Tuesday, August 11, 2026
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Maharashtra Freedom of Religion Act: पुणे में पहली बार लागू हुआ महाराष्ट्र का नया धर्मांतरण-विरोधी कानून…दो अलग-अलग मामलों में FIR, पढ़ें

कानून की पृष्ठभूमि और राजनीतिक रुख (Overview Matrix)

पहलूविवरण
विधानसभा मंजूरीमार्च 2026 (बजट सत्र)
राष्ट्रपति की सहमति व अधिसूचनाराष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की स्वीकृति के बाद 31 जुलाई 2026 को गजट में प्रकाशित; 1 अगस्त 2026 से लागू।
सत्तारूढ़ पक्ष (समर्थन)महायुति गठबंधन (BJP, शिवसेना, NCP) द्वारा कानून का पूर्ण समर्थन।
विपक्ष का रुखविरोध: कांग्रेस, NCP (शरद पवार) और समाजवादी पार्टी।
समर्थन: शिवसेना (UBT) ने बिल के पक्ष में मतदान किया।

Maharashtra Freedom of Religion Act: महाराष्ट्र में नव अधिसूचित ‘महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026’ (Maharashtra Freedom of Religion Act, 2026) के लागू होने के कुछ ही दिनों भीतर पुणे शहर पुलिस ने इसके तहत शुरुआती दो मामले (FIR) दर्ज किए हैं। यह कानून 31 जुलाई 2026 को अधिसूचित होकर 1 अगस्त 2026 से राज्य में प्रभावी हुआ था।

पुणे में दर्ज हुए शुरुआती दो मामले

  1. पहला मामला (5 अगस्त 2026) – नाबालिग से जुड़ा मामला
    • आरोपी: उत्तर प्रदेश का निवासी 22 वर्षीय युवक।
    • घटनाक्रम: पुलिस के अनुसार, आरोपी और पीड़ित नाबालिग लड़की उत्तर प्रदेश के एक ही गांव के निवासी हैं। दोनों के बीच संबंध बने, जिसके बाद वे कर्नाटक और फिर पुणे आ गए। आरोपी पर अपनी नाबालिग “पत्नी” को धर्म बदलने के लिए दबाव बनाने का आरोप है।
    • धाराएं: आरोपी के खिलाफ नए कानून की धारा 3 और धारा 9(2) के साथ-साथ POCSO अधिनियम की धाराएं लगाई गई हैं। आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।
    • सजा का प्रावधान: धारा 9(2) के तहत नाबालिगों से जुड़े धर्मांतरण मामलों में 7 साल तक की जेल और ₹5 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है।
  2. दूसरा मामला – यूके नागरिक / OCI कार्डधारक पर कार्रवाई
    • आरोपी: यूनाइटेड किंगडम (UK) का नागरिक और भारत का ओवरसीज सिटीजन (OCI) कार्डधारक।
    • आरोप: पुलिस के अनुसार, आरोपी ने प्रार्थना सभाओं और धार्मिक आयोजनों में भाग लिया और लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित/प्रलोभित करने का प्रयास किया।
    • नियम उल्लंघन: पुलिस का कहना है कि OCI कार्डधारक को बिना आवश्यक अनुमति के धार्मिक उपदेश देने या प्रचार करने की इजाजत नहीं थी।

क्या हैं ‘महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026’ के मुख्य प्रावधान?

  • प्रलोभन व दबाव पर रोक: बलप्रयोग, धोखाधड़ी, प्रलोभन, गलत बयानी, धमकी या अनुचित प्रभाव के जरिए धर्मांतरण कराने या उसका प्रयास करने पर पूरी तरह रोक है।
  • शादी के जरिए धर्मांतरण: विवाह या शादी के वादे के माध्यम से कराए जाने वाले धर्मांतरण को भी इस कानून के दायरे में लाया गया है।
  • पूर्व सूचना की अनिवार्यता: स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को जिलाधिकारी (District Magistrate) को कम से कम 60 दिन पूर्व नोटिस देना अनिवार्य होगा।
  • शिकायत का अधिकार: पीड़ित व्यक्ति के माता-पिता, भाई-बहन और अन्य निकट संबंधी इसके तहत पुलिस में शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
  • सबूत का भार (Burden of Proof): धर्मांतरण स्वेच्छा से हुआ है, इसे साबित करने की जिम्मेदारी धर्मांतरण कराने वाले व्यक्ति पर होगी।
  • सख्त सजा: सामान्य अपराधों में 7 साल तक की सजा, जबकि दोहराने वाले अपराधों में 10 साल तक की जेल का प्रावधान है। नाबालिगों, महिलाओं, अनुसूचित जाति (SC)/अनुसूचित जनजाति (ST) के मामलों में बढ़ी हुई सजा का प्रावधान है।

धर्म की स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकारों और न्यायिक समीक्षा

भारत में धर्म की स्वतंत्रता (Freedom of Religion), संवैधानिक अधिकारों (Constitutional Rights) और न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) से जुड़े प्रमुख कानूनी विकल्प, प्रावधान और तंत्र निम्नलिखित हैं:

धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (Freedom of Religion)

भारतीय संविधान के भाग III में धार्मिक स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार के रूप में संरक्षण प्राप्त है।

  • अनुच्छेद 25: सभी व्यक्तियों को अपने अंतःकरण (Conscience) की स्वतंत्रता और किसी भी धर्म को मानने, आचरण करने तथा उसका प्रचार-प्रसार करने का अधिकार है।
    • सीमाएँ: सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order), नैतिकता (Morality), और स्वास्थ्य के आधार पर राज्य इस पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है।
  • अनुच्छेद 26: धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन, संस्थान बनाने और संपत्ति के स्वामित्व का अधिकार है।
  • अनुच्छेद 27 & 28: किसी विशेष धर्म के प्रचार के लिए कर (Tax) देने हेतु बाध्य न करना और सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा न देने से संबंधित प्रावधान।
  • राज्य स्तर के ‘धर्म स्वतंत्रता अधिनियम’ (Freedom of Religion Acts): कई राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड आदि) ने कथित गैर-कानूनी धर्मांतरण (Unlawful Conversion) को रोकने के लिए कानून बनाए हैं। इनमें विवाह के माध्यम से जबरन या धोखे से धर्मांतरण पर कड़े दंड के प्रावधान हैं।

संवैधानिक अधिकार और उनके लागू करने के उपाय (Constitutional Remedies)

नागरिक अपने मौलिक और संवैधानिक अधिकारों के हनन पर सीधे न्यायपालिका का रुख कर सकते हैं।

  • अनुच्छेद 32 (उच्चतम न्यायालय) एवं अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय): संवैधानिक अधिकारों को लागू कराने के लिए रिट (Writs) याचिकाएँ दायर करने का विकल्प:
    • बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus): अवैध हिरासत से रिहाई के लिए।
    • परमादेश (Mandamus): लोक प्राधिकारी को उसके कानूनी कर्तव्य का पालन कराने के लिए।
    • प्रतिषेध (Prohibition) & उत्प्रेषण (Certiorari): निचली अदालतों या ट्रिब्यूनल के न्यायिक क्षेत्राधिकार के उल्लंघन पर।
    • अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto): किसी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक पद के अवैध दावे की जाँच के लिए।

न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)

न्यायिक समीक्षा भारतीय संविधान का एक ‘मूल ढांचा’ (Basic Structure) है, जिसके तहत न्यायपालिका संसद या राज्य विधानसभाओं द्वारा बनाए गए कानूनों की संवैधानिक वैधता की जाँच करती है।

  • मुख्य आधार (Grounds for Judicial Review)
    • यदि कोई कानून मौलिक अधिकारों (भाग III) का उल्लंघन करता हो (अनुच्छेद 13)।
    • यदि विधानमंडल ने अपनी विधायी शक्ति (Legislative Competence) के बाहर जाकर कानून बनाया हो।
    • यदि कानून असंवैधानिक या मनमाना (Arbitrary) हो।
  • उपलब्ध विकल्प
    • जनहित याचिका (PIL – Public Interest Litigation): यदि राज्य का कोई ‘धर्म स्वतंत्रता अधिनियम’ या कानून संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो कोई भी नागरिक या संगठन अनुच्छेद 32 या 226 के तहत जनहित याचिका के जरिए उसे चुनौती दे सकता है।
    • संवैधानिक याचिका (Constitutional Writ Petition): प्रभावित व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सीधे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे सकता है।
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