कर्नाटक हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियां
- हिरासत में पूछताछ जरूरी: अदालत ने कहा:“आरोप यह है कि जज को देने के लिए रिश्वत ली गई थी। मामला जो भी हो, कस्टोडियल पूछताछ जरूरी है। अग्रिम जमानत देने का कोई सवाल ही नहीं उठता।”
- संस्था की साख पर हमला: न्यायमूर्ति श्रीशानंद ने गलियारों में जज के नाम पर पैसे मांगे जाने पर कड़ी चिंता व्यक्त की:“वरंडा में खड़े होकर ‘जज को पैसे दूंगा’ कहकर पैसे मांगना अभूतपूर्व है… इसके पीछे कौन है? जज, संस्था और वकीलों का नाम क्यों बदनाम किया जा रहा है? इसे सही समय पर रोकना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।”
- समानता (Parity) के आधार पर अग्रिम जमानत नहीं: याचिकाकर्ता के वकील (वरिष्ठ अधिवक्ता हसमथ पाशा) ने तर्क दिया कि अन्य सह-आरोपियों को जमानत मिल चुकी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के गंभीर मामले में समानता (Parity) के आधार पर अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती।
बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट जज को रिश्वत देकर हत्या के आरोपी को जमानत दिलाने का झूठा झांसा देने और पैसे ऐंठने की आरोपी महिला वकील को अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) देने से स्पष्ट इनकार कर दिया है।
न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद की एकल पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोपी वकील के पास अग्रिम जमानत का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता पहले जांच एजेंसी या सक्षम अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण (Surrender) करे और उसके बाद नियमित जमानत (Regular Bail) के लिए आवेदन करे। वकील द्वारा निर्देश लेने के लिए समय मांगे जाने पर अदालत ने मामले की सुनवाई गुरुवार (10 सितंबर 2026) तक के लिए स्थगित कर दी। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि न्यायपालिका की शुचिता से जुड़े इस रैकेट की तह तक जाने के लिए आरोपी की पुलिस हिरासत में पूछताछ (Custodial Interrogation) अनिवार्य है [दयीना बानू बनाम कर्नाटक राज्य]।
उच्च न्यायालय की सख्त और गंभीर मौखिक टिप्पणियां
1. जज के नाम पर दलाली और संस्थागत साख पर हमला न्यायपालिका के नाम के दुरुपयोग पर गहरा क्षोभ व्यक्त करते हुए न्यायमूर्ति श्रीशानंद ने कहा: “अदालत के गलियारों (Corridors) में खड़े होकर यह कहना कि ‘मैं जज को पैसे देकर जमानत करा दूंगा’, बिल्कुल अनसुना और स्तब्ध करने वाला है। इस पूरे रैकेट के पीछे कौन है? न्यायपालिका, न्यायाधीशों और पूरी लीगल फ्रेटरनिटी के नाम को क्यों बदनाम और नष्ट किया जा रहा है? संस्था पर लगे इस काले धब्बे को सही समय पर साफ करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।”
2. बेंच-हंटिंग और असामाजिक तत्वों से सांठगांठ अदालत ने रोस्टर और केस लिस्टिंग के चलन पर चिंता जताते हुए कहा: “पहले जब कोई पक्षकार किसी जज से निकटता का दावा करता था, तो जज स्वयं उस केस की सुनवाई से हट जाते थे (Not before me)। आजकल स्थिति यह है कि पक्षकार तय करते हैं कि उनका केस अमुक जज के पास नहीं जाना चाहिए। इसका क्या मतलब है? क्या असामाजिक तत्वों से कोई साठगांठ है? मैंने अपने स्टाफ को सख्त निर्देश दे रखे हैं कि किसी भी केस को आउट-ऑफ-टर्न प्राथमिकता न मिले।”
3. समानता (Parity) के आधार पर अग्रिम जमानत नहीं याचिकाकर्ता के इस तर्क पर कि अन्य सह-आरोपियों को जमानत मिल चुकी है, कोर्ट ने स्पष्ट किया: “कानूनी प्रक्रिया का सामना कीजिए और उसके बाद नियमित जमानत मांगिए। आप समानता के आधार पर नियमित जमानत की हकदार हो सकती हैं, लेकिन इस गंभीर आरोप में समानता के आधार पर अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती।”
मामले की पृष्ठभूमि (2021 से 2026 तक का घटनाक्रम)
- हत्या के आरोपी बेटे की जमानत का सौदा: शिकायतकर्ता महिला (थेरेसा) के बेटे वी. विष्णु देवन को वर्ष 2021 में एक हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया था।
- रिश्वत की मांग और चेक बाउंस:
- थेरेसा का संपर्क मरीना फर्नांडीस नामक महिला से हुआ, जिसने बेटे की जमानत कराने के नाम पर ₹10 लाख की मांग की। जमानत न मिलने पर जब पैसे वापस मांगे गए, तो दिए गए चेक बाउंस हो गए।
- इसके बाद थेरेसा को आरती नामक महिला से मिलवाया गया, जिसने खुद को हाईकोर्ट जज की करीबी बताया और कथित तौर पर जज को देने के नाम पर ₹1.72 लाख की मांग की।
- वकील की भूमिका: इसके बाद अधिवक्ता दयीना बानू इस मामले में शामिल हुईं और उन्होंने कथित तौर पर थेरेसा से कहा कि जज से जमानत का आदेश कराने के लिए भारी-भरकम रकम का भुगतान करना होगा।
- हाईकोर्ट रजिस्ट्रार के माध्यम से एफआईआर: पीड़िता ने 18 दिसंबर 2024 को कर्नाटक हाईकोर्ट को पत्र लिखकर पूरी घटना की शिकायत की। हाईकोर्ट रजिस्ट्रार के निर्देश पर संज्ञान लेते हुए पुलिस ने औपचारिक एफआईआर दर्ज की।
- केस रद्द करने की अर्जी खारिज: इससे पहले दयीना बानू ने एफआईआर रद्द (Quash) कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे 6 अगस्त को आरोपों की गंभीरता को देखते हुए खारिज कर दिया गया था।
अदालत का रुख और विधिक स्थिति
- सरेंडर का सुझाव: पीठ ने टिप्पणी की कि यदि आरोपी वकील सरेंडर करती है, तो एक दिन में कस्टोडियल पूछताछ पूरी कर उसे नियमित जमानत के लिए सक्षम अदालत के समक्ष पेश किया जा सकता है।
- अगली सुनवाई: याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील द्वारा मुवक्किल से निर्देश लेने के अनुरोध पर अदालत ने सुनवाई 10 सितंबर 2026 तक टाल दी।
विधिक प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ता (अधिवक्ता दयीना बानू) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता हसमत पाशा।
- कर्नाटक राज्य की ओर से: राज्य अभियोजन पक्ष।
- पीठ: न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद।
Cash For Bail: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति वी श्रीशानंद (Justice V Srishananda) |
| याचिकाकर्ता | अधिवक्ता दयीना बानू (Dayeena Banu) |
| आरोप | हाईकोर्ट जज के नाम पर जमानत दिलाने के लिए रिश्वत की मांग करना |
| कोर्ट का निर्देश | आत्मसमर्पण (Surrender) करें और फिर नियमित जमानत (Regular Bail) की अर्जी दें। |

