केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का फैसला (अगस्त 2026) |
| माननीय पीठ | जस्टिस विरिंदर अग्रवाल (पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय) |
| संविधान का अनुच्छेद | अनुच्छेद 25 (स्पष्टीकरण I): सिख धर्म में किरपाण धारण करने की स्वतंत्रता |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | कृपाण का धार्मिक प्रतीक होना बनाम हथियार के रूप में प्रयोग होना — इसका निर्धारण ट्रायल में होगा, चार्ज फ्रेमिंग के चरण में नहीं। |
| धारा 307 IPC का मापदंड | चोट की प्रकृति से ज्यादा हमलावर के इरादे (Intention) और अंग (Vital Body Part) का महत्व होता है। |
| परिणाम | डिस्चार्ज की मांग वाली रिवीजन याचिका खारिज, निचली अदालत का आदेश बरकरार। |
Sikh Man Using Kirpan: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने माना है कि यदि किसी सिख व्यक्ति पर कृपाण (Kirpan) का उपयोग किसी व्यक्ति को चोट पहुँचाने या हथियार की तरह करने का आरोप है, तो वह अदालत में आरोप तय करने (Framing of Charge) के शुरुआती चरण में संविधान के अनुच्छेद 25 के स्पष्टीकरण I (Explanation I to Article 25) के तहत संवैधानिक संरक्षण का दावा नहीं कर सकता।
जस्टिस विरिंदर अग्रवाल की एकल पीठ ने करनाल के एक मामले में निचली अदालत (अपर सत्र न्यायाधीश) द्वारा आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 (हत्या का प्रयास) और आर्म्स एक्ट, 1959 की धारा 25 के तहत तय किए गए आरोपों को बरकरार रखते हुए डिस्चार्ज (उन्मोचन) याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि कृपाण को धार्मिक आस्था के प्रतीक के रूप में धारण किया गया था या इसका उपयोग हमले के हथियार के रूप में हुआ, यह एक विवादित तथ्य है जिसका निर्धारण केवल ट्रायल (सुनवाई) के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होगा।
मामला क्या था? (Background)
- घटना: यह मामला 8 अगस्त 2023 की शाम का है। शिकायतकर्ता हरजीत सिंह अपने साथियों के साथ करनाल के मॉडल टाउन स्थित एक बेकरी के बाहर खड़े थे। आरोप है कि थार जीप में बैठे मुख्य आरोपी कुलवंत सिंह और उसके साथियों से कहासुनी हुई, जिसके बाद आरोपियों ने तलवारों और कृपाण से जानलेवा हमला कर दिया।
- आरोप: अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी कुलवंत सिंह ने शिकायतकर्ता के सिर को निशाना बनाकर कृपाण से हमला किया, जबकि अन्य आरोपियों ने भी तलवारों से हमला कर गंभीर चोटें पहुंचाईं।
- निचली अदालत का आदेश: एडिशनल सेशन जज ने आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 307, 323, 324, 34, 506 (नए कानून BNS 2023 के संबंधित प्रावधानों) और आर्म्स एक्ट की धारा 25 के तहत आरोप तय किए थे। आरोपियों ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाई कोर्ट के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं सिद्धांत
- अनुच्छेद 25 और आर्म्स एक्ट का दायरा: हाई कोर्ट ने स्वीकार किया कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत सिख धर्म के अनुयायियों को कृपाण धारण करने और साथ रखने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।हाई कोर्ट की टिप्पणी: “इस बात में कोई विवाद नहीं है कि सिख धर्म के अनुयायी को आस्था के प्रतीक के रूप में कृपाण पहनने और ले जाने का संवैधानिक अधिकार है। हालांकि, क्या याचिकाकर्ता नंबर 1 अनुच्छेद 25 के तहत इस लाभ का हकदार है, यह एक ऐसा प्रश्न है जो ट्रायल के दौरान पेश किए जाने वाले साक्ष्यों पर निर्भर करेगा, क्योंकि उस पर आरोप है कि कृपाण का उपयोग शिकायतकर्ता को चोट पहुँचाने के लिए हथियार के रूप में किया गया था, न कि आस्था के प्रतीक के रूप में।”
- अमृतधारी सिख होने के ठोस प्रमाण का अभाव: अदालत ने कहा कि इस चरण पर ऐसा कोई निर्विवाद रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया है जो यह साबित करे कि याचिकाकर्ता एक ‘अमृतधारी सिख’ है और वह कृपाण को अनिवार्य धार्मिक प्रतीक के रूप में ही धारण किए हुए था।
- चोटें साधारण होने पर भी धारा 307 लागू होना सही: याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि मेडिकल रिपोर्ट (MLR) में चोटें साधारण (Simple) पाई गई थीं और कोई फ्रैक्चर नहीं था, इसलिए धारा 307 नहीं बनती।
- सुप्रीम कोर्ट नजीर (स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम बलराम बामा पाटिल, 1983): हाई कोर्ट ने इस फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 307 के लिए परिणाम से ज्यादा यह देखा जाता है कि क्या हमला जान से मारने के इरादे (Intention) या ज्ञान (Knowledge) से किया गया था। चूंकि हमला सिर जैसे महत्वपूर्ण अंग (Vital Body Part) पर किया गया था, इसलिए प्रथम दृष्टया धारा 307 का आरोप सही है।
- बरामद हथियार और मेडिकल राय का विरोधाभास: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि पुलिस द्वारा बरामद की गई कृपाण के धारहीन (Blunt) होने के कारण डॉक्टर ने कहा था कि इन हथियारों से ऐसी चोटें नहीं लग सकतीं।
- कोर्ट का रुख: हाई कोर्ट ने कहा कि यह इस बात का संकेत हो सकता है कि वास्तविक हथियार बरामद नहीं हुए हैं, लेकिन इससे आरोप तय करने के स्तर पर केस खारिज नहीं किया जा सकता। यह तथ्य भी ट्रायल का विषय है।
अंतिम आदेश
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने माना कि एडिशनल सेशन जज द्वारा आरोप तय करने के आदेश में कोई अवैधता या प्रक्रियात्मक त्रुटि नहीं है। कोर्ट ने रिवीजन पिटीशन को खारिज करते हुए मामले को निचली अदालत में ट्रायल के लिए भेज दिया।
- याचिकाकर्ताओं के वकील: वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. हुंदल, अधिवक्ता गुरसाहिब सिंह हुंदल एवं अधिवक्ता अर्शप्रीत कौर।
- राज्य के वकील: अपर महाधिवक्ता (Addl. A.G.) रमेश कुमार अंबावता (हरियाणा)।

