USA Supreme Court: U.S. Supreme Court ने ग्रीन कार्ड धारकों (Green Card Holders / वैध स्थायी निवासी) के खिलाफ कानूनी शक्तियों को लेकर डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन के पक्ष में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है।
अदालत ने 6-3 के बहुमत से व्यवस्था दी है कि यदि किसी ग्रीन कार्ड धारक पर किसी अपराध का आरोप है, तो सरकार के पास सीमा पर उसे ‘इमिग्रेशन पैरोल’ (Immigration Parole) पर रखने और बाद में निर्वासन (Deportation) की कार्यवाही शुरू करने का व्यापक अधिकार है। इस फैसले के बाद अमेरिकी सीमा अधिकारियों (Border Officers) को किसी ग्रीन कार्ड धारक को पैरोल पर रखने के लिए उसकी वापसी के समय ही अपराध के ‘पुख्ता और स्पष्ट सबूत’ (Clear and Convincing Evidence) पेश करने की अनिवार्यता नहीं होगी।
मामले की पृष्ठभूमि: चीन की यात्रा और जालसाजी का आरोप
यह पूरा कानूनी विवाद चीनी नागरिक और अमेरिका के वैध स्थायी निवासी मुक चोई लाउ (Muk Choi Lau) से जुड़ा है(
2012 की घटना: लाउ को 2007 में अमेरिका का ग्रीन कार्ड मिला था। मई 2012 में, न्यू जर्सी में उन पर नकली कपड़े बेचने (Trademark Counterfeiting) का आरोप लगा। इस मामले के अदालत में जाने से पहले लाउ चीन की एक छोटी यात्रा पर चले गए।
एयरपोर्ट पर पैरोल: जब जून 2012 में लाउ न्यूयॉर्क के जेएफके इंटरनेशनल एयरपोर्ट (JFK Airport) पर लौटे, तो सीमा अधिकारियों ने उन्हें सामान्य नागरिक की तरह सीधे प्रवेश देने के बजाय लंबित आपराधिक आरोपों के कारण ‘इमिग्रेशन पैरोल’ पर देश में प्रवेश दिया।
दोषसिद्धि और निर्वासन: बाद में लाउ ने अदालत में अपना गुनाह कबूल कर लिया, जिसके बाद उन्हें २ साल की प्रोबेशन की सजा मिली। 2014 में डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने लाउ को ‘नैतिक अधमता’ (Crime Involving Moral Turpitude) के अपराध में दोषी पाए जाने के आधार पर देश से निकालने (Deportation) की कार्यवाही शुरू की।
लाउ का विधिक तर्क: लाउ ने सरकार के इस कदम को अदालत में चुनौती दी। उनकी दलील थी कि एक ग्रीन कार्ड धारक होने के नाते जब वह विदेश से लौटे, तो वह पहले से ही ‘स्वीकृत’ (Presumptively Admitted) नागरिक थे। सीमा अधिकारियों के पास उस वक्त उनके खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं था, इसलिए उन्हें पैरोल पर रखना उनके वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन था। निचली अपीलीय अदालत (Second Circuit) ने लाउ के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: “बॉर्डर अधिकारियों पर सबूत का बोझ नहीं”
बहुमत का नेतृत्व करते हुए जस्टिस क्लेरेंस थॉमस (Justice Clarence Thomas) ने अपने फैसले में लिखा कि सरकार को निर्वासन की कार्यवाही के दौरान अपराध साबित करना होता है, न कि सीमा पर पैरोल देते समय सीमा अधिकारियों के पास प्रवेश के समय ही यह साबित करने का कोई विधिक बोझ (Burden of Proof) नहीं था कि लाउ ने ‘नैतिक अधमता’ से जुड़ा कोई अपराध किया है। केवल संदेह या लंबित आरोप ही पैरोल पर रखने और जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त है। ट्रम्प प्रशासन के वकीलों ने भी अदालत के समक्ष यही तर्क दिया था कि प्रवासन (Immigration) पर कार्यपालिका के पास व्यापक और संप्रभु अधिकार होने चाहिए।
असहमति का स्वर: “सरकार को मिल गया खुला चेक”
इस 6-3 के फैसले में तीन उदारवादी (Liberal) न्यायाधीशों ने असहमति (Dissent) जताई। लिबरल विंग की ओर से जस्टिस केतनजी ब्राउन जैक्सन (Justice Ketanji Brown Jackson) ने कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए लिखा, लाउ को अपराध साबित होने से पहले ही इमिग्रेशन पैरोल पर रखने का निर्णय वास्तव में उन्हें बिना किसी दोषसिद्धि के ‘कानूनी अधर’ (Immigration Limbo) में लटकाने जैसा था। मुझे डर है कि इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिकी सरकार के हाथ में एक बहुत बड़ा ‘ब्लैंक चेक’ (Blank Check) सौंप दिया है, जिसका इस्तेमाल ग्रीन कार्ड धारकों के खिलाफ मनमाने ढंग से हो सकता है।
केस मैट्रिक्स और विधिक विवरण (Case Overview)
| कानूनी और प्रशासनिक बिंदु | अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फैसला (२३ जून, २०२६) |
| संबंधित अदालत | संयुक्त राज्य अमेरिका का सर्वोच्च न्यायालय (U.S. Supreme Court) |
| बहुमत का फैसला | ६-३ से ट्रम्प प्रशासन के पक्ष में |
| मुख्य न्यायाधीश (बहुमत) | जस्टिस क्लेरेंस थॉमस |
| असहमत न्यायाधीश (Dissent) | जस्टिस केतनजी ब्राउन जैक्सन (साथ ही दो अन्य उदारवादी जज) |
| मुख्य पक्षकार | ब्लांश बनाम लाउ (Blanche v. Lau) |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | वैध स्थायी निवासियों (LPR) को सीमा पर पैरोल देने के लिए सरकार को तत्काल ‘क्लियर एंड कन्विंसिंग’ सबूत देने की जरूरत नहीं है; केवल लंबित आपराधिक आरोप या संदेह पर्याप्त है। |

