Sunday, November 1, 2026
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HIV Infected Alimony: HIV पीड़ित पत्नी को निरंतर इलाज की जरूरत…स्थायी गुजारा भत्ता बढ़ाकर ₹7 लाख किया, पढ़िए भावुक टिप्पणी

केस मैट्रिक्स: Chhattisgarh High Court Judgment on Alimony Enhancement

HIV Infected Alimony: वैवाहिक विवादों और तलाक के मामलों में मानवीय दृष्टिकोण और पत्नी के स्वास्थ्य की स्थिति को सर्वोपरि रखते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि महिला की सीमित आय और निरंतर चलने वाले चिकित्सा उपचार (Continuous Medical Treatment) के खर्चों को ध्यान में रखते हुए स्थायी गुजारा भत्ता बढ़ाना न्यायसंगत है। अदालत ने विवाह के बाद HIV से संक्रमित हुई एक महिला को मिलने वाली स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) की राशि को ₹5 लाख से बढ़ाकर ₹7 लाख कर दिया है।

मामला क्या था?: विवाह के बाद HIV संक्रमण और तलाक की अर्जी

  • विवाह और बच्ची का निधन: पक्षकारों का विवाह 16 अप्रैल 2017 को हुआ था। 26 अगस्त 2018 को एक बेटी का जन्म हुआ, जो बाद में गंभीर बीमारी के कारण शांत हो गई।
  • पति का दावा: सरकारी कर्मचारी पति ने फैमिली कोर्ट में यह कहते हुए तलाक की याचिका दायर की थी कि उसकी पत्नी शादी से पहले से ही HIV पॉजिटिव थी और बच्ची भी HIV के साथ पैदा हुई थी। पति का कहना था कि मेडिकल स्थिति के कारण वे सामान्य वैवाहिक जीवन नहीं जी सकते।
  • पत्नी का पक्ष: पत्नी (अधिवक्ता अनिरुद्ध श्रीवास्तव के माध्यम से) ने स्पष्ट किया कि शादी से पहले वह बिल्कुल स्वस्थ थी और विवाह के बाद ही वह HIV पॉजिटिव पाई गई। उसने दलील दी कि इलाज का खर्च और भरण-पोषण उठाना पति का नैतिक व कानूनी दायित्व है।
  • हाई कोर्ट में अपील: फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक मंजूर किए जाने के बाद पत्नी ने हाई कोर्ट में अपील दायर की। हाई कोर्ट में पत्नी के वकील ने स्पष्ट किया कि वे तलाक को चुनौती नहीं दे रहे हैं, बल्कि इलाज और आजीविका के लिए उचित गुजारा भत्ते की मांग कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व्याख्याएं

निरंतर इलाज और आय के स्रोतों में बड़ा अंतर

दोनों पक्षों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का आंकलन करते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणी, अपीलकर्ता (पत्नी) प्राइवेट नौकरी से मात्र ₹6,000 प्रति माह कमा रही है, जबकि प्रतिवादी (पति) एक सरकारी कर्मचारी है और नियमित मासिक वेतन प्राप्त कर रहा है। अपीलकर्ता की बीमारी और उसे लगातार लगने वाले चिकित्सा उपचार को देखते हुए, यह अदालत ₹7,00,000 का स्थायी गुजारा भत्ता देना उचित मानती है।

कर्ज और पारिवारिक दायित्व का ध्यान

अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि महिला ने अपनी दिवंगत बेटी के इलाज के लिए ₹2 लाख का ऋण लिया था, जिसकी वह ₹3,200 प्रति माह की EMI चुका रही थी।

हाई कोर्ट का अंतिम आदेश और भुगतान की समयसीमा

अदालत ने पति (अधिवक्ता मनोज कुमार दुबे के माध्यम से प्रस्तुत पक्ष) को ₹7 लाख की कुल राशि का भुगतान निम्नलिखित किश्तों में करने का निर्देश दिया।

  1. पहली किश्त: ₹3 लाख का भुगतान 7 अगस्त 2026 तक करना होगा।
  2. शेष राशि: बाकी बचे ₹4 लाख का भुगतान दो छह-माही किश्तों में 7 जुलाई 2027 या उससे पहले पूरा करना होगा।

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