Polyandrous Marriage: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने माना कि बहुपति सह-विवाह (Polyandrous Co-marriage) से जुड़े मामलों में उत्तराधिकार सामान्य हिंदू कानून से नहीं, बल्कि स्थानीय प्रथागत कानून (Customary Law) से संचालित होता है।
मृत पिता की संपत्ति में अधिकार मांगने वाले मुकदमे को खारिज कर दिया
हाईकोर्ट के जस्टिस राकेश कैंथला की पीठ ने स्पष्ट किया कि प्रथागत कानून के अनुसार, बहुपति विवाह में शामिल किसी एक भाई की मृत्यु होने पर उसकी संपत्ति पर पहला अधिकार उसी विवाह के जीवित भाई (Surviving Brother) का होता है, न कि बच्चों का। बच्चे तभी संपत्ति का दावा कर सकते हैं जब सह-विवाह में शामिल सभी भाइयों की मृत्यु हो जाए। हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों की पारंपरिक प्रथाओं से जुड़े एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण कानूनी मामले में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने बच्चों द्वारा अपने मृत पिता की संपत्ति में अधिकार मांगने वाले मुकदमे को खारिज कर दिया है।
मामला क्या था?: 1935 के उत्तराधिकार का विवाद
घटनाक्रम: याचिकाकर्ताओं (बच्चों) के पिता (मदन सिंह) और उनके भाई (देवी शरण) का एक ही महिला (नारो देवी) से संयुक्त/बहुपति विवाह हुआ था।
समयसीमा: पिता मदन सिंह की मृत्यु वर्ष 1935 (1992 विक्रमी संवत) में हुई थी—यानी हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act) के लागू होने से काफी पहले।
विवाद की वजह: मदन सिंह की मृत्यु के बाद राजस्व रिकॉर्ड में जमीन का उत्परिवर्तन (Mutation) उनके जीवित भाई देवी शरण के नाम दर्ज कर दिया गया। मदन सिंह के बच्चों ने पारंपरिक हिंदू कानून (मिताक्षरा/सहदायिकी) का हवाला देते हुए अपने पिता के हिस्से में अधिकार का दावा किया और अदालत में दीवानी मुकदमा दायर किया।
निचली अदालतों का फैसला: ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत—दोनों ने ही बच्चों का दावा खारिज कर दिया। इसके बाद बच्चों ने हाई कोर्ट में दूसरी अपील दायर की।
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व्याख्याएं
“जब तक सभी पिता (भाई) जीवित हैं, बच्चे अनाथ या पिताविहीन नहीं माने जाते”
अदालत ने शिमला पहाड़ियों में प्रचलित बहुपति प्रथा और स्थानीय रीति-रिवाजों का हवाला देते हुए जस्टिस राकेश कैंथला की मुख्य टिप्पणी, एक बहुपति परिवार (Polyandrous Family) में किसी भाई की मृत्यु होने पर उसके बेटे उसकी संपत्ति के तब तक वारिस नहीं बनते जब तक उसके अन्य (सह-विवाहित) भाई जीवित हैं। भाई ही भाई का उत्तराधिकारी बनता है, और केवल तभी जब सभी भाइयों की मृत्यु हो जाती है, उनके बच्चे संपत्ति के वारिस बनते हैं। चूंकि बहुपति परिवार में बच्चों को सभी भाइयों की संतान माना जाता है, इसलिए वे तब तक पिताविहीन नहीं हो सकते जब तक सभी भाइयों की मृत्यु न हो जाए।
मिताक्षरा कानून के बजाय स्थानीय प्रथागत कानून (Customary Law) लागू
कोर्ट ने माना कि चूंकि मृत्यु 1935 में हुई थी, इसलिए मामला हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 से संचालित नहीं होगा।
जहां सामान्य हिंदू कानून (मिताक्षरा प्रणाली) और स्थानीय प्रथा में विरोधाभास होता है, वहां स्थानीय प्रथागत कानून को प्राथमिकता दी जाती है।
बहुपति परिवार को एक “अभिन्न इकाई” (Solid Unit) माना जाता है, इसलिए इसमें पारंपरिक मिताक्षरा सहदायिकी (Coparcenary) का सिद्धांत लागू नहीं होता।
जीवित भाई के रहते बच्चों का दावा बेबुनियाद
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ताओं ने मिताक्षरा कानून का गलत आधार बनाकर मुकदमा दायर किया था। जीवित भाई (देवी शरण) के रहते मदन सिंह के बच्चों का संपत्ति विभाजन या अपने हिस्से पर दावा करना कानूनी रूप से निराधार था।
हाई कोर्ट का अंतिम आदेश
दूसरी अपील खारिज: हाई कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसलों को बरकरार रखते हुए बच्चों की अपील खारिज कर दी।
उत्परिवर्तन (Mutation) वैध: राजस्व अधिकारियों द्वारा जीवित भाई (देवी शरण) के पक्ष में दर्ज किए गए उत्परिवर्तन को प्रथागत कानून के अनुरूप और पूरी तरह वैध ठहराया।
केस मैट्रिक्स: HP High Court on Polyandrous Marriage Succession
| प्रक्रियात्मक और विधिक पहलू | विवरण / अदालत का फैसला |
| संबंधित अदालत | हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय (Himachal Pradesh High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस राकेश कैंथला (Justice Rakesh Kainthla) |
| लागू कानून | स्थानीय प्रथागत कानून (Customary Law) [1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम से पूर्व का मामला] |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या बहुपति विवाह में एक भाई की मृत्यु पर संपत्ति सीधे बच्चों को मिलेगी या जीवित भाई को? |
| अदालत का निर्णय | जीवित भाई को; सभी सह-विवाहित भाइयों की मृत्यु के बाद ही बच्चे संपत्ति के हकदार होंगे। |

