केस मैट्रिक्स: Rajasthan High Court Ruling on Prisoner’s Property Rights
| पहलू | विवरण |
| संबंधित अदालत | राजस्थान उच्च न्यायालय (Jaipur Bench) |
| माननीय पीठ | जस्टिस अनूप कुमार ढांड (Single Bench) |
| संबंधित कानून व नियम | संविधान (अनुच्छेद 21, 300A), रजिस्ट्रेशन एक्ट 1908 (धारा 38), राजस्थान जेल नियम 2022 |
| मुख्य विधिक प्रश्न | क्या जेल में बंद कैदी पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए अपनी संपत्ति बेच सकता है? |
| अदालत का फैसला | हां। कैदी को संपत्ति धारण करने और बेचने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। |
| अंतिम निर्देश | जयपुर जेल अधीक्षक को पावर ऑफ अटॉर्नी तुरंत अनुप्रमाणित और पंजीकृत कराने का आदेश। |
Prisoner’s Property Rights: जेल में बंद विचाराधीन कैदियों (Undertrial Prisoners) के मौलिक और संवैधानिक अधिकारों पर राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाया है।
संपत्ति को कानूनी रूप से बेच या हस्तांतरित कर सकता है: अदालत
हाईकोर्ट के जस्टिस अनूप कुमार ढांड की एकल पीठ ने विशेष अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने एक कैदी को जेल परिसर के भीतर अपने भाई के नाम पावर ऑफ अटॉर्नी पंजीकृत कराने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल जेल में होने या आपराधिक मामले में आरोपी होने से किसी व्यक्ति की ‘नागरिक मृत्यु’ (Civil Death) नहीं हो जाती। एक विचाराधीन कैदी जेल अधीक्षक के माध्यम से पंजीकृत पावर ऑफ अटॉर्नी (Power of Attorney) निष्पादित कर अपनी संपत्ति को कानूनी रूप से बेच या हस्तांतरित कर सकता है।
मामला क्या था?: आर्थिक तंगी और विशेष अदालत का इनकार
पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता जयपुर केंद्रीय कारागार (Central Jail, Jaipur) में बंद एक विचाराधीन कैदी है। वह अपनी संयुक्त संपत्ति का सह-मालिक (Co-owner) है।
याचिका की वजह: गंभीर आर्थिक तंगी के कारण कैदी अपनी संपत्ति का कुछ हिस्सा बेचना चाहता था। इसके लिए उसने विशेष अदालत में आवेदन देकर जेल अधीक्षक को यह निर्देश देने की मांग की कि उसे अपने भाई (दिलीप सिंह) के नाम ‘जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी’ (GPA) निष्पादित और पंजीकृत करने की अनुमति दी जाए।
विशेष अदालत का तर्क: ट्रायल कोर्ट ने याचिका यह सोचकर खारिज कर दी कि कहीं यह संपत्ति ‘अपराध की कमाई’ (Proceeds of Crime) से तो नहीं खरीदी गई है। इसके खिलाफ कैदी ने हाई कोर्ट का रुख किया।
राजस्थान हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व्याख्याएं
जेल में होने से संपत्ति बेचने का अधिकार नहीं छिनता
हाई कोर्ट ने आपराधिक आरोपी के मौलिक अधिकारों को रेखांकित करते हुए कहा, कानून स्पष्ट है कि एक विचाराधीन कैदी अपनी संपत्ति को हस्तांतरित (Alienate) करने का अधिकार नहीं खोता है। वह जेल से ही जेल अधीक्षक के माध्यम से पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित कर सकता है। केवल आरोपी होने के कारण किसी को उसकी संपत्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life) और अनुच्छेद 300A (Right to Property) का सीधा उल्लंघन है।
‘अपराध की कमाई’ की काल्पनिक धारणा पर रोक
अदालत ने ट्रायल कोर्ट के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि जांच एजेंसी की चार्जशीट या साक्ष्यों में कहीं भी यह साबित नहीं हुआ था कि संपत्ति अपराध से अर्जित की गई है। साक्ष्यों के अभाव में अदालतें केवल कल्पना (Imagination) के आधार पर ऐसी धारणा नहीं बना सकतीं।
जेल में निष्पादन और पंजीकरण की कानूनी व्यवस्था (Registration Act, 1908)
अदालत ने समझाया कि जब कोई कैदी शारीरिक रूप से उप-पंजीयक (Sub-Registrar) कार्यालय नहीं जा सकता, तो कानून इसके लिए विशेष व्यवस्था देता है।
धारा 38(1)(b) पंजीकरण अधिनियम, 1908: रजिस्ट्रार किसी अधिकारी को जेल परिसर में भेजकर दस्तावेज का पंजीकरण कर सकता है।
राजस्थान जेल नियम, 2022 (नियम 202 व 526): कैदी जेल अधीक्षक/मजिस्ट्रेट के समक्ष पावर ऑफ अटॉर्नी पर हस्ताक्षर करता है, जो पहचान सत्यापित करने के बाद उसे अनुप्रमाणित (Attest) करते हैं।
हाई कोर्ट का अंतिम आदेश
ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द: हाई कोर्ट ने विशेष अदालत का आदेश निरस्त कर दिया।
जेल अधीक्षक को निर्देश: केंद्रीय कारागार, जयपुर के अधीक्षक को निर्देश दिया गया कि वे याचिकाकर्ता द्वारा उसके भाई के नाम हस्ताक्षरित जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी को तुरंत सत्यापित करें और बिना किसी देरी के इसका पंजीकरण सुनिश्चित कराएं।

