Wednesday, July 29, 2026
HomeHigh CourtMaintenance Rights: तलाक के बाद भी बच्चों के भरण-पोषण से नहीं बच...

Maintenance Rights: तलाक के बाद भी बच्चों के भरण-पोषण से नहीं बच सकता मुस्लिम पिता…CrPC की धारा 125 / BNSS की धारा 144 को समझें

केस मैट्रिक्स: Maintenance Rights of Minor Children under Section 125 CrPC / 144 BNSS & Muslim Law

पहलूविवरण
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस रवि वी. होसमनी (Justice Ravi V. Hosmani)
संबंधित कानूनCrPC धारा 125 / BNSS धारा 144 एवं मुस्लिम पर्सनल लॉ
नजीर/फैसला आधारNoor Saba Khatoon v. Mohd. Quasim (1997) SC Ruling
मुख्य विधिक सिद्धांत1. मां का कामकाजी होना पिता को बच्चों के भरण-पोषण से छूट नहीं देता।
2. तलाकशुदा मां के साथ रहने पर भी पिता की कानूनी/व्यक्तिगत जिम्मेदारी बनी रहती है।

Maintenance Rights: मुस्लिम पर्सनल लॉ और आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144 BNSS) के तहत पिता के कर्तव्यों को रेखांकित करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है।

जस्टिस रवि वी. होसमनी (Justice Ravi V. Hosmani) की पीठ ने एक पिता द्वारा अपने दो नाबालिग बेटों को ₹2,000 प्रति माह रखरखाव भत्ता देने के पारिवारिक अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि एक मुस्लिम पिता का अपने नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण (Maintenance) का दायित्व निरपेक्ष (Absolute) है और यह जिम्मेदारी मां के कामकाजी होने या बच्चों के तलाकशुदा मां के साथ रहने से समाप्त नहीं होती।

मामला क्या था?: पिता का दावा और हाई कोर्ट में चुनौती

  • मूल मामला: पारिवारिक अदालत ने याचिकाकर्ता-पिता को निर्देश दिया था कि वह अपनी तलाकशुदा पत्नी के पास रह रहे अपने दोनों नाबालिग बेटों को ₹2,000-₹2,000 प्रतिमाह भरण-पोषण भत्ता दे।
  • पिता की दलील: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसकी पूर्व पत्नी एक सरकारी स्कूल शिक्षक है और उसके पास बच्चों के पालन-पोषण के लिए पर्याप्त आय है। वहीं, वह खुद एक निजी उर्दू स्कूल में दैनिक वेतन भोगी शिक्षक (Daily-wage Teacher) है और उसकी आय सीमित है। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसे परेशान करने के लिए यह कार्यवाही शुरू की गई थी।
  • अदालत का अवलोकन: हाई कोर्ट ने पाया कि पिता पिछले दो वर्षों से अधिक समय से बच्चों के लिए कोई रखरखाव नहीं दे रहा था और उसने अपनी आय या असमर्थता साबित करने के लिए कोई वेतन रिकॉर्ड/सबूत पेश नहीं किया।

कर्नाटक हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व्याख्याएँ

मां की नौकरी पिता को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि हालांकि बच्चों का भरण-पोषण दोनों माता-पिता का कर्तव्य है, लेकिन केवल मां के नियोजित (कामकाजी) होने का मतलब यह नहीं है कि पिता अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों से भाग सकता है।

पर्सनल लॉ और CrPC S.125 / BNSS S.144 का दायरा

अदालत ने नूर सबा खातून बनाम मोहम्मद कासिम (1997) मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का पुनरुत्पादन करते हुए हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणी: “व्यक्तिगत कानून (Personal Law) और वैधानिक कानून (CrPC की धारा 125 / BNSS की धारा 144) दोनों के तहत, पर्याप्त साधन रखने वाले एक मुस्लिम पिता का अपने नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण का दायित्व तब तक निरपेक्ष है जब तक कि वे वयस्कता प्राप्त न कर लें (और बेटियों के मामले में उनके विवाह तक)—चाहे वे नाबालिग बच्चे अपनी तलाकशुदा मां के साथ ही क्यों न रह रहे हों।”

मुस्लिम लॉ के तहत भरण-पोषण की अवधि

अदालत ने मुस्लिम कानून का उल्लेख करते हुए बताया कि

  • बेटे के लिए: भरण-पोषण का कर्तव्य तब तक रहता है जब तक वह वयस्क न हो जाए या खुद कमाने में सक्षम न हो जाए।
  • बेटी के लिए: यह कर्तव्य उसकी शादी होने तक जारी रहता है।

फैसले का निष्कर्ष

  1. पारिवारिक अदालत का आदेश बहाल: हाई कोर्ट ने माना कि पारिवारिक अदालत द्वारा तय की गई ₹2,000 की राशि पूरी तरह से न्यायसंगत है।
  2. याचिका खारिज: निचली अदालत और पुनरीक्षण अदालत (Revisional Court) के फैसलों में कोई अवैधता या त्रुटि न पाते हुए हाई कोर्ट ने पिता की याचिका को खारिज कर दिया।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
broken clouds
29.1 ° C
29.1 °
29.1 °
75 %
5.6kmh
83 %
Tue
29 °
Wed
35 °
Thu
34 °
Fri
34 °
Sat
34 °