Matrimonial Counterblast: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, वैवाहिक विवादों में ससुराल वालों को घसीटना और बच्चों को ढाल बनाना चिंताजनक है।
एक नाबालिग बच्चे की बुआ पर दर्ज POCSO केस का मामला
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को दरकिनार कर दिया जिसमें एक नाबालिग बच्चे की बुआ पर दर्ज POCSO केस को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने बुआ के खिलाफ दर्ज FIR को ‘बदले की भावना से की गई कार्रवाई’ (Counterblast) मानते हुए पूरी तरह निरस्त (Quash) कर दिया। कहा, वैवाहिक विवादों (Matrimonial Disputes) में आपसी बदला लेने के लिए ससुराल पक्ष के रिश्तेदारों को आपराधिक मामलों में घसीटने और बच्चों का इस्तेमाल एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने गहरा दुख और चिंता व्यक्त की है।
मामला क्या था?: पति-पत्नी के विवाद में ‘क्रॉस FIR’ और POCSO केस
पृष्ठभूमि: पति-पत्नी के बीच लंबे समय से कड़वा वैवाहिक विवाद चल रहा था, जिसके बाद सितंबर 2023 में आपसी सहमति से तलाक हो गया। बच्चे (जुड़वां बेटा और बेटी) पिता की कस्टडी में थे और मां को मिलने (Visitation Rights) का अधिकार मिला हुआ था।
बदले की एफआईआर: 17 मार्च 2024 को पिता ने मां के भाई (मामा) के खिलाफ अपनी बेटी से यौन उत्पीड़न के आरोपों में FIR दर्ज कराई। इसके महज कुछ घंटे बाद, तलाकशुदा मां ने पलटवार करते हुए पिता की बहन (बुआ) के खिलाफ अपने बेटे के यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए खड़की पुलिस स्टेशन (पुणे) में POCSO Act और IPC धारा 354 के तहत क्रॉस FIR दर्ज करा दी।
बुआ की याचिका: आरोपी बुआ ने इस झूठी और प्रतिशोध की भावना से दर्ज कराई गई FIR को रद्द कराने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया, लेकिन हाई कोर्ट ने केस रद्द करने से इनकार कर दिया। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य विधिक टिप्पणियां
“ससुराल वालों को घसीटना और बच्चों का दुरुपयोग करना आम बात”
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अपने आदेश में कहा, वैवाहिक कलह से उत्पन्न मामलों में अपने निजी हिसाब चुकता करने के लिए ससुराल वालों को घसीटना अब एक आम बात या प्रथा जैसी बन गई है। अक्सर एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए मासूम बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन हम तलाकशुदा मां द्वारा लगाए गए इन आरोपों से स्तब्ध हैं कि उसके बेटे का उसकी सगी बुआ द्वारा लगातार यौन उत्पीड़न किया गया।
धारा 164 CrPC के बयानों में कोई सच्चाई नहीं
पीठ ने नोट किया कि जब प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा नाबालिग पीड़ित बच्चे का धारा 164 CrPC के तहत बयान दर्ज किया गया, तो बच्चे ने स्पष्ट किया कि उसके साथ ऐसी कोई घटना या यौन उत्पीड़न नहीं हुआ है।
तलाक के समय क्यों नहीं उठाए गए आरोप?
अदालत ने कहा कि मां का दावा था कि यह घटना उसके ससुराल में रहने के दौरान हुई थी, लेकिन तलाक की कार्यवाही के दौरान या 17 मार्च 2024 की एफआईआर से पहले कभी भी ऐसा कोई आरोप नहीं लगाया गया। पिता द्वारा मामा पर केस दर्ज कराने के तुरंत बाद यह FIR कराई गई, जो साफ तौर पर बदले की कार्रवाई (Retaliatory Counterblast) दर्शाती है।
बॉम्बे हाई कोर्ट की खिंचाई
शीर्ष अदालत ने बॉम्बे हाई कोर्ट के रुख की आलोचना करते हुए कहा कि हाई कोर्ट को रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों (विशेषकर धारा 164 के तहत बच्चे के बयान) की जांच करनी चाहिए थी, जहां साफ दिख रहा था कि प्रथम दृष्टया आरोप टिकने योग्य नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
FIR रद्द: सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी बुआ के खिलाफ पुणे के खड़की पुलिस स्टेशन में IPC की धारा 354 और POCSO Act की धारा 8 के तहत दर्ज FIR को पूरी तरह निरस्त (Quash) कर दिया।
ट्रायल से राहत: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस एफआईआर के आधार पर आरोपी के खिलाफ कोई आगे की कार्यवाही नहीं की जाएगी और उन्हें मुकदमों की प्रताड़ना से मुक्त किया जाता है।
केस मैट्रिक्स: Supreme Court Decision on Matrimonial Counterblast POCSO Case
| प्रक्रियात्मक और विधिक पहलू | विवरण / अदालत का फैसला |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय पीठ | जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन |
| याचिकाकर्ता की वकील | एडवोकेट सना रईस खान (Advocate Sana Raees Khan) |
| संबंधित धाराएं | POCSO Act की धारा 8 एवं IPC की धारा 354 |
| मुख्य कानूनी मुद्दा | क्या वैवाहिक विवाद में बदले की भावना (Counterblast) से दर्ज कराई गई झूठी POCSO FIR को रद्द किया जाना चाहिए? |
| अदालत का निर्णय | हाँ; धारा 164 CrPC के बयानों और परिस्थितियों से स्पष्ट है कि केस बदला लेने के उद्देश्य से दर्ज कराया गया था। FIR निरस्त। |

