Wednesday, October 28, 2026
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Lifelong Pension: क्या यूपी के पूर्व विधायकों-विधान पार्षदों को आजीवन पेंशन और भत्ते देना संवैधानिक है?; पेंशन व्यवस्था पर सुप्रीम नोटिस, पढ़ें केस

कानूनी तर्क

  1. इलाहाबाद हाईकोर्ट का मई 2026 का फैसला:इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने 13 मई 2026 को लोक प्रहरी की जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने माना था कि संविधान का अनुच्छेद 195 और सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 38 (Entry 38) राज्य विधानमंडल को अपने पूर्व सदस्यों के लिए सामाजिक सुरक्षा और पेंशन से संबंधित कानून बनाने की पर्याप्त विधायी शक्ति देती है।
  2. याचिकाकर्ता (लोक प्रहरी) की मुख्य दलीलें:
    • अनुच्छेद 195 में पेंशन का उल्लेख नहीं: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि संविधान का अनुच्छेद 195 केवल मौजूदा सदस्यों (Sitting Members) के वेतन और भत्तों की बात करता है, इसमें “पेंशन” या पूर्व सदस्यों का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
    • संवैधानिक मंजूरी का अभाव: जब कोई व्यक्ति विधायक नहीं रहता, तो उसे लगातार वित्तीय लाभ देना और सरकारी खजाने से पेंशन व मुफ्त यात्रा/चिकित्सा सुविधाएं देना असंवैधानिक और मनमाना है।
    • भत्तों में अत्यधिक वृद्धि: याचिका में बताया गया कि 1952 में जहां विधायकों का वेतन ₹200 प्रति माह था, वहीं अब यह बढ़कर नकद और अन्य सुविधाओं में ₹1,25,000 प्रति माह से अधिक हो चुका है।
  3. हाईकोर्ट का रुख जिसे चुनौती दी गई है:हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि विधायकों को एक अलग श्रेणी माना जा सकता है क्योंकि वे संवैधानिक दायित्व निभाते हैं। कोर्ट ने कहा था कि पेंशन देना एक विधायी नीति का मामला है और इसमें कोई स्पष्ट मनमानापन (Manifest Arbitrariness) नहीं है।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पूर्व विधायकों (MLAs) और पूर्व विधान परिषद सदस्यों (MLCs) को आजीवन पेंशन, पारिवारिक पेंशन, यात्रा व मुफ्त चिकित्सा सहित अन्य सेवानिवृत्ति लाभ प्रदान करने वाले 1980 के राज्य कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है [लोक प्रहरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य]।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने गैर-सरकारी संगठन (NGO) ‘लोक प्रहरी’ द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया, जिसका जवाब चार सप्ताह के भीतर दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले (13 मई 2026) के खिलाफ अपील

यह याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 13 मई 2026 के उस निर्णय के खिलाफ दायर की गई है, जिसमें हाईकोर्ट ने ‘उत्तर प्रदेश राज्य विधान-मंडल (सदस्यों की उपलब्धियां और पेंशन) अधिनियम, 1980′ [UP State Legislature (Members’ Emoluments and Pension) Act, 1980] की विभिन्न धाराओं और अध्याय VIII की वैधता को बरकरार रखते हुए जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी थी:

  • चुनौती के दायरे में आए प्रावधान: अधिनियम की धारा 4, 5, 9, 13(3), 13(4), 15(2), 17-A और अध्याय VIII (जो पूर्व सदस्यों के लिए पेंशन, पारिवारिक पेंशन, रेल/हवाई यात्रा, मुफ्त चिकित्सा सुविधाएं और उनके आश्रितों/सहयोगियों को सुविधाएं प्रदान करता है)।

याचिकाकर्ता (लोक प्रहरी) के मुख्य संवैधानिक तर्क

  1. अनुच्छेद 195 का दायरा केवल वर्तमान सदस्यों तक सीमित:
    • संविधान के अनुच्छेद 195 (राज्य सूची की प्रविष्टि 38 के साथ पठित) के तहत राज्य विधानमंडल को केवल अपने ‘सदस्यों’ (Members) के वेतन और भत्तों पर कानून बनाने का अधिकार है।
    • याचिकाकर्ता का तर्क है कि अनुच्छेद 195 में ‘पेंशन’ शब्द का कोई उल्लेख नहीं है और ‘सदस्य’ का अर्थ केवल मौजूदा/सिटिंग सदस्यों से है, न कि पूर्व सदस्यों (Ex-MLAs/MLCs) से।
  2. कार्यकाल समाप्ति के बाद वित्तीय लाभ मनमाना और असंवैधानिक:
    • जैसे ही कोई व्यक्ति विधायक या एमएलसी पद से हटता है, वह एक सामान्य नागरिक बन जाता है। कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी आजीवन वित्तीय लाभ और विशेष सुविधाएं देना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन और मनमाना है।
  3. करदाताओं के पैसे का भारी बोझ:
    • याचिका में रेखांकित किया गया कि 1952 में जहां विधायकों का वेतन सीमित भत्तों के साथ ₹200 था, वहीं आज यह नकद और सुविधाओं के रूप में ₹1.25 लाख प्रति माह से अधिक हो चुका है, जिसके बाद आजीवन पेंशन का अतिरिक्त बोझ जनता के खजाने पर पड़ता है।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का क्या निष्कर्ष था?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जनहित याचिका खारिज करते हुए निम्नलिखित विधिक व्यवस्था दी थी:

  • सामाजिक सुरक्षा कानून बनाने का विधायी अधिकार: संविधान का अनुच्छेद 195 और 7वीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 38 राज्य विधानमंडल को पूर्व सदस्यों के लिए पेंशन और सामाजिक सुरक्षा के उपाय लागू करने का पर्याप्त अधिकार देती है।
  • जनप्रतिनिधि एक विशिष्ट वर्ग (Distinct Class): जनप्रतिनिधि कानून निर्माण, जनता के प्रतिनिधित्व और शासन की निगरानी जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक कार्य करते हैं, इसलिए वे एक अलग वर्ग हैं और उनकी तुलना सामान्य सरकारी कर्मचारियों से नहीं की जा सकती।
  • नीतिगत निर्णय: सेवानिवृत्ति के बाद लाभ देना विधायिका का नीतिगत मामला (Legislative Policy) है और अदालतें “दूसरे विधानमंडल” (Second Legislature) के रूप में विधायी निर्णयों को रद्द नहीं कर सकतीं।

सुप्रीम कोर्ट का रुख

सुप्रीम कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण संवैधानिक और विधायी प्रश्न पर राज्य सरकार से विस्तृत पक्ष मांगा है ताकि यह तय किया जा सके कि क्या राज्य विधानमंडल के पास पूर्व सदस्यों को आजीवन पेंशन व भत्ते देने की विधायी सक्षमता (Legislative Competence) है या यह संवैधानिक सीमाओं से बाहर है।

विधिक विवरण

  • केस शीर्षक: लोक प्रहरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
  • पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता
  • नोटिस की अवधि: 4 सप्ताह में जवाब तलब

Lifelong Pension:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठासीन पीठन्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता
याचिकाकर्ताएनजीओ ‘लोक प्रहरी’ (Lok Prahari)
चुनौती दिया गया कानूनउत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के वेतन-भत्ते और पेंशन) अधिनियम, 1980
मुख्य मुद्दाक्या राज्य विधानमंडल के पास पूर्व विधायकों/पार्षदों को आजीवन पेंशन और भत्ते देने का संवैधानिक अधिकार है?
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