Monday, July 27, 2026
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ILP Extension in Nagaland: 150 साल पुराना औपनिवेशिक कानून आज भी लागू…नागालैंड के दीमापुर, चुमौकेदिमा और निउलैंड का मामला पढ़ें

ILP Extension in Nagaland: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने नागालैंड के दीमापुर, चुमौकेदिमा और निउलैंड जिलों में इनर लाइन परमिट (Inner Line Permit – ILP) प्रणाली के विस्तार को वैध ठहराते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन (BEFR), 1873 आज भी लागू

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और जस्टिस अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने ILP विस्तार को चुनौती देने वाली तीन जनहित याचिकाओं (PILs) को खारिज करते हुए फैसला सुनाया। अदालत ने माना है कि 150 साल पुराना ब्रिटिश काल का कानून बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन (BEFR), 1873′, संविधान के अनुच्छेद 372 के तहत आज भी एक वैध कानून के रूप में लागू है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 19(5) के तहत नागरिकों की आवाजाही और निवास की स्वतंत्रता पर तर्कसंगत प्रतिबंध (Reasonable Restrictions) लगाने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार प्रदान करता है।

मामला क्या था?: दीमापुर में ILP का विस्तार और जनहित याचिकाएं

अधिसूचनाएं: याचिकाओं में 20 सितंबर 2024 की अधिसूचना (जिसने दीमापुर, चुमौकेदिमा और निउलैंड में ILP लागू किया) और 27 मई 2025 की अधिसूचना (जिसने ILP प्राप्त करने के लिए आवश्यक दस्तावेजों को निर्धारित किया) को चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ताओं का तर्क

मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 19(1)(d) और (e) के तहत देश के किसी भी हिस्से में स्वतंत्र रूप से घूमने और बसने के अधिकार को केवल कार्यपालिका के आदेश (Executive Order) से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।

औपनिवेशिक कानून पर सवाल: 1873 का कानून ब्रिटिश राज में एक अलग उद्देश्य से बनाया गया था, जो आज के संवैधानिक ढांचे के तहत मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित करने का आधार नहीं बन सकता।

असम के समुदायों की चिंता: डिमासा और कर्बी जनजातियों के निवासियों (असम के दीमा हसाओ और कर्बी आंगलोंग जिलों से) ने तर्क दिया कि दीमापुर के साथ उनके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। इसके अतिरिक्त, ILP के लिए NRC दस्तावेजों की अनिवार्यता व्यावहारिक नहीं है क्योंकि असम में एनआरसी प्रक्रिया को अंतिम रूप नहीं मिला है।

राज्य सरकार (नागालैंड) का पक्ष

नागालैंड के महाधिवक्ता (Advocate General) ने दलील दी कि यह अधिसूचना BEFR, 1873 की धारा 2 के तहत जारी की गई है, जो अनुच्छेद 372 के तहत लागू कानून है।

अनियंत्रित प्रवास, जन सुरक्षा, क्षेत्रीय सुरक्षा (AFSPA के तहत क्षेत्र का अशांत घोषित होना) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के हितों और संस्कृति की रक्षा के लिए यह कदम अनिवार्य था।

गुवाहाटी उच्च न्यायालय की मुख्य विधिक व्याख्याएं

“संविधान औपनिवेशिक कानूनों को भी वैधता प्रदान करता है” (Article 372)

अदालत ने कहा कि केवल कानून के औपनिवेशिक इतिहास के आधार पर उसे अमान्य नहीं ठहराया जा सकता। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने कहा, अनुच्छेद 372 केवल कार्यपालिका की प्रथाओं को संरक्षित नहीं करता; यह कानूनों को संरक्षित करता है… इसे संविधानोत्तर (Post-Constitution) वैधता उस औपनिवेशिक सत्ता से नहीं मिलती जिसने इसे मूल रूप से बनाया था, बल्कि भारत के संविधान से मिलती है।

‘तर्कसंगत प्रतिबंध’ का परीक्षण (Reasonableness Standard)

अदालत ने माना कि ILP प्रणाली प्रवेश या निवास पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाती, बल्कि यह केवल एक नियामक व्यवस्था (Regulatory Mechanism) है।

व्यापक जनहित: बड़े पैमाने पर होने वाले प्रवास के प्रभाव केवल व्यक्तिगत आवाजाही तक सीमित नहीं होते। इसका प्रभाव भूमि संसाधनों, रोजगार, सांस्कृतिक संरक्षण, जनसांख्यिकीय संतुलन और स्थानीय असुरक्षित समुदायों की सुरक्षा पर पड़ता है।

संवैधानिक उद्देश्य: यह प्रतिबंध अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा और जनहित के संवैधानिक उद्देश्यों के साथ सीधा संबंध (Rational Nexus) रखता है।

अनुच्छेद 14 के तहत वर्गीकरण (Reasonable Classification)

कोर्ट ने माना कि सरकार ने निवासियों को तीन ऐतिहासिक श्रेणियों में वर्गीकृत किया है।

  • 1 दिसंबर 1963 से पहले बसे लोग
  • 2 दिसंबर 1963 से 21 नवंबर 1979 के बीच बसे लोग
  • 21 नवंबर 1979 के बाद आने वाले लोग

शुरुआती दो श्रेणियों को ILP से छूट दी गई है और वे स्थायी निवासी प्रमाण पत्र (PRC) के पात्र हैं। यह वर्गीकरण स्थानीय जनजातीय हितों और पुराने निवासियों की वैध अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाता है।

असम के निवासियों के लिए NRC की अनिवार्यता पर राहत

असम के डिमासा और कर्बी याचिकाकर्ताओं की एनआरसी दस्तावेज संबंधी चिंताओं पर नागालैंड सरकार ने कोर्ट में स्पष्ट किया कि असम के कछार, करीमगंज/हैलाकांडी, दीमा हसाओ और कर्बी आंगलोंग के आवेदकों के लिए अंतिम एनआरसी दस्तावेज अनिवार्य नहीं होगा। इसके बजाय, ARN नंबर वाला ऑनलाइन ‘रिसिप्ट ऑफ क्लेम’ (Receipt of Claim) ही ILP आवेदन के प्रसंस्करण के लिए पर्याप्त माना जाएगा।

उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय

याचिकाएं खारिज: कोर्ट ने BEFR, 1873 की वैधता को बरकरार रखते हुए दीमापुर, चुमौकेदिमा और निउलैंड में ILP विस्तार से जुड़ी सभी तीनों जनहित याचिकाओं को निरस्त कर दिया।

अंतरिम आदेश समाप्त: मामले में दिए गए सभी पूर्व अंतरिम आदेशों को समाप्त कर दिया गया।

केस मैट्रिक्स: Gauhati High Court Ruling on ILP Extension in Nagaland

पहलूविवरण
संबंधित अदालतगुवाहाटी उच्च न्यायालय (Gauhati High Court)
माननीय पीठमुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार एवं जस्टिस अरुण देव चौधरी
संबंधित कानूनBengal Eastern Frontier Regulation (BEFR), 1873 एवं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19(5), 371A, 372
प्रभावित क्षेत्रदीमापुर, चुमौकेदिमा और निउलैंड (नागालैंड)
मुख्य निष्कर्षBEFR 1873 अनुच्छेद 372 के तहत वैध कानून है; ILP विस्तार अनुच्छेद 19(5) के तहत तर्कसंगत प्रतिबंध है।
अंतिम निर्णयसभी जनहित याचिकाएं खारिज; ILP विस्तार पूरी तरह वैध घोषित।
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