Tuesday, July 28, 2026
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Pan Masala Cess Act: अनुमानित क्षमता के आधार पर उपकर (Cess) लगाना असंवैधानिक…हेल्थ सिक्योरिटी से नेशनल सिक्योरिटी सेस एक्ट’ किया रद्द

केस मैट्रिक्स: Karnataka HC Judgment on Pan Masala Cess Act

प्रक्रियात्मक और विधिक पहलूविवरण / अदालत का फैसला
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस एम. नागप्रसन्ना (Justice M Nagaprasanna)
याचिकाकर्ता के वकीलवरिष्ठ अधिवक्ता जी. शिवदास (Senior Adv G Shivadass)
केंद्र सरकार के वकीलएडिशनल सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमन (ASG N Venkataraman)
संविधान का उल्लंघनअनुच्छेद 14 (समता का अधिकार / Right to Equality)
मुख्य विधिक सिद्धांतवास्तविक उत्पादन के बजाय मशीनों की काल्पनिक/अनुमानित क्षमता (Deemed Capacity) पर सेस लगाना मनमाना और असंवैधानिक है।

Pan Masala Cess Act: केंद्र सरकार द्वारा पान मसाला निर्माताओं पर ‘अनुमानित उत्पादन क्षमता’ (Assumed Production Capacity) के आधार पर सेस (उपकर) लगाने के कानून को कर्नाटक हाईकोर्ट ने असंवैधानिक ठहराते हुए रद्द कर दिया है।

पान मसाला निर्माताओं की याचिकाओं को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि केंद्र सरकार को उपकर या कर लगाने का पूर्ण अधिकार है, लेकिन जिस मनमाने तरीके से इस अधिनियम को लागू किया गया, वह कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत पर विफल साबित होता है। अदालत ने माना कि वास्तविक उत्पादन के बजाय मशीनों की अनुमानित क्षमता पर कर लगाना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार / Right to Equality) का स्पष्ट उल्लंघन है।

मामला क्या था?: वास्तविक उत्पादन बनाम मशीनों की क्षमता

  • विवादित कानून: केंद्र सरकार ने पान मसाला उद्योग में टैक्स चोरी रोकने और स्वास्थ्य सुरक्षा के नाम पर ‘हेल्थ सिक्योरिटी से नेशनल सिक्योरिटी सेस एक्ट’ (Health Security se National Security Cess Act) लागू किया था।
  • सेस लगाने का तरीका: इस कानून के तहत उपकर वास्तविक उत्पादित पान मसाला पाउच पर न लगाकर, उत्पादन में लगी मशीनों और उनकी अनुमानित उत्पादन क्षमता पर लगाया जा रहा था।
  • उद्योगपतियों (याचिकाकर्ताओं) का तर्क: याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जी. शिवदास ने तर्क दिया कि मशीनों की संख्या या अनुमानित उत्पादन (Deemed Production) पर सेस नहीं लगाया जा सकता। सेस केवल वास्तविक उत्पादन (Actual Production) पर ही लागू हो सकता है। अलग-अलग मशीनों की क्षमता अलग होती है, लेकिन सरकार सभी पर एक समान 500 पाउच प्रति मिनट की दर से सेस वसूल रही थी।
  • केंद्र सरकार का तर्क: केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एन. वेंकटरमन ने तर्क दिया कि पान मसाला क्षेत्र कर चोरी के लिए कुख्यात है और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। उच्च जीएसटी दरों के बावजूद राजस्व संग्रह क्षमता से काफी कम था, इसलिए क्षमता-आधारित (Capacity-based) सेस व्यवस्था बनाई गई थी।

कर्नाटक हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व्याख्याएं

अनुमानित उत्पादन पर कर लगाना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन

हाई कोर्ट ने कहा कि मशीनों की काल्पनिक उत्पादन क्षमता मानकर कर वसूलना पूरी तरह से अस्पष्ट, अनिश्चित और मनमाना है। जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की मुख्य टिप्पणी: “संघ सरकार की सेस लगाने के लिए कानून बनाने की शक्ति को बरकरार रखा जाता है। हालांकि, जिस तरीके से यह अधिनियम और नियम सेस लगाते हैं, वह अनुचित और अस्पष्ट है, क्योंकि यह वास्तविक उत्पादित मात्रा के बजाय ‘मान ली गई मात्रा’ पर आधारित है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के सिद्धांतों पर विफल रहता है और इस हद तक अधिनियम एवं नियम असंवैधानिक हैं।”

मशीन क्षमता का गलत आकलन

अदालत ने पाया कि कोई भी मशीन प्रति मिनट 500 पाउच का उत्पादन नहीं करती, फिर भी केंद्र सरकार यह मानकर सेस वसूल रही थी कि हर मशीन 500 पाउच प्रति मिनट ही बनाएगी। यह पूरी तरह से अतार्किक है।

15 दिन की छूट नियम पर कड़ा रुख (Rule 15a)

अधिनियम के नियम 15(a) के तहत केवल तभी सेस में छूट मिलती थी जब विनिर्माण कार्य लगातार 15 दिनों तक बंद रहे। कोर्ट ने इस पर टिप्पणी की।

  • मशीन की खराबी (Breakdown), कच्चे माल या श्रमिकों की कमी और रखरखाव (Maintenance) के कारण 15 दिन से कम समय के लिए काम रुक सकता है।
  • केंद्र का यह तर्क कि यह नियम कर चोरी रोकने के लिए बनाया गया है, खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा: “टैक्स चोरी रोकने में प्रशासनिक कठिनाइयां ऐसे मनमाने नियम तय करने का औचित्य नहीं बन सकतीं।”

हाई कोर्ट का अंतिम आदेश

  1. प्रावधान असंवैधानिक घोषित: हाई कोर्ट ने हेल्थ सिक्योरिटी सेस एक्ट और उसके तहत बने नियमों के क्षमता-आधारित सेस लगाने वाले प्रावधानों को अनुच्छेद 14 का उल्लंघन मानते हुए रद्द (Struck Down) कर दिया।
  2. कानून बनाने की शक्ति बरकरार: कोर्ट ने साफ किया कि संसद के पास उपकर या सरचार्ज लगाने का अधिकार है, लेकिन उसकी क्रियान्वयन प्रणाली संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर होनी चाहिए।

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