केस मैट्रिक्स: Patna High Court Ruling on Constable Dismissal & Toddy Consumption
Toddy Consumption: पटना हाईकोर्ट ने बिहार में पूर्ण शराबबंदी कानून लागू होने के बाद पुलिस कर्मियों पर होने वाली विभागीय कार्रवाइयों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
कांस्टेबल की मेडिकल जांच में शराब के बदले ताड़ी पीने की बात सामने आई
हाईकोर्ट के जस्टिस हरीश कुमार की एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा कि अनुशासनिक प्राधिकरण (Disciplinary Authority) ने उस आरोप के आधार पर कर्मचारी को बर्खास्त कर दिया जो उस पर कभी तय ही नहीं किया गया था।अदालत ने बिहार पुलिस के एक कांस्टेबल की बर्खास्तगी (Dismissal) के आदेश को रद्द कर दिया है। हाई कोर्ट ने पाया कि विभागीय जांच में कांस्टेबल पर शराब पीने का आरोप साबित नहीं हो सका, जबकि मेडिकल जांच में केवल ‘ताड़ी’ (Toddy) की गंध आने की बात कही गई थी।
मामला क्या था?: थाने के गेट पर विवाद और मेडिकल जांच
घटना और प्राथमिकी: याचिकाकर्ता कांस्टेबल (जो 1986 से सेवा में थे) नवंबर 2019 में नवादा जिले के पकड़ीबरावां थाने में पदस्थ थे। गश्ती दल ने उन्हें थाने के गेट पर एक अन्य व्यक्ति (रत्नाकर पंडित) के साथ बहस करते देखा।
सांस की जांच (Breath Analyser) और मेडिकल रिपोर्ट: पुलिस के अनुसार, ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट में शराब पीने की पुष्टि की बात कही गई। हालांकि, जब कांस्टेबल की जांच प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्सा अधिकारी द्वारा की गई, तो डॉक्टर ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया कि कांस्टेबल के मुंह से ‘ताड़ी’ की गंध आ रही थी।
बर्खास्तगी का आदेश: कांस्टेबल ने सफाई दी कि उसने चिकित्सीय सलाह पर बीमारी के इलाज के लिए ताड़ी पी थी। लेकिन अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने उनकी दलीलों को खारिज करते हुए 29 मई 2020 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। इसके खिलाफ कांस्टेबल ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
पटना हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व्याख्याएं
“जो आरोप तय ही नहीं हुआ, उस पर सजा नहीं दी जा सकती”
हाई कोर्ट ने अनुशासनिक प्राधिकारी के रुख पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा, अनुशासनिक प्राधिकारी ने इस महत्वपूर्ण तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ तय किया गया आरोप केवल ‘शराब का सेवन करने और उसके प्रभाव में हंगामा करने’ तक सीमित था। ताड़ी के सेवन से जुड़ा कोई भी आरोप कभी तय ही नहीं किया गया था। बिना आरोप तय किए उस पर सजा देना कानूनी रूप से पोषणीय नहीं है।
साक्ष्यों का अभाव और परवर्ष फाइंडिंग (Perverse Findings)
अदालत ने विभागीय जांच की कमियों को उजागर करते हुए नोट किया।
जांच रिपोर्ट में कमी: प्रस्तुतकर्ता अधिकारी (Presenting Officer) विभागीय जांच के दौरान न तो ब्रेथ एनालाइजर की रिपोर्ट पेश कर सका और न ही उस व्यक्ति की गवाही कराई जिसने वह टेस्ट किया था।
मेडिकल राय की अनदेखी: कांस्टेबल के वकील (अधिवक्ता संजय कुमार गिर) ने दलील दी कि डॉक्टर की रिपोर्ट में केवल ताड़ी की बात थी। साथ ही ‘बिहार नीरा (ताड़ी) नियम 2017’ के तहत ताड़ी का सेवन सीधे तौर पर प्रतिबंधित नहीं है।
विभागीय मनमानी: जांच अधिकारी की निष्कर्ष कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्यों पर आधारित नहीं थे, इसलिए बर्खास्तगी का आदेश कानून और तथ्यों दोनों की नजर में अवैध है।
हाई कोर्ट का अंतिम निर्णय
बर्खास्तगी रद्द: पटना उच्च न्यायालय ने कांस्टेबल की मई 2020 की बर्खास्तगी के आदेश और जुलाई 2023 के अपीलीय आदेश को रद्द कर दिया।
सेवा में बहाली का मार्ग प्रशस्त: कोर्ट के इस फैसले से 1986 से निष्कलंक सेवा देने का दावा करने वाले कांस्टेबल को बड़ी राहत मिली है।

