केस मैट्रिक्स: Orissa High Court Ruling on Victim’s Character & POCSO Act
| पहलू | विवरण |
| संबंधित अदालत | उड़ीसा उच्च न्यायालय (Orissa High Court, Cuttack) |
| माननीय पीठ | डॉ. जस्टिस संजीव कुमार पाणिग्रही (Single Bench) |
| संबंधित कानून | IPC (धारा 363, 366, 376-D), POCSO Act (धारा 6, 10), साक्ष्य अधिनियम (धारा 53A, 146) |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या मेडिकल रिपोर्ट में “Habituated to Intercourse” का उल्लेख बलात्कार के आरोप को खारिज कर सकता है? |
| अदालत का फैसला | बिल्कुल नहीं। पीड़िता का पिछला यौन इतिहास सहमति या चरित्र का प्रमाण नहीं बन सकता। |
| अंतिम निर्णय | गैंगरेप व पॉक्सो में दोषसिद्धि और 20 साल की सजा बरकरार; अपील आंशिक रूप से स्वीकार। |
Victim’s Character: दुष्कर्म और यौन अपराधों के मुकदमों में पीड़िता पर छींटाकशी (Victim-Blaming) करने और उसके अतीत के चरित्र पर सवाल उठाने की वकीलों की प्रवृत्ति पर उड़ीसा हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है।
नाबालिग पीड़िता के साथ सामूहिक दुष्कर्म व अपहरण के दोषी की सजा बरकरार
हाईकोर्ट के जस्टिस डॉ संजीव कुमार पाणिग्रही की एकल पीठ ने नाबालिग पीड़िता के साथ सामूहिक दुष्कर्म (Gang Rape) और अपहरण के दोषियों की अपील पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की और उनकी सजा को बरकरार रखा। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी पीड़िता का पूर्व यौन इतिहास (Past Sexual History) न तो आरोपी के बचाव का आधार बन सकता है और न ही इससे उसकी गवाही की विश्वसनीयता कम होती है।
मामला क्या था?: 16 वर्षीय नाबालिग का अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म
घटना: 3 अप्रैल 2016 की रात, जब पीड़िता (16 वर्ष) के माता-पिता गांव से बाहर थे, आरोपी उसके घर पहुंचे। उन्होंने मुंह दबाकर और घसीटकर उसे पास की पहाड़ी पर ले जाकर बंधक बना लिया।
अमानवीय व्यवहार: पीड़िता को 3 अप्रैल से 5 अप्रैल 2016 की सुबह तक बंधक बनाकर रखा गया, जहां आरोपियों ने उसे खाना नहीं दिया, बांधकर रखा और उसके साथ बार-बार सामूहिक बलात्कार किया। इसके बाद वे उसे घर के पास छोड़कर भाग गए।
विशेष अदालत का फैसला: पॉक्सो एक्ट (POCSO) की विशेष अदालत ने आरोपियों को धारा 363 (अपहरण), 366, 376-D (सामूहिक दुष्कर्म) और POCSO एक्ट की धारा 6 व 10 के तहत दोषी ठहराते हुए 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
उड़ीसा हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व्याख्याएं
“पीड़िता आरोपी नहीं है जो उसके चरित्र का ट्रायल हो”
बचाव पक्ष के वकीलों ने मेडिकल रिपोर्ट में लिखे वाक्य “Habituated to Sexual Intercourse” (यौन संबंध की आदत/अनुभव होना) का हवाला देकर तर्क दिया कि पीड़िता पहले से यौन संबंधों से परिचित थी और स्वेच्छा से गई थी। इस पर कोर्ट ने बेहद कड़ा ऐतराज जताया। उड़ीसा हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणी, “यह समझ पाना कठिन है कि स्थापित विधिक सिद्धांतों के बावजूद ऐसी दलील कैसे दी जा सकती है? यौन संबंध की अभ्यस्त’ होने से क्या अपराध झूठा साबित हो जाता है? क्या इससे सहमति सिद्ध हो जाती है? या क्या इससे नाबालिग पीड़िता की गवाही कम विश्वसनीय हो जाती है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ है। आरोपियों पर उनके कृत्य का मुकदमा चल रहा है, पीड़िता के चरित्र का नहीं। अदालत नाबालिग पीड़िता की नैतिक जांच (Moral Scrutiny) करने की ऐसी हताश कोशिशों को कभी स्वीकार नहीं कर सकती।
साक्ष्य अधिनियम धारा 53A और 146 का प्रावधान
अदालत ने याद दिलाया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 53A और धारा 146 का परंतुक (Proviso) बलात्कार के मुकदमों में पीड़िता के पूर्व यौन इतिहास या चरित्र के आधार पर सहमति या विश्वसनीयता का अनुमान लगाने पर पूरी तरह से रोक लगाता है। इसके अलावा, चूंकि पीड़िता 16 साल की नाबालिग थी, इसलिए पॉक्सो एक्ट की धारा 3 व 5 के तहत सहमति (Consent) का सवाल कानूनी रूप से पूरी तरह अप्रासंगिक (Immaterial) हो जाता है।
सामूहिक दुष्कर्म (IPC 376-D) में व्यक्तिगत पेनिट्रेशन साबित करना जरूरी नहीं
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (Ashok Kumar v. State of Haryana) का हवाला देते हुए दोहराया कि सामूहिक दुष्कर्म (Gang Rape) के मामलों में यह साबित करना आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक आरोपी ने अलग-अलग पेनिट्रेटिव यौन हमला किया। यदि दो या अधिक व्यक्ति समान इरादे (Common Intention) से कृत्य करते हैं, तो प्रत्येक आरोपी मुख्य कृत्य के लिए समान रूप से जिम्मेदार होता है।
धारा 376(2)(n) (बार-बार रेप) से आंशिक बरी
कोर्ट ने माना कि हालांकि बंधक बनाए जाने के दौरान सामूहिक दुष्कर्म साबित हुआ, लेकिन पीड़िता के सामान्य बयान से यह स्पष्ट समय/क्रम नहीं निकल सका कि प्रत्येक आरोपी ने अलग-अलग कितनी बार कृत्य किया। इसलिए धारा 376(2)(n) के तहत उन्हें तकनीकी रूप से बरी किया गया, लेकिन गैंगरेप (376-D), अपहरण (363, 366) और पॉक्सो (POCSO) की मुख्य धाराओं में 20 साल की न्यूनतम सजा को बरकरार रखा गया।
हाई कोर्ट का अंतिम निर्णय
- सजा बरकरार: आरोपियों की मुख्य सजा (20 साल का कठोर कारावास और जुर्माना) को गैंगरेप और पॉक्सो एक्ट की गंभीर धाराओं के तहत यथावत रखा गया।
- पीड़िता पर छींटाकशी खारिज: कोर्ट ने बचाव पक्ष द्वारा पीड़िता के चरित्र पर उठाए गए सभी तर्कों को पूरी तरह खारिज करते हुए उनके रवैये की कड़ी निंदा की।

