केस मैट्रिक्स: AP High Court Ruling on POCSO & BNSS Discharge Provisions
| पहलू | विवरण |
| संबंधित अदालत | आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय (Andhra Pradesh High Court) |
| माननीय पीठ | जस्टिस डॉ. वाई. लक्ष्मण राव (Single Bench) |
| संबंधित कानून | BNSS (धारा 250, 251) एवं POCSO एक्ट (धारा 35) |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या POCSO कोर्ट आरोपी को डिस्चार्ज पर सुने बिना सीधे आरोप तय कर सकती है? |
| अदालत का उत्तर | नहीं। आरोपी को BNSS के तहत डिस्चार्ज मांगने और सुने जाने का वैधानिक अधिकार है। |
| अंतिम निर्णय | आरोप तय करने का आदेश रद्द; 15 दिन में डिस्चार्ज अर्जी दाखिल करने की छूट। |
BNSS Discharge Provisions: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा, POCSO एक्ट के तहत स्पीडी ट्रायल (त्वरित सुनवाई) के नाम पर अभियुक्त के मौलिक और वैधानिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
अभियुक्त का पक्ष सुने दिए स्पेशल कोर्ट के आदेश को किया रद्द
हाईकोर्ट के जस्टिस डॉ. वाई. लक्ष्मण राव की एकल पीठ ने क्रिमिनल रिवीजन याचिका को स्वीकार करते हुए स्पेशल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें बिना अभियुक्त का पक्ष सुने आरोप तय कर दिए गए थे। अदालत ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि POCSO स्पेशल कोर्ट आरोपी को डिस्चार्ज (मुक्त) करने या आरोप तय (Framing of Charges) करने के बिंदु पर सुनवाई का अवसर दिए बिना सीधे आरोप तय नहीं कर सकती।
मामला क्या था?: स्पेशल कोर्ट का आदेश और अपील
मामला: याचिकाकर्ता (आरोपी संख्या 2 और 3) के खिलाफ POCSO एक्ट, भारतीय न्याय संहिता (BNS) और अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम (ITPA) की विभिन्न धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल की गई थी।
याचिकाकर्ताओं की दलील: आरोपियों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए कहा कि जांच अधिकारी को उनके खिलाफ कोई प्रथम दृष्टया (Prima Facie) सबूत नहीं मिला था। इसके बावजूद स्पेशल कोर्ट ने उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 250 और 251 के तहत डिस्चार्ज मांगने या सुनवाई का अवसर दिए बिना ही सीधे आरोप तय कर दिए।
अभियोजन पक्ष की दलील: अभियोजन ने कहा कि चार्जशीट में पर्याप्त सबूत मौजूद हैं और POCSO एक्ट की धारा 35 के तहत मामलों के त्वरित निस्तारण (Speedy Trial) का प्रावधान है, इसलिए कोर्ट का सीधे चार्ज फ्रेम करना सही था।
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व्याख्याएं
POCSO की गति, BNSS के अधिकारों को खत्म नहीं कर सकती
अदालत ने स्पष्ट किया कि POCSO एक्ट में डिस्चार्ज या चार्ज फ्रेम करने की कोई अलग प्रक्रिया नहीं दी गई है, इसलिए इस चरण पर BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के नियम लागू होंगे। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणी, POCSO एक्ट की धारा 35(1) के तहत पीड़ित बच्चे के साक्ष्य 30 दिनों में दर्ज करने का निर्देश है, वहीं BNSS की धारा 250 और 251 आरोपी को डिस्चार्ज मांगने का अधिकार देती हैं। दोनों कानूनों का सामंजस्यपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण (Harmonious & Purposive) अर्थ निकाला जाना चाहिए, ताकि POCSO के त्वरित निस्तारण के उद्देश्य को नुकसान पहुंचाए बिना आरोपी के वैधानिक और निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के अधिकार को सुरक्षित रखा जा सके।
डिस्चार्ज याचिका दायर करने की समय-सीमा
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई स्पेशल कोर्ट बिना कमिट (Committal) के सीधे संज्ञान (Direct Cognizance) लेती है, तो BNSS की धारा 250(1) के तहत डिस्चार्ज आवेदन दाखिल करने की 60 दिनों की समय-सीमा पुलिस कागजात (Prosecution Papers) प्राप्त होने के बाद आरोपी की पहली पेशी की तारीख से गिनी जाएगी।
अनुच्छेद 21 और निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial)
अदालत ने माना कि भले ही आरोपियों ने तय समय में डिस्चार्ज की अर्जी की पूर्व सूचना न दी हो, फिर भी ट्रॉयल कोर्ट अपने वैधानिक दायित्व से मुक्त नहीं हो जाती। आरोपी का पक्ष सुने बिना आरोप तय करना संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Fair Trial) का उल्लंघन है।
हाई कोर्ट का अंतिम आदेश और दिशानिर्देश
- हाई कोर्ट ने स्पेशल कोर्ट के आरोप तय करने के आदेश को रद्द करते हुए मामले को वापस भेज दिया और निम्नलिखित निर्देश जारी किए।
- 15 दिनों का समय: याचिकाकर्ता आदेश की तिथि से 15 दिनों के भीतर BNSS की धारा 250 के तहत डिस्चार्ज अर्जी दाखिल करेंगे।
- 2 सप्ताह में निपटारा: डिस्चार्ज अर्जी दाखिल होने के बाद स्पेशल कोर्ट दोनों पक्षों को सुनवाई का पर्याप्त अवसर देकर 2 सप्ताह के भीतर इसका निस्तारण करेगी।
- चार्ज फ्रेमिंग की प्रक्रिया: यदि डिस्चार्ज अर्जी खारिज होती है, तो स्पेशल कोर्ट दोनों पक्षों को सुनने के बाद उसी दिन या अधिकतम 1 सप्ताह के भीतर आरोप तय करेगी।
- त्वरित ट्रायल: इसके बाद स्पेशल कोर्ट मामले को ट्रायल पर रखेगी और प्रक्रिया को यथाशीघ्र पूरा करेगी।

