Wednesday, August 5, 2026
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सुप्रीम कोर्ट: क्या मुसलमान बिना धर्म त्यागे उत्तराधिकार में शरीयत के बजाय धर्मनिरपेक्ष कानून अपना सकते हैं?

सुप्रीम कोर्ट: क्या मुसलमान बिना धर्म त्यागे उत्तराधिकार में शरीयत के बजाय धर्मनिरपेक्ष कानून अपना सकते हैं? क्या मुसलमान अपने पैतृक और अर्जित संपत्ति के उत्तराधिकार मामलों में शरीयत कानून के बजाय भारत के धर्मनिरपेक्ष उत्तराधिकार कानून के अधीन आ सकते हैं, बिना इस्लाम धर्म छोड़े, इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट विचार करने पर सहमति जताई।

केरल के त्रिशूर जिले के निवासी ने दायर की याचिका

मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने केरल के त्रिशूर जिले के निवासी नौशाद के.के की ओर से दायर याचिका पर विचार करते हुए केंद्र और केरल सरकार को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है। याचिका में मांग किया कि मुस्लिम व्यक्तियों को अपनी इच्छा से मुस्लिम उत्तराधिकार कानून की बाध्यता से बाहर निकलने का अधिकार दिया जाए और उनकी वसीयतों को धर्मनिरपेक्ष कानूनों के तहत मान्यता दी जाए।

यह कहा गया है याचिका में

नौशाद ने अपनी याचिका में कहा है कि मुसलमानों को वसीयत (Will) लिखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, यानी वे मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) द्वारा तय सीमाओं से हटकर अपनी मर्जी से संपत्ति बांट सकें—बशर्ते वे स्पष्ट रूप से ऐसा करने की इच्छा जताएं। पीठ ने याचिका को इसी मुद्दे पर लंबित दो अन्य मामलों के साथ जोड़ने का आदेश दिया। अप्रैल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य याचिका सफिया पी.एम. की, जो एक्स-मुस्लिम्स ऑफ केरल की महासचिव हैं, पर भी विचार करने की सहमति दी थी। इसमें उन्होंने खुद को गैर-विश्वासी बताते हुए शरीयत के बजाय उत्तराधिकार कानून के तहत संपत्ति विवाद हल करने की मांग की थी। इसी तरह, 2016 में कुरान सुन्नत सोसाइटी द्वारा दाखिल एक याचिका भी पहले से लंबित है। अब इन तीनों मामलों की एक साथ सुनवाई होगी।

यह है कि शरीयत के तहत सीमाएं हैं

याचिका में कहा गया कि शरीयत के अनुसार कोई भी मुस्लिम अपनी संपत्ति का केवल एक-तिहाई हिस्सा वसीयत द्वारा किसी को दे सकता है और वह भी सिर्फ उन लोगों को जो वारिस नहीं हैं (खासकर सुन्नी मुस्लिमों में)। बाकी दो-तिहाई हिस्सा निर्धारित इस्लामी उत्तराधिकार नियमों (फराएज़) के अनुसार वारिसों में बंटता है। यदि इस नियम से अलग कोई वसीयत की जाए और वारिसों की सहमति न हो, तो वह वसीयत अमान्य मानी जाती है।

याचिका में संविधान के अनुच्छेदों का हवाला

याचिका में कहा गया कि इस तरह की धार्मिक बाध्यता संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता व गरिमा का उल्लंघन करती है। यह भी तर्क दिया गया कि अन्य धर्मों के लोगों और यहां तक कि उन मुस्लिमों को भी जो विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी करते हैं, वसीयत की पूरी स्वतंत्रता मिलती है, जबकि बाकी मुसलमान इससे वंचित रहते हैं, जो भेदभाव है।

यह है विशेष विवाह अधिनियम का उदाहरण

याचिका में बताया गया कि जब कोई मुस्लिम निकाह के बजाय विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत विवाह करता है, तो राज्य मुस्लिम पर्सनल लॉ लागू नहीं करता, भले ही दोनों पक्ष मुस्लिम हों। इसे मान लिया जाता है कि उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ से बाहर जाने का विकल्प चुना है। लेकिन जब कोई मुस्लिम शरीयत की सीमाओं की अवहेलना करते हुए वसीयत बनाता है, तो उसे अमान्य ठहरा दिया जाता है—जो अनुचित है। इसलिए याचिका में मांग की गई कि सरकार आवश्यक संशोधन या दिशानिर्देश बनाए जिससे हर व्यक्ति को, चाहे उसका धर्म कोई भी हो, वसीयत की पूरी स्वतंत्रता मिल सके।

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