उपभोक्ता आयोग के मुख्य निष्कर्ष
- समय पर रेफर न करना लापरवाही: आयोग ने माना कि डॉक्टर ने न केवल लापरवाही से सर्जरी की, बल्कि स्थिति बिगड़ने के बावजूद मरीज को समय रहते उच्च संस्थान (Higher Institute) रेफर नहीं किया।
- विशेषज्ञ रिपोर्ट की यांत्रिक आवश्यकता नहीं: अदालत ने डॉक्टर की इस दलील को खारिज कर दिया कि लापरवाही साबित करने के लिए मेडिकल बोर्ड की एक्सपर्ट रिपोर्ट अनिवार्य है। आयोग ने कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड (बात्रा अस्पताल के दस्तावेज) खुद लापरवाही बयां कर रहे हैं।
- लापरवाही के तीन तत्व साबित: कोर्ट ने माना कि इस मामले में डॉक्टर की जिम्मेदारी (Duty), जिम्मेदारी का उल्लंघन (Breach), और उससे हुआ नुकसान (Damage) पूरी तरह सिद्ध होता है।
करनाल: करनाल जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने किडनी स्टोन (गुर्दे की पथरी) की सर्जरी के बाद लगातार रक्तस्राव और मूत्र प्रतिधारण (Urinary Retention) जैसी जटिलताओं से जूझ रहे मरीज के मामले में डॉक्टर को चिकित्सीय लापरवाही (Medical Negligence) का दोषी ठहराया है।
जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष जसवंत सिंह, सदस्य नीरू अग्रवाल और सरबजीत कौर की पीठ ने 12 अगस्त को यह फैसला सुनाया। आयोग ने समय पर मरीज को उच्च चिकित्सा संस्थान रेफर न करने और इलाज में कमियों के आधार पर डॉक्टर की बीमा कंपनी को ₹2 लाख का मुआवजा मरीज को देने का निर्देश दिया है।
उपभोक्ता आयोग की प्रमुख टिप्पणियां
चिकित्सीय कर्तव्य और लापरवाही के तत्वों पर आयोग ने कहा: “मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से स्पष्ट है कि, पहली बात—डॉक्टर ने शिकायतकर्ता की सर्जरी लापरवाही से की। दूसरी बात—स्थिति बिगड़ने के बावजूद मरीज को उचित प्रबंधन के लिए शुरुआती चरण में किसी उच्च संस्थान (Higher Institute) में रेफर नहीं किया गया। यह विपक्षी अस्पताल और डॉक्टर की ओर से घोर लापरवाही और सेवा में कमी को दर्शाता है।”
विशेषज्ञ राय (Expert Opinion) की अनिवार्यता पर पीठ ने स्पष्ट किया: “हर मेडिकल लापरवाही के मामले में विशेषज्ञ साक्ष्य की यांत्रिक अनिवार्यता नहीं हो सकती। विशेषज्ञ साक्ष्य की आवश्यकता केवल तब होती है जब मामला इतना जटिल हो कि फोरम बिना विशेषज्ञ सहायता के उसका समाधान न कर सके। यहां उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड स्वयं लापरवाही की पुष्टि करते हैं।”
मामले की पृष्ठभूमि और जटिलताएं
- 20 मिमी की पथरी का इलाज: शिकायतकर्ता ने 20 मिमी की किडनी की पथरी के इलाज के लिए मार्च 2023 में यूरोलॉजिस्ट से संपर्क किया था। 11 मार्च को स्टेंटिंग की गई और 26 मार्च को पथरी निकालने के लिए मुख्य सर्जरी की गई।
- सर्जरी के बाद बिगड़ी स्थिति: सर्जरी के तुरंत बाद मरीज के मूत्र में अत्यधिक रक्तस्राव (Haematuria), खून के थक्के बनना, यूरिन रुकना और असहनीय दर्द शुरू हो गया। बार-बार अस्पताल में भर्ती करने के बावजूद स्थिति बिगड़ती रही।
- दिल्ली के बत्रा अस्पताल में खुलासा: हालत गंभीर होने पर डॉक्टर ने अंततः 7 अप्रैल 2023 को मरीज को ‘बत्रा अस्पताल एवं मेडिकल रिसर्च सेंटर, दिल्ली’ रेफर किया। वहां एंजियोग्राफी जांच में पता चला कि किडनी के निचले हिस्से में ‘स्यूडोएन्यूरिज्म’ (Pseudoaneurysm – रक्त वाहिका में असामान्य फैलाव/कट) हो गया था। ‘सेलेक्टिव एंबोलाइजेशन’ प्रक्रिया के बाद रक्तस्राव बंद हुआ और मरीज की जान बची।
- मेडिकल रिकॉर्ड में विसंगतियां: शिकायतकर्ता ने डिस्चार्ज समरी में विसंगतियों का भी आरोप लगाया—शुरुआती डिस्चार्ज में RIRS प्रक्रिया दर्ज थी, जबकि बाद की रेफरल समरी में PCNL और DJ स्टेंटिंग का उल्लेख किया गया।
डॉक्टर का बचाव
डॉक्टर ने लापरवाही के आरोपों से इनकार करते हुए तर्क दिया कि:
- रक्तस्राव और स्यूडोएन्यूरिज्म गुर्दे की पथरी की सर्जरी के ज्ञात जोखिम/जटिलताएं (Known Complications) हैं।
- मरीज ने दोनों प्रक्रियाओं (RIRS व PCNL) के लिए सहमति दी थी और स्थापित मानकों के अनुसार इलाज के बाद ही एंजियो-एंबोलाइजेशन के लिए दिल्ली रेफर किया गया।
आयोग द्वारा दिए गए मुख्य आधार
- ‘ड्यूटी, ब्रीच और डैमेज’ की पुष्टि: आयोग ने पाया कि डॉक्टर के पास देखभाल का कर्तव्य (Duty of Care) था, जिसका उल्लंघन (Breach) लापरवाही और देरी के रूप में हुआ, जिससे मरीज को शारीरिक व मानसिक क्षति (Damage) पहुंची।
- रेफर करने में अनुचित देरी: लगातार रक्तस्राव के बावजूद मरीज को कई दिनों तक रोके रखा गया और जब स्थिति अत्यंत नाजुक हो गई, तब 7 अप्रैल को रेफर किया गया।
- बीमा कंपनी का दायित्व: चूंकि संबंधित डॉक्टर के पास उस अवधि में वैध ‘प्रोफेशनल इंडेम्निटी पॉलिसी’ (Professional Indemnity Policy) थी, इसलिए क्षतिपूर्ति राशि का भुगतान करने का दायित्व बीमा कंपनी पर डाला गया।
उपभोक्ता आयोग की टिप्पणी
करनाल जिला उपभोक्ता आयोग ने फैसला सुनाते हुए कहा: “मामले के तथ्यों से यह स्पष्ट है कि डॉक्टर ने पहले तो लापरवाही से सर्जरी की और दूसरा, मरीज की स्थिति बिगड़ने के बावजूद उसे समय रहते उचित प्रबंधन के लिए उच्च संस्थान में रेफर नहीं किया। यह डॉक्टर और अस्पताल की ओर से सेवा में गंभीर कमी और लापरवाही को दर्शाता है।”
अंतिम आदेश
करनाल जिला उपभोक्ता आयोग ने शिकायत को स्वीकार करते हुए डॉक्टर की बीमा प्रदाता कंपनी को निर्देश दिया कि वह पीड़ित मरीज को चिकित्सीय लापरवाही और सेवा में कमी के एवज में ₹2 लाख का हर्जाना अदा करे।
Medical Negligence: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Order)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | जिला उपभोक्ता आयोग, करनाल (हरियाणा) |
| पीठासीन पीठ | जसवंत सिंह (अध्यक्ष), नीरू अग्रवाल एवं सर्वजीत कौर (सदस्य) |
| मामले की पृष्ठभूमि | मार्च-अप्रैल 2023 में 20mm गुर्दे की पथरी के ऑपरेशन के बाद लगातार रक्तस्राव और मूत्र में थक्के जमने की समस्या। |
| अदालत का फैसला | डॉक्टर और अस्पताल लापरवाही के दोषी; बीमा कंपनी को ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश। |

