Friday, October 30, 2026
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POCSO Act: जब पीड़ित बच्चा बोलता है, ज्ञान तभी शुरू होता है…सबूत आने पर नहीं, POCSO एक्ट पर यह फैसला पढ़ें

POCSO Act: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) की धारा 19(1) के तहत किसी अपराध का “ज्ञान” (Knowledge) होने का मतलब केवल प्रत्यक्ष आंखें देखी घटना नहीं है।

8 वर्षीय बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म का मामला

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने अरुणाचल प्रदेश के एक बोर्डिंग स्कूल में 8 वर्षीय बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म के मामले में हेडमिस्ट्रेस (प्रधान अध्यापिका) को मिली बरी-मुक्ति (Discharge) को रद्द करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कहा, जब कोई पीड़ित बच्चा स्वयं अपने साथ हुई घटना की विश्वसनीय जानकारी देता है, तो उसी क्षण से जिम्मेदार व्यक्ति को अपराध का कानूनी ‘ज्ञान’ मान लिया जाएगा।

मामला क्या था?: 2019 का बोर्डिंग स्कूल केस और प्रशासनिक लीपापोती

घटना: नवंबर 2019 में अरुणाचल प्रदेश के एक बोर्डिंग स्कूल में कक्षा 8 के छात्र ने 8 वर्षीय छात्रा के साथ कथित तौर पर दुष्कर्म किया।

हेडमिस्ट्रेस की भूमिका: पीड़िता ने अपनी बहन, सहेली और हेड गर्ल को बताया, जिन्होंने हेडमिस्ट्रेस को सूचित किया। हेडमिस्ट्रेस ने बच्ची के गुप्त अंगों की जांच की (जहां सूजन और लालिमा थी), लेकिन पुलिस या परिजनों को सूचित करने के बजाय बच्ची को चुप रहने की हिदायत दी।

आंतरिक कमेटी का नाटक: स्कूल ने शिक्षकों की एक आंतरिक कमेटी बनाई, बच्चों के व्यवहार का अवलोकन किया और यह निष्कर्ष निकालकर मामला दबा दिया कि “कुछ नहीं हुआ था।” मामला मार्च 2020 में तब सामने आया जब मां ने बेटियों की बातचीत सुन ली।

निचली अदालत और हाई कोर्ट का रुख: ट्रायल कोर्ट और गुवाहाटी हाई कोर्ट (ईटानगर बेंच) ने हेडमिस्ट्रेस और अन्य शिक्षकों को यह कहते हुए डिस्चार्ज (बरी) कर दिया था कि किसी ने खुद अपराध होते नहीं देखा था और मेडिकल रिपोर्ट में कोई बाहरी चोट नहीं मिली थी, इसलिए उनके पास “ज्ञान” होने का आधार नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य कानूनी अवलोकन

यौन अपराध बंद कमरों में होते हैं, सार्वजनिक रूप से नहीं

गुवाहाटी हाई कोर्ट के तर्क को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पॉक्सो एक्ट की धारा 19(1) के तहत सूचना न देने के अपराध को केवल “प्रत्यक्षदर्शी” होने तक सीमित नहीं किया जा सकता।

अदालत की मुख्य टिप्पणी: “यह एक सामान्य समझ की बात है कि यौन अपराध शायद ही कभी जनता की नज़र के सामने प्रतिबद्ध होते हैं। ये अपराध आमतौर पर गोपनीयता के दायरे में होते हैं।”

अपनी जांच बैठाकर पुलिस को सूचना देने से नहीं बच सकते

अदालत ने कहा कि जब किसी बच्चे द्वारा अपराध की रिपोर्ट किसी व्यक्ति को दी जाती है, तो उसे कानूनी रूप से अपराध का ‘ज्ञान’ मान लिया जाता है। कोई भी स्कूल प्रशासन या व्यक्ति अपनी खुद की आंतरिक जांच बैठाकर पुलिस को रिपोर्ट करने के अपने वैधानिक कर्तव्य (Statutory Duty) का स्थान नहीं ले सकता।

किसे दोषी माना गया और किसे छूट मिली?

हेडमिस्ट्रेस: चूंकि पीड़ित बच्चे की जानकारी सीधे हेडमिस्ट्रेस तक पहुंची थी, इसलिए उनके खिलाफ डिस्चार्ज ऑर्डर को रद्द कर दिया गया। अब उन पर पॉक्सो एक्ट की धारा 19(1)/21 और IPC की धारा 176 (सूचना न देना) के तहत मुकदमा चलेगा।

नाबालिग छात्राएं: पीड़िता की बहन, सहेली और हेड गर्ल (जिन्हें बात पता थी) नाबालिग थीं, इसलिए पॉक्सो एक्ट की धारा 21(3) के तहत उन्हें आपराधिक कार्यवाही से छूट प्राप्त है।

अन्य शिक्षक/प्रिंसिपल: चूंकि पीड़िता ने अन्य शिक्षकों से सीधे शिकायत नहीं की थी और केवल आंतरिक बैठक में शामिल होने के आधार पर साजिश साबित नहीं होती, इसलिए उनकी डिस्चार्ज को बरकरार रखा गया।

अंतिम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने हेडमिस्ट्रेस के खिलाफ POCSO Act की धारा 21 r/w 19(1) और IPC की धारा 176 के तहत आरोप तय करने के निर्देश दिए हैं और ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार मुकदमा आगे बढ़ाने को कहा है।

केस मैट्रिक्स: Supreme Court Judgment (POCSO Section 19)

प्रक्रियात्मक पहलूविवरण / अदालत का निर्णय
संबंधित अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय पीठजस्टिस मनोज मिश्रा एवं जस्टिस के.वी. विश्वनाथन
संबंधित कानूनपॉक्सो अधिनियम, 2012 (धारा 19, 21) एवं IPC (धारा 176)
मुख्य कानूनी सिद्धांतबच्चे द्वारा दी गई विश्वसनीय जानकारी ही धारा 19(1) के तहत ‘ज्ञान’ (Knowledge) है; अपनी जांच से पुलिस रिपोर्ट का कर्तव्य खत्म नहीं होता।
अदालत का फैसलाहेडमिस्ट्रेस का डिस्चार्ज रद्द (Discharge Set Aside); ट्रायल कोर्ट को मुकदमा चलाने का निर्देश।
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