POCSO Act: दिल्ली हाईकोर्ट ने पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) के एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सुनाते हुए एक व्यक्ति की 20 साल की सजा को घटाकर 10 साल कर दिया है।
आरोपी की दोष सिद्धि को धारा 6 से बदलकर धारा 18 सहपठित धारा 6 (POCSO) कर दिया
हाईकोर्ट के जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा की पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक शरीर में थोड़ा सा भी प्रवेश (Penetration, however slight) साबित नहीं होता, तब तक धारा 6 के तहत पूर्ण ‘अग्रवातेद पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ का अपराध नहीं बनता। इसलिए कोर्ट ने आरोपी की दोष सिद्धि को धारा 6 से बदलकर धारा 18 सहपठित धारा 6 (POCSO) कर दिया। अदालत ने माना कि नाबालिग बच्चे के खिलाफ गुप्तांगों को रगड़ना भले ही अधिनियम की धारा 3 के तहत ‘पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ (Penetrative Sexual Assault) के वैधानिक मानदंड को पूरा नहीं करता, लेकिन यह अपराध की केवल तैयारी नहीं बल्कि ‘पेनिट्रेटिव असॉल्ट का प्रयास’ (Attempt under Section 18) की श्रेणी में पूरी तरह आता है।
मामला क्या था?: 3 साल की बच्ची के साथ हैवानियत
घटना: आरोपी ने अपने घर के बाहर खेल रही 3 वर्षीय मासूम बच्ची को बहला-फुसलाकर अंदर बुलाया। उसने बच्ची के कपड़े उतारे, खुद भी निर्वस्त्र हुआ और बच्ची के गुप्तांगों पर अपने गुप्तांगों को तब तक रगड़ा जब तक कि स्खलन (Ejaculation) नहीं हो गया।
ट्रायल कोर्ट का फैसला: FSL (फॉरेंसिक) रिपोर्ट में कपड़ों और स्वैब पर डीएनए/वीर्य प्रोफाइल मैच होने के बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को धारा 6 POCSO और धारा 376(2)(i) IPC के तहत दोषी ठहराते हुए 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट में अपील: आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की, जिसमें मुख्य तर्क यह था कि अभियोजन पक्ष किसी भी प्रकार के ‘पेनिट्रेशन’ (शरीर में प्रवेश) को साबित करने में विफल रहा है।
दिल्ली हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व्याख्याएं
“तैयारी” (Preparation) बनाम “प्रयास” (Attempt) में अंतर
कोर्ट ने क्रिमिनल लॉ के सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए कहा, “अपराध की ‘तैयारी’ का चरण साधनों या उपायों की व्यवस्था करने तक सीमित होता है। लेकिन ‘प्रयास’ (Attempt) की शुरुआत तैयारी पूरी होने के तुरंत बाद होती है। प्रयास का अर्थ है मनःस्थिति (Mens Rea) को कार्य में बदलना। प्रस्तुत मामले में आरोपी ने खुद को और मासूम बच्ची को निर्वस्त्र किया और स्खलन होने तक गुप्तांगों को रगड़ा—यह केवल ‘तैयारी’ से बहुत आगे निकलकर सीधे ‘प्रयास’ (Execution of Intent) के चरण में प्रवेश कर चुका था।”
धारा 3 और 6 (POCSO) के लिए पेनिट्रेशन अनिवार्य
अदालत ने कहा कि धारा 3 या धारा 5 (और सजा के प्रावधान धारा 6) को लागू करने के लिए शरीर के किसी भी भाग में थोड़ा सा भी प्रवेश (Penetration) होना कानूनन अनिवार्य शर्त है: “आरोपी द्वारा गुप्तांगों को रगड़ना सीधे तौर पर धारा 3 (a से d) के तहत पेनिट्रेशन के दायरे में नहीं आता। इसलिए, हालांकि यह एक गंभीर और जघन्य प्रयास है, लेकिन प्रवेश के बिना इसे धारा 6 के तहत ‘पूर्ण पेनिट्रेटिव असॉल्ट’ नहीं माना जा सकता।”
सजा में बदलाव और IPC धारा 57 का प्रयोग
दोषसिद्धि में संशोधन: हाई कोर्ट ने आरोपी को धारा 6 के बजाय धारा 18 सहपठित धारा 6 POCSO (प्रयास/Attempt) के तहत दोषी माना।
सजा 20 से घटाकर 10 साल की गई: IPC की धारा 57 और पॉक्सो की धारा 18 के तहत प्रयास के अपराध के लिए अधिकतम सजा मुख्य अपराध की आधी (20 साल का आधा यानी 10 साल) हो सकती है।
कोई नरमी नहीं: बच्ची की कम उम्र और अपराध की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि आरोपी किसी अतिरिक्त सहानुभूति का हकदार नहीं है, इसलिए उसे अधिकतम संभव 10 साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा दी गई।
केस मैट्रिक्स: Delhi HC Judgment on Section 18 POCSO (Attempt)
| प्रक्रियात्मक और विधिक पहलू | विवरण / अदालत का फैसला |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा (Justice Chandrasekharan Sudha) |
| मूल अपराध धाराएं | पॉक्सो एक्ट की धारा 6 एवं IPC की धारा 376(2)(i) |
| संशोधित धाराएं | पॉक्सो एक्ट की धारा 18 (Attempt) सहपठित धारा 6 |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | बिना पेनिट्रेशन के गुप्तांग रगड़ना ‘प्रयास’ (Attempt) तो है, लेकिन पूर्ण पेनिट्रेटिव असॉल्ट (Section 3/6) नहीं। |
| सजा का संशोधन | 20 साल के कठोर कारावास से घटाकर 10 साल कठोर कारावास (जुर्माना बरकरार)। |

