Wednesday, July 15, 2026
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DHCBA Strike: दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की हड़ताल तीसरे दिन भी जारी…APAA और IPAA ने दिया समर्थन, पढ़े खबर

DHCBA Strike: दिल्ली हाई कोर्ट के प्रशासनिक फैसले से उपजे इस विवाद ने अब एक बड़ा रूप ले लिया है।

16 जुलाई 2026 को भी वकील रहेंगे कामकाज से दूर

16 जुलाई 2026 को भी दिल्ली हाई कोर्ट के वकीलों ने अदालती कामकाज से पूरी तरह दूरी बनाए रखी। बार एसोसिएशन के आह्वान पर वकीलों ने न तो कोर्ट रूम में पैरवी की और न ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए। यहाँ तक कि कोर्ट की कैंटीन, बार रूम और अन्य आम सुविधाएं भी बंद रहीं। “जिला अदालतों के आर्थिक अधिकार क्षेत्र (Pecuniary Jurisdiction) की सीमा को ₹2 करोड़ से बढ़ाकर सीधे ₹10 करोड़ करने के दिल्ली हाई कोर्ट के प्रशासनिक फैसले के खिलाफ वकीलों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) की हड़ताल लगातार तीसरे दिन भी जारी रही। इस हड़ताल को देश और एशिया स्तर के बड़े बौद्धिक संपदा (IP) वकील संघों का भी खुला समर्थन मिल गया है।”

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विवाद की असली वजह: क्या है आर्थिक अधिकार क्षेत्र (Pecuniary Jurisdiction)?

यह पूरा विवाद इस बात को लेकर है कि कोई भी सिविल या कमर्शियल मुकदमा उसकी कीमत (मूल्य) के आधार पर किस अदालत में दायर किया जाएगा।

मौजूदा नियम: वर्तमान में ₹2 करोड़ तक के मूल्य के कमर्शियल मामले दिल्ली की जिला अदालतों (District Courts) में जाते हैं, जबकि ₹2 करोड़ से ऊपर के सभी बड़े और हाई-वैल्यू मुकदमे सीधे दिल्ली हाई कोर्ट (Original Side) में दायर किए जाते हैं।

नया प्रस्ताव: हाई कोर्ट के ‘फुल कोर्ट’ ने जिला अदालतों की इस सीमा को बढ़ाकर ₹10 करोड़ करने की सिफारिश की है।

असर: अगर यह नियम लागू होता है, तो हाई कोर्ट के पास आने वाले लगभग 70% बड़े कमर्शियल और सिविल मुकदमे सीधे जिला अदालतों में ट्रांसफर हो जाएंगे।

“हड़ताल को मिला वैश्विक और राष्ट्रीय विधिक संस्थाओं का साथ”

इस प्रशासनिक बदलाव का विरोध कर रहे हाई कोर्ट के वकीलों को दो बेहद प्रभावशाली पेशेवर संस्थाओं का समर्थन मिला है।

APAA (एशियन पेटेंट अटॉर्नी एसोसिएशन – भारतीय समूह): संस्था के सचिव एडवोकेट सुदीप चटर्जी के हस्ताक्षर से जारी प्रस्ताव में कहा गया कि वे हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को कम करने के फैसले के खिलाफ DHCBA के साथ पूरी तरह एकजुटता से खड़े हैं।

IPAA (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी अटॉर्नी एसोसिएशन): संस्था के अध्यक्ष एडवोकेट रंजन नरूला ने एक आपातकालीन बैठक के बाद प्रस्ताव पारित कर कहा कि जब तक जरूरत होगी, उनके सदस्य इस हड़ताल और कार्य बहिष्कार का पूर्ण समर्थन करेंगे।

IP वकीलों की विशेष चिंता: खत्म हो जाएगी स्पेशलाइज्ड कोर्ट की साख?

बौद्धिक संपदा (Intellectual Property – IP) के मुकदमों से जुड़े वकीलों ने इस बदलाव को लेकर गंभीर विधिक आपत्तियां उठाई हैं।

मामलों की अलग प्रकृति: आईपी मामलों (जैसे पेटेंट, ट्रेडमार्क और कॉपीराइट) की प्रकृति सामान्य संपत्ति या पैसों के लेन-देन के मुकदमों से बिल्कुल अलग होती है। इसमें मुख्य राहत हर्जाने की राशि नहीं, बल्कि उल्लंघन को रोकने का आदेश (Injunction) होती है। इसलिए दावों की कागजी कीमत अक्सर ₹10 करोड़ से कम आंकी जाती है।

IPD को नुकसान: दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2021 में एक विशेष ‘बौद्धिक संपदा प्रभाग’ (Intellectual Property Division – IPD) का गठन किया था, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुई है। अगर इन मामलों को जिला अदालतों में भेजा गया, तो इस विशेष व्यवस्था का महत्व खत्म हो जाएगा और मुकदमों की गुणवत्ता प्रभावित होगी।

मामला पहुंचा कोर्ट: INTA ने दी चुनौती

यह विवाद केवल हड़ताल तक सीमित नहीं है, बल्कि अब अदालत के भीतर भी पहुंच गया है। इंटरनेशनल ट्रेडमार्क एसोसिएशन (INTA) ने एडवोकेट उर्फी रूमी के माध्यम से दिल्ली हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की है।

इस याचिका में ‘फुल कोर्ट’ के 2 सितंबर 2025 के प्रस्ताव और अधिकार क्षेत्र बढ़ाने की समीक्षा करने वाली जजों की कमेटी के गठन को सीधे चुनौती दी गई है। याचिका में मांग की गई है कि बौद्धिक संपदा (IP) से जुड़े तमाम मामलों की सुनवाई उनकी वित्तीय कीमत की परवाह किए बिना केवल हाई कोर्ट के विशेष ‘बौद्धिक संपदा प्रभाग’ (IPD) में ही होनी चाहिए।

विधिक केस शीट: दिल्ली हाई कोर्ट अधिकार क्षेत्र विवाद (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांवर्तमान विधिक स्थिति और विवाद का विवरण
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
मुख्य आंदोलनकारीदिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA)
समर्थक संस्थाएंAPAA (इंडियन ग्रुप) और IPAA
प्रस्तावित बदलावजिला अदालतों की वित्तीय सीमा ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ करना।
न्यायालय में चुनौतीINTA, DHCBA और APAA द्वारा दायर रिट याचिकाएं कोर्ट में लंबित।

वकीलों का मानना है कि बुनियादी ढांचे और विशेषज्ञता के बिना ₹10 करोड़ तक के मुकदमों को जिला अदालतों में धकेलने से न्याय की गति धीमी होगी और दिल्ली हाई कोर्ट की विशेष पहचान कमजोर होगी। इस हड़ताल और अदालती याचिकाओं का नतीजा तय करेगा कि दिल्ली में भविष्य की कॉर्पोरेट और आईपी लिटिगेशन का स्वरूप क्या होने वाला है।

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