Friday, October 30, 2026
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Commercial Dispute: जस्टिस उज्ज्वल भूयां की दो टूक…अदालतों के अस्थिर फैसले और वित्त मंत्रालय की नीतियां मध्यस्थता के लिए बड़ा झटका

Commercial Dispute: देश में वाणिज्यिक विवादों के निपटारे की दिशा में चल रहे सुधारों पर एक बेहद बेबाक और कड़ा विद्रोही रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भूयां ने न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों को कटघरे में खड़ा किया।

हालिया घटनाक्रमों ने निवेशकों के भरोसे को बुरी तरह डिगा दिया है

जस्टिस ने अपने संबोधन में कहा, अदालतों के ‘अस्थिर फैसले’ (Erratic Verdicts) और केंद्रीय वित्त मंत्रालय की ‘प्रतिगामी नीतियां’ (Regressive Policies) भारत को एक ग्लोबल आर्बिट्रेशन हब (वैश्विक मध्यस्थता केंद्र) बनाने की महत्वाकांक्षा को गंभीर चोट पहुंचा रही हैं। सरकार की हालिया नीतियां और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संस्थागत मध्यस्थता को बढ़ावा देने के विजन के बीच कोई तालमेल नजर नहीं आता। वह द लॉ फोरम द्वारा आयोजित भारत में मध्यस्थता: सुधार, प्रासंगिकता और आगे की राह” विषय पर मुख्य भाषण देते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि हालिया घटनाक्रमों ने निवेशकों के भरोसे को बुरी तरह डिगा दिया है।

DMRC बनाम DAMEPL फैसला: मध्यस्थता के इतिहास में सबसे बड़ा नुकसान

जस्टिस उज्ज्वल भूयां ने किसी और मुद्दे के बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट के ही अप्रैल 2024 के क्यूरेटिव जजमेंट (Delhi Metro Rail Corporation vs DAMEPL) की तीखी आलोचना की। उन्होंने इसे “भारत में मध्यस्थता व्यवस्था को पहुँचाया गया सबसे व्यापक नुकसान” करार दिया।

पांचवें दौर की समीक्षा: उन्होंने कहा कि एक हाई-वैल्यू आर्बिट्रल अवार्ड (मध्यस्थता फैसले) ने जब आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल, हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट (अनुच्छेद 136) और रिव्यू पिटिशन की बाधाओं को पार कर लिया था, तब अदालत ने अपनी असाधारण क्यूरेटिव क्षेत्राधिकार (Curative Jurisdiction) का इस्तेमाल कर इसे पांचवें दौर की स्क्रूटनी के लिए फिर से खोल दिया।

कथनी और करनी में अंतर: जस्टिस भूयां ने रेखांकित किया कि भले ही उस फैसले में बेंच ने यह हिदायत दी थी कि अदालतों को मध्यस्थता फैसलों में हस्तक्षेप के अतिरिक्त चरण नहीं बनाने चाहिए, लेकिन “उस पीठ ने खुद ठीक इसके विपरीत काम किया।”

मामले का बैकग्राउंड: अप्रैल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेश को पलटते हुए DMRC को ₹8,000 करोड़ (ब्याज सहित) DAMEPL को भुगतान करने के फैसले को रद्द कर दिया था, यह कहते हुए कि ट्रिब्यूनल ने महत्वपूर्ण सबूतों को नजरअंदाज किया था। लेकिन जस्टिस भूयां का मानना है कि इस अदालती हस्तक्षेप ने वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को नुकसान पहुँचाया है।

वित्त मंत्रालय का मेमोरेंडम: पीएम के विजन पर पानी फेरा

अदालती फैसले के बाद केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा 3 जून 2024 को जारी एक ऑफिस मेमोरेंडम (कार्यालय ज्ञापन) को जस्टिस भूयान ने सबसे विवादित और आत्मघाती कदम बताया।

नीति में अचानक यू-टर्न: वित्त मंत्रालय ने मध्यस्थता के “असंतोषजनक अनुभव” का हवाला देते हुए सरकारी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) को सलाह दी थी कि ₹10 करोड़ से अधिक के विवादों वाले अनुबंधों में आर्बिट्रेशन क्लॉज (मध्यस्थता की शर्त) शामिल न करें, बल्कि इसकी जगह मध्यस्थता (Mediation) को प्राथमिकता दें।

पीएम मोदी के बयान का विरोधाभास: जस्टिस भूयां ने साल 2016 के उस नेशनल कांफ्रेंस को याद किया जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को ‘ग्लोबल आर्बिट्रेशन हब’ बनाने को सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बताया था।

अधिकारियों पर तंज: उन्होंने दो टूक कहा, प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण और विदेश मंत्री की घोषणाओं को पूरी तरह से नकारते हुए, वित्त मंत्रालय ने ये दिशा-निर्देश जारी कर दिए। यह तीखा, अचानक और विवादास्पद नीतिगत बदलाव सरकार की अपनी घोषित नीति के असंगत है।

वर्षों के विधायी सुधारों पर पानी फिरने का खतरा

इस गरिमामयी कार्यक्रम में दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस सी. हरि शंकर और हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजीव शकधर भी मंच पर मौजूद थे। इस दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अमित गुप्ता द्वारा संचालित सत्र में जस्टिस भूयान ने एक व्यापक विधिक चेतावनी दी।

निवेशकों का घटता भरोसा: जब अदालती फैसले अनिश्चित हों और सरकार की नीतियां पीछे ले जाने वाली (Regressive) हों, तो विदेशी और घरेलू निवेशक देश की विवाद निपटान प्रणाली पर भरोसा खो देते हैं।

सुधारों पर ब्रेक: भारत को ‘आर्बिट्रेशन-फ्रेंडली’ (मध्यस्थता के अनुकूल) क्षेत्राधिकार बनाने के लिए पिछले कई सालों में संसद द्वारा किए गए कानूनी संशोधनों और सुधारों पर इन दोनों कदमों से पानी फिरने का खतरा पैदा हो गया है।

विधिक फैक्ट शीट: मध्यस्थता पर सुप्रीम कोर्ट बनाम वित्त मंत्रालय नीति (2026)

कानूनी और नीतिगत श्रेणियांवर्तमान विधिक विवाद और आधिकारिक आपत्तियां
मुख्य वक्ता/आलोचकजस्टिस उज्ज्वल भूयान (माननीय न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट)
विवादित अदालती फैसलाDMRC बनाम DAMEPL क्यूरेटिव जजमेंट (अप्रैल 2024)
वित्त मंत्रालय की नीति (जून 2024)₹10 करोड़ से अधिक के सरकारी विवादों में आर्बिट्रेशन क्लॉज पर रोक की सलाह
वैकल्पिक सुझाववित्त मंत्रालय मध्यस्थता (Arbitration) के बजाय सुलह (Mediation) पर दे रहा है जोर
मुख्य विधिक चिंतान्यायिक अति-सक्रियता (Judicial Intervention) के कारण निवेशकों का घटता भरोसा

बार-बार फैसलों को पलटने और ₹10 करोड़ की सीमा तय कर आर्बिट्रेशन को हतोत्साहित करने जैसे कदम भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को नुकसान पहुँचाते हैं। कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों को अब इस दिशा में आत्ममंथन करने की जरूरत है।

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