Thursday, October 29, 2026
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Age of Consent: यदि महिला सहमति की कानूनी उम्र पूरी कर चुकी हो…तो क्या ऐसे में केस दुष्कर्म (Sec 376 IPC) के दायरे में आएगा, जानिए

केस मैट्रिक्स: Delhi High Court Ruling on & Sec 376 IPC

पहलूविवरण
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
माननीय पीठजस्टिस विमल कुमार यादव (Single Bench)
अपीलकर्तादिलदार (Dildar)
अपीलकर्ता के वकीलअधिवक्ता रजत मिश्रा एवं हिमांशु यादव
संबंधित धाराएंIPC धारा 376 (बलात्कार) एवं धारा 457 (रात्रि गृह-अतिचार)
मुख्य विधिक बिंदु2013 के संशोधन से पूर्व IPC धारा 375 के तहत 16 वर्ष से अधिक आयु की महिला द्वारा दी गई सहमति कानूनी रूप से मान्य थी।

Age of Consent: दिल्ली हाईकोर्ट ने दुष्कर्म और गैर-कानूनी तरीके से घर में घुसने (House Trespass) के मामले में निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को सभी आरोपों से बरी कर दिया है।

साल 2012 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के नंद नगरी पुलिस स्टेशन में दर्ज है केस

हाईकोर्ट के जस्टिस विमल कुमार यादव ने आरोपी दिलदार (Dildar) की अपील को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के सजा के आदेश को रद्द कर दिया। यह मामला साल 2012 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के नंद नगरी पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर से संबंधित है। हाई कोर्ट ने माना कि घटना के समय पीड़िता कानूनन सहमति देने की उम्र (Age of Consent) पार कर चुकी थी और दोनों के बीच शारीरिक संबंध सहमति से बने थे।

मामला क्या था?: रात में घर में प्रवेश और रात शेल्टर में प्रवास

घटना: 1 और 2 सितंबर 2012 की दरम्यानी रात पीड़िता की मां ने अपने घर के भीतर एक अजनबी को देखा। मां के टोकने पर वह व्यक्ति वहां से भाग गया, लेकिन अजीब बात यह रही कि पीड़िता (बेटी) भी उसके पीछे-पीछे चली गई।

फरार होने के बाद की स्थिति: इसके बाद आरोपी और पीड़िता विभिन्न स्थानों पर रहे जिनमें रेन रैन बसेरा (Night Shelter), जंगल और संभवतः आरोपी के भाई का घर शामिल था—जब तक कि पुलिस ने उन्हें ढूंढ नहीं निकाला।

ट्रायल कोर्ट का फैसला: निचली अदालत ने आरोपी को IPC की धारा 376 (बलात्कार) के तहत 7 साल और धारा 457 (रात में घर में घुसना) के तहत 4 साल की साधारण कैद की सजा सुनाई थी।

दिल्ली हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व्याख्याएं

घटना के समय पीड़िता की आयु (Age of Consent)

अपीलकर्ता के वकीलों (अधिवक्ता रजत मिश्रा और हिमांशु यादव) ने दलील दी कि 2013 के संशोधन से पहले (प्री-अमेंडमेंट IPC) सहमति से यौन संबंध बनाने की कानूनी उम्र 16 वर्ष थी।

आयु से जुड़े साक्ष्य: पीड़िता के शैक्षणिक और मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार उसकी जन्मतिथि 27 अगस्त 1996 दर्ज थी।

गणना: चूंकि घटना 2 सितंबर 2012 को हुई थी, इसलिए उस समय पीड़िता की उम्र 16 साल और 6 दिन थी। इस प्रकार, वह कानूनी रूप से सहमति देने के लिए पूरी तरह सक्षम (Legally Competent) थी।

परिस्थितियों और व्यवहार का विश्लेषण

अदालत ने घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए कहा, रात के अंधेरे में किसी अजनबी की मौजूदगी से घबराकर शोर मचाना स्वाभाविक था। हालांकि, जांच में सामने आया कि वह अजनबी भले ही मकान मालकिन (मां) के लिए अनजान था, लेकिन उसकी बेटी (पीड़िता) के लिए अजनबी नहीं था। मां द्वारा देखे जाने पर अजनबी भागा, लेकिन अजीब बात यह थी कि बेटी भी उसके पीछे-पीछे निकल गई और बाद में उसके साथ कई जगहों पर रही।”

संदेह से परे सबूत का अभाव

हाई कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को ‘संदेह से परे’ (Beyond Reasonable Doubt) साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। साक्ष्यों से यह स्पष्ट था कि पीड़िता अपनी मर्जी से गई थी और संबंध परस्पर सहमति से बने थे।

हाई कोर्ट का अंतिम निर्णय

सजा रद्द व बरी: दिल्ली हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए अपीलकर्ता (दिलदार) को धारा 376 और 457 IPC के सभी आरोपों से मुक्त एवं बरी कर दिया।

सहमति की पुष्टि: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सहमति से बना संबंध (यदि महिला सहमति की कानूनी उम्र पूरी कर चुकी हो) बलात्कार के दायरे में नहीं आता।

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