Monday, August 10, 2026
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Ino-Russian MOU: मास्को में बोले CJI सूर्यकांत…आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कभी नहीं ले सकता जजों की जगह, रूस से नए समझौते को समझिए

Ino-Russian MOU: सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस(CJI) सूर्यकांत ने तकनीक और न्यायशास्त्र के अंतर्संबंध पर एक बेहद महत्वपूर्ण संदेश दिया है।

मास्को में रूसी संघ के सर्वोच्च न्यायालय के अध्यक्ष इगोर क्रास्नोव के साथ एक द्विपक्षीय बैठक के दौरान CJI ने स्पष्ट किया कि न्याय की कस्टडी और विवेक केवल इंसानी हाथों में ही सुरक्षित रह सकता है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मुकदमों के प्रबंधन और अनुवाद में जजों की मदद तो कर सकता है, लेकिन वह कभी भी न्यायिक निर्णय नहीं ले सकता और न ही मानवीय विवेक (Judicial Discretion) का स्थान ले सकता है।

न्याय में AI की भूमिका: सीमाएं और संभावनाएं

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने नवाचार (Innovation) का स्वागत करते हुए तकनीक की विधिक सीमाओं को रेखांकित किया।

मददगार, मगर नियंता नहीं: AI का उपयोग सूचनाओं को व्यवस्थित करने, विधिक अनुवाद की सुविधा प्रदान करने, अदालती कार्यवाही के ट्रांसक्रिप्ट (लिखित पाठ) तैयार करने और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए किया जा सकता है।

इंसानी दिमाग ही रहेगा सर्वोपरि: CJI ने जोर देकर कहा, “AI कभी भी मुकदमों के अंतिम नतीजे तय नहीं कर सकता, गवाहों की विश्वसनीयता का आकलन (Witness Credibility) नहीं कर सकता, सबूतों का मूल्यांकन नहीं कर सकता और न ही न्यायिक विवेक का प्रयोग कर सकता है।”

सुप्रीम कोर्ट के मसौदा नियम (Draft Regulations): उन्होंने बताया कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में अधिसूचित ‘न्यायपालिका में AI के उपयोग के मसौदा नियमों’ में भी इसी अंतर को स्पष्ट किया गया है, जो न्यायिक स्वतंत्रता और मानवीय निरीक्षण (Human Oversight) को अक्षुण्ण रखते हुए AI के जिम्मेदार उपयोग को सुनिश्चित करते हैं।

भारत-रूस न्यायिक सहयोग: विशाल और विविध समाजों की साझा चुनौतियां

CJI सूर्यकांत ने भारत और रूसी संघ के सर्वोच्च न्यायालयों के बीच ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंधों पर चर्चा की।

साझा उद्देश्य: दोनों देश भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत विशाल और विविध समाजों का प्रतिनिधित्व करते हैं। हालांकि दोनों की कानूनी परंपराएं अलग-अलग ऐतिहासिक रास्तों से गुजरी हैं, लेकिन दोनों के सामने एक ही साझा चुनौती है—तेजी से बदलती डिजिटल दुनिया में न्याय प्रणाली पर जनता का विश्वास कैसे बनाए रखा जाए।

न्यायिक शिक्षा पर निवेश: उन्होंने कहा कि आधुनिक न्यायपालिका की प्रभावशीलता दो कारकों पर निर्भर करती है—तकनीक का जिम्मेदारी से दोहन और न्यायिक शिक्षा के माध्यम से मानव संसाधन में निरंतर निवेश।

भारत का ‘इलेक्ट्रॉनिक कोर्ट मिशन मोड प्रोजेक्ट’ (e-Courts Project)

CJI ने वैश्विक मंच पर भारत के डिजिटल विधिक ढांचे की सफलताओं को साझा किया।

सुलभ और पारदर्शी न्याय: डिजिटल बदलाव का मुख्य उद्देश्य उन व्यावहारिक बाधाओं को दूर करना है जो नागरिकों को अदालतों तक पहुंचने से रोकती हैं।

अविभाज्य अंग बनी तकनीक: आज भारत में ई-फाइलिंग (e-Filing), डिजिटल केस मैनेजमेंट, अदालती रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण, ऑनलाइन विधिक पहुंच, वर्चुअल सुनवाई (Virtual Hearings) और वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग न्यायिक प्रशासन के अभिन्न अंग बन चुके हैं।

राष्ट्रीय न्यायिक शिक्षा रणनीति (NJES): भारत में जजों का प्रशिक्षण अब केवल पारंपरिक कानूनों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें साइबर कानून, डिजिटल साक्ष्य (Digital Evidence), AI और कोर्ट लीडरशिप जैसे उभरते क्षेत्रों के लिए तैयार किया जा रहा है।

केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Key Overview)

प्रशासनिक और तकनीकी बिंदुभारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) का वक्तव्य (23 जून, 2026)
वक्तामाननीय मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत (भारत के 53वें CJI)
आयोजन / स्थानद्विपक्षीय न्यायिक बैठक, मास्को (रूसी संघ)
मुख्य समकक्षइगोर क्रास्नोव (अध्यक्ष, रूसी संघ का सर्वोच्च न्यायालय)
मुख्य विधिक विज़नतकनीक केवल एक माध्यम है; न्याय की गुणवत्ता अंततः जजों की निष्ठा, विद्वता और मानवीय मूल्यों से तय होती है।
अदालती तकनीकी नीतिसुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया द्वारा अधिसूचित AI न्यायिक उपयोग मसौदा नियम
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