Gunda Act: इलाहाबाद हाई कोर्ट जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 (UP Control of Goondas Act) के दुरुपयोग पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
हाई कोर्ट बुलंदशहर के एक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसे मेरठ कमिश्नर और बुलंदशहर एडीएम ने 6 महीने के लिए जिले से बाहर निकालने (Externment) का आदेश दिया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल एक या दो आपराधिक मामले दर्ज होने के आधार पर उसे ‘गुंडा’ घोषित कर जिले से बाहर (तड़ीपार) नहीं किया जा सकता।
मामला क्या था? (The Background)
- केस: याचिकाकर्ता के खिलाफ 2022 और 2023 में बुलंदशहर के खुर्जा नगर थाने में दो मामले (IPC और SC/ST एक्ट के तहत) दर्ज हुए थे।
- प्रशासनिक तर्क: अधिकारियों का दावा था कि वह एक ‘अभ्यस्त अपराधी’ (Habitual Offender) है, जिससे इलाके में डर का माहौल है और गवाह सामने आने से कतराते हैं।
- चुनौती: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ये मामले आपसी रंजिश के कारण दर्ज कराए गए हैं और अभी तक किसी में भी दोषसिद्धि (Conviction) नहीं हुई है।
कोर्ट का तर्क: ‘अभ्यस्त अपराधी’ होने की शर्त
- अदालत ने ‘गुंडा एक्ट’ की परिभाषा और उसकी कानूनी सीमाओं की व्याख्या की।
- संख्या बनाम स्वभाव: हालांकि कानून में अपराधों की कोई निश्चित संख्या तय नहीं है, लेकिन कोर्ट ने दोहराया कि किसी को ‘गुंडा’ ब्रांड करने के लिए उसका “अभ्यस्त अपराधी” होना जरूरी है।
- समय का अंतर: यदि अपराधों के बीच लंबा समय अंतराल है, तो ‘अभ्यस्त’ होने का तत्व स्थापित नहीं होता। केवल 2 मामलों के आधार पर किसी को समाज के लिए खतरा मान लेना गलत है।
- प्रतिष्ठा की रक्षा: जस्टिस जैन ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति को बिना पर्याप्त आधार के ‘गुंडा’ कहना उसकी और उसके परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा को ‘अपूरणीय क्षति’ (Irreparable Damage) पहुँचाता है।
‘गुंडा एक्ट’ क्या है? (What is the Goondas Act?)
- यह कानून प्रशासन को असाधारण शक्तियां देता है।
- परिभाषा (धारा 2b): ‘गुंडा’ वह है जो बार-बार (Habitually) हिंसा, अपहरण, जबरन वसूली या संपत्ति से जुड़े अपराध करता है।
- तड़ीपार (Externment): प्रशासन को अधिकार है कि वह ऐसे व्यक्ति की गतिविधियों को प्रतिबंधित करे या उसे जिले से बाहर जाने का आदेश दे।
- कानूनी पेच: कोर्ट ने नोट किया कि IPC के तहत अपराधों के लिए प्रोसीडिंग शुरू करने के लिए पहले से सजा होना अनिवार्य नहीं है, लेकिन ‘अभ्यस्त’ होने का सबूत अनिवार्य है।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| अदालत | इलाहाबाद हाई कोर्ट (जस्टिस संदीप जैन)। |
| निरस्त आदेश | मेरठ कमिश्नर और बुलंदशहर एडीएम का तड़ीपार आदेश। |
| मुख्य आधार | केवल 2 लंबित मामलों के आधार पर गुंडा एक्ट नहीं लग सकता। |
| कानूनी संदेश | प्रिवेंटिव कानून (निवारक कानून) का इस्तेमाल केवल असाधारण स्थितियों में होना चाहिए। |
| सुप्रीम कोर्ट का संदर्भ | हैबिचुअल ऑफेंडर साबित होना कानूनी आवश्यकता है। |
प्रशासनिक शक्ति पर न्यायिक लगाम
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए बड़ी राहत है जिन पर पुलिस अक्सर पुराने या इक्का-दुक्का मामलों के आधार पर गुंडा एक्ट की कार्रवाई कर देती है। अदालत ने साफ कर दिया है कि पुलिसिया कार्रवाई ‘मैकेनिकल’ नहीं होनी चाहिए और किसी की नागरिक स्वतंत्रता (Civil Liberty) को केवल संदेह या सीमित मामलों के आधार पर नहीं छीना जा सकता।

