैध है?
अदालत का अंतिम आदेशयाचिका पूरी तरह खारिज; विवाहित पुरुष से शादी करने और ड्यूटी से गायब रहने पर बर्खास्तगी का आदेश विधिक रूप से सही और बहाल रहेगा।
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